बिनोद बिहारी महतो की जन्मशती: झारखंड के उपेक्षित व शोषित लोगों के लिए न्योछावर हुई इनकी हर सांस
Published by : Prabhat Khabar News Desk Updated At : 23 Sep 2023 6:23 PM
बिनोद बिहारी महतो ने कहा था कि हम सिर्फ सभा जुलूस तक सीमित नहीं रहेंगे. हमारा संघर्ष सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक और महाजनी, सूदखोर माफिया के खिलाफ भी होगा. हमारा आंदोलन झारखंडी अस्मिता, जल-जंगल-जमीन-खनिज पर अधिकार के लिए होगा.
शैलेंद्र महतो, पूर्व सांसद
आज मैं एक ऐसे राजनीतिक महापुरुष का संस्मरण लिख रहा हूं, जो पूरे झारखंड की जागृत आत्मा का प्रतीक है. बिनोद बिहारी महतो झारखंड के उन नेताओं की कतार में खड़े हैं, जिनके जीवन का प्रत्येक क्षण, जिनकी प्रत्येक सांस झारखंड के उपेक्षित एवं शोषित लोगों के लिए न्योछावर हुआ. यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात है कि झारखंड मुक्ति मोर्चा के 1973 में स्थापना काल के समय पार्टी के अध्यक्ष के नाते उन्होंने कहा था- मैं एक ऐसे दल का गठन करना चाहता हूं, जो पूर्व के झारखंड नामधारी दलों से एक अलग विचारधारा रखता हो. हमलोगों को झारखंड आंदोलन में आदिवासियों के साथ-साथ मूलवासियों और शोषित- पीड़ित गैर झारखंडी मेहनतकश लोगों को जोड़ना है, तभी जाकर आंदोलन में सफलता मिलेगी.
बिनोद बिहारी महतो ने कहा था कि हम सिर्फ सभा जुलूस तक सीमित नहीं रहेंगे. हमारा संघर्ष सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक और महाजनी, सूदखोर माफिया के खिलाफ भी होगा. हमारा आंदोलन झारखंडी अस्मिता, जल-जंगल-जमीन-खनिज पर अधिकार के लिए होगा. 1971 में बांग्लादेश की मुक्ति के लिए बांग्लादेश मुक्ति वाहिनी का जिक्र करते हुए विनोद बाबू ने झारखंड के संदर्भ में उसी नाम से मिलता-जुलता एक राजनीतिक दल झारखंड मुक्ति मोर्चा के गठन का प्रस्ताव रखा, जिसका समर्थन शिबू सोरेन, एके राय और कतरास के पूर्व राजा पूर्णेदु नारायण सिंह के साथ-साथ उपस्थित सभी लोगों ने किया.
झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना दो सामाजिक संगठन सोनोत संताल समाज और शिवाजी समाज को मिलाकर किया गया था. बिनोद बिहारी महतो की एक राजनीतिज्ञ के साथ-साथ झारखंड के एक बड़े वकील के रूप में गिनती होती थी. लोग उन्हें प्यार से बिनोद बाबू कहकर पुकारते थे. आपातकाल (1975) में गिरफ्तार हुए और 19 महीना भागलपुर जेल में रहे. झारखंड विषयक समिति के सदस्य थे. 18 दिसंबर 1991 को दिल्ली में हृदय गति रुकने से उनकी मृत्यु हो गयी. बिनोद बाबू की मृत्यु के बाद विनोद स्मृति-1992 नामक पत्रिका को साक्षात्कार देते हुए शिबू सोरेन ने कहा था कि – बिनोद बाबू मेरे पिता तुल्य थे. उन्होंने मुझे अपनी संतान की तरह निश्छल और अविरल प्यार दिया. मेरे झारखंड के लिए राजनीतिक संघर्ष की कहानी के वही आदिबिंदु थे और अपने जीवन के अंतिम दिनों में वही इसके उत्कर्ष का प्रतीक बने.
19 दिसंबर 1991 लोकसभा में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव, विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी के साथ-साथ विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने बिनोद बिहारी महतो को श्रद्धांजलि देते हुए शोक व्यक्त किया था. बिनोद बाबू एक मानवतावादी, शिक्षानुरागी, आडंबरहीन, सहज-सरल और विचारों से वामपंथी थे. वे राजनेता कम, जननेता ज्यादा थे.
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