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सीयूजे में क्षमता निर्माण कार्यक्रम, कॉपीराइट व पेटेंट पर डॉ के रमा पटनायक ने दी ये अहम जानकारी

Updated at : 17 May 2023 5:55 AM (IST)
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सीयूजे में क्षमता निर्माण कार्यक्रम, कॉपीराइट व पेटेंट पर डॉ के रमा पटनायक ने दी ये अहम जानकारी

कार्यक्रम के पहले सत्र में डॉ के रमा पटनायक ( लाइब्रेरियन, आई.आई.एम., बैंगलोर ) ने अनुसंधान और कॉपीराइट के विषय पर जानकारी दी. उन्होंने कॉपीराइट, पेटेंट और व्यापार रहस्य के बारे में बताया.

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रांची: झारखडं केंद्रीय विश्वविद्यालय के शिक्षा विभाग के ‘कार्यक्रम और विस्तार सेल’ द्वारा आयोजित ‘अभ्यास में अनुसंधान (अंतःविषय)’ नामक दो साप्ताहिक ‘क्षमता निर्माण कार्यक्रम’ का ऑनलाइन आयोजन किया जा रहा है. मंगलवार को आयोजन का सातवां दिन था. इसमें कई विद्वतजन एक मंच पर उपस्थित हुए. इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य भारत के विभिन्न विश्वविद्यालयों और कॉलेजों से जुड़े संकाय सदस्यों और अनुसंधान शोधार्थियों के अनुसंधान कौशलों को बढ़ाने और शैक्षणिक क्षमताओं के विकास में योगदान करना है.

कार्यक्रम की शुरुआत आज के सुविचार ‘इस संसार में दिव्य ज्ञान के समान पवित्र करने वाला कुछ भी नहीं है, जिसने लंबे समय तक योग के अभ्यास से मन की पवित्रता प्राप्त कर ली है, वह समय के साथ हृदय के भीतर ऐसा ज्ञान प्राप्त करता है और सुबह की शुरुआत ‘ इतनी शक्ति हमें देना दाता……. कोई भूल हो ना ’ प्रार्थना के साथ की गई. कार्यक्रम के पहले सत्र में डॉ के रमा पटनायक ( लाइब्रेरियन, आई.आई.एम., बैंगलोर ) ने अनुसंधान और कॉपीराइट के विषय पर जानकारी दी. उन्होंने कॉपीराइट, पेटेंट और व्यापार रहस्य के बारे में बताया. मुख्य रूप से कॉपीराइट पर ध्यान केंद्रित किया. कुछ कॉपीराइट कानूनों की प्रकृति क्षेत्राधिकार संबंधी होती है. कुछ सामग्री कॉपीराइट से बाहर हो सकती है. उपयोग करने के लिए स्वतंत्र हैं. कुछ नियमों और शर्तों के साथ लाइसेंस प्राप्त करने के लिए अनुमति की आवश्यकता पड़ सकती है. कॉपीराइट में पाठ, कलात्मक कार्य, नाटकीय कार्य, संगीत कार्य, फिल्म, प्रसारण और प्रकाशित संस्करण आदि शामिल हैं. कॉपीराइट में चार्ट, टेबल, ग्राफ़ आदि शामिल नहीं हैं. कॉपीराइट नई चीजों को पुन: प्रस्तुत करने, मुद्रित रूप में प्रकाशित करने, काम को प्रकाशित करने और जनता से संवाद करने और उनके काम को अपनाने या संशोधित करने के कुछ अधिकार देता है. कॉपीराइट लेखक की मृत्यु के 70 साल बाद तक मौजूद रहता है. कॉपीराइट हमारे रचनात्मक कार्य की रक्षा के लिए जरूरी है. शोध के लिए कुछ कॉपीराइट सामग्री प्रिंट बुक, जर्नल, पत्रिका, पांडुलिपियां, डिजिटल सामग्री जैसे डेटाबेस, ई-जर्नल, ई-बुक, तकनीकी रिपोर्ट आदि हैं. दूसरे सत्र में डॉ दुखबंधु साहू (एसोसिएट प्रोफेसर और प्रमुख, डीएसएचएच, भुवनेश्वर) ने शोध कार्य में सार/सारांश/सारांश तैयार करना’ विषय पर गहन व विस्तृत चर्चा की. उन्होंने सार, सारांश, सारांश और प्रस्ताव के बीच अंतर को बताया. एब्सट्रैक्ट में उद्देश्य, विधियों, प्रमुख निष्कर्षों और निष्कर्षों के महत्व पर अधिक महत्व दिया जाता है जबकि सारांश में निष्कर्षों और अध्ययन के निष्कर्षों पर अधिक ध्यान दिया जाता है.

तीसरे सत्र में प्रो ए के दास महापात्रा (उपकुलपति, ओडिशा राज्य मुक्त विश्वविद्यालय [ओ.एस.ओ.यू.], संबलपुर और पूर्व कुलपति, [आई/सी], संबलपुर विश्वविद्यालय, ओडिशा) ने ‘अभ्यास में शोध के लिए समग्र दृष्टिकोण – एक सिंहावलोकन’ के बारे में बताया. उन्होंने बताया कि चाहे NAAC हो या NIRF या HDI या समृद्धि सूचकांक सभी शिक्षा और नवाचार पर केंद्रित हैं. अनुसंधान ज्यादातर ज्ञान, डिग्री, पदोन्नति, मान्यता और सामाजिक सम्मान प्राप्त करने के लिए किया जाता है. गुणवत्तापूर्ण अनुसंधान और गुणवत्तापूर्ण शिक्षक, दोनों परस्पर संबंधित हैं क्योंकि एक अच्छा शिक्षक एक अच्छा शोधकर्ता भी होता है. अच्छे शोध के चरण निम्नलिखित हैं : समस्या की पहचान, शोध प्रश्न, साहित्य समीक्षा, शोध अंतर, उद्देश्य, परिकल्पना, अध्यायीकरण, अनुसंधान योजना, निष्पादन, रिपोर्ट लेखन. उन्होंने एक अच्छे शिक्षक के गुण को बताया, जो इस प्रकार है: – तैयारी, सामग्री की महारत, प्रभावी वितरण तकनीक, खुलापन, सकारात्मक दृष्टिकोण, दोस्ताना माहौल, दो तरफा प्रक्रिया और गतिविधियों का पालन करना.

चौथे व अंतिम सत्र में सुमंता बसु (क्षेत्रीय अधिकारी, यू.एस.आई.ई.एफ., कोलकाता) ने ‘ विदेशों में अनुसंधान के अवसर – यू.एस.आई.ई.एफ. के तहत डॉक्टरेट / पोस्ट डॉक्टरेट फेलोशिप, विजिटिंग फेलोशिप, विजिटिंग प्रोफेसरशिप ‘ के बारे में विस्तार से चर्चा की. उन्होंने अमेरिका में विभिन्न प्रकार की फुलब्राइट फेलोशिप जैसे- नेहरू फुलब्राइट फेलोशिप, कलाम फुलब्राइट फेलोशिप आदि के बारे में बताया. इसके लिए योग्यता के बारे में भी बताया जैसे- शैक्षणिक उपलब्धि का उच्च स्तर, अंग्रेजी में प्रवीणता आदि. पूरे सत्र का मार्गदर्शन प्रो तपन कुमार बसंतिया (कार्यक्रम के नोडल समन्वयक) के द्वारा किया गया.

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