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...और इस तरह दिसंबर 1691 में बनकर तैयार हुआ रांची का जगन्नाथपुर मंदिर, इतना ही पुराना है रथ यात्रा का इतिहास

Updated at : 22 Jun 2020 4:21 PM (IST)
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...और इस तरह दिसंबर 1691 में बनकर तैयार हुआ रांची का जगन्नाथपुर मंदिर, इतना ही पुराना है रथ यात्रा का इतिहास

Ranchi, Rath Yatra, Jagannathpur : रांची : बात 17वीं शताब्दी की है. बड़कागढ़ में नागवंशी राजा हुआ करते थे ठाकुर एनीनाथ शाहदेव. एक बार वह अपने नौकर के साथ भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने के लिए जगन्नाथपुरी (आज का पुरी) गये थे. यात्रा के दौरान ठाकुर एनीनाथ शाहदेव के चाकर में ऐसी भक्ति जागी कि वह भगवान जगन्नाथ का परम भक्त बन गया. कई दिनों तक वह भगवान जगन्नाथ की उपासना करता रहा.

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रांची : बात 17वीं शताब्दी की है. बड़कागढ़ में नागवंशी राजा हुआ करते थे ठाकुर एनीनाथ शाहदेव. एक बार वह अपने नौकर के साथ भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने के लिए जगन्नाथपुरी (आज का पुरी) गये थे. यात्रा के दौरान ठाकुर एनीनाथ शाहदेव के चाकर में ऐसी भक्ति जागी कि वह भगवान जगन्नाथ का परम भक्त बन गया. कई दिनों तक वह भगवान जगन्नाथ की उपासना करता रहा.

उपासना में लीन राजा का नौकर एक रात भूख से व्याकुल हो उठा. उसने ईश्वर से प्रार्थना की कि वह उसकी भूख मिटायें. भगवान जगन्नाथ ने अपने भक्त की पुकार सुनी और अपनी भोग की थाली उसके सामने लाकर रख दी. नौकर भगवान को पहचान नहीं पाया. उसने थाली से भोग उठाकर खाया. अपनी भूख मिटाकर वह फिर से सो गया.

सुबह उठा, तो नौकर ने अपने राजा को रात की पूरी कहानी सुनायी. कहते हैं कि उसी रात भगवान जगन्नाथ ठाकुर एनीनाथ शाहदेव के सपने में आये. भगवान ने राजा से कहा कि अपने घर लौटने के बाद वह उनके (भगवान जगन्नाथ के) विग्रह की स्थापना करे और उसकी पूजा-अर्चना शुरू करे. ठाकुर एनीनाथ जब वहां से लौटे, तो मंदिर के निर्माण की शुरुआत करवायी.

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कहते हैं कि ठाकुर एनीनाथ शाहदेव ने पुरी के जगन्नाथ मंदिर की तर्ज पर ही रांची में भी मंदिर के निर्माण के आदेश दिये. शिल्पकारों ने उनके कहे अनुसार रांची के धुर्वा में जगन्नाथ मंदिर का निर्माण किया. 25 दिसंबर, 1691 को मंदिर बनकर तैयार हो गया. मुख्य शहर रांची से करीब 10 किलोमीटर दूर एक पहाड़ी पर ठीक वैसा ही मंदिर बना, जैसा पुरी में था. मंदिर की बनवाट बिल्कुल वैसी ही थी, लेकिन आकार थोड़ा छोटा था.

मंदिर का निर्माण कार्य पूरा होने के बाद यहां पूजा-अर्चना के लिए बाकायदा एक व्यवस्था बनायी गयी. एनीनाथ शाहदेव के उत्तराधिकारी लाल प्रवीर नाथ शाहदेव की मानें, तो मंदिर की स्थापना के साथ ही मानवीय मूल्यों की भी यहां स्थापना की गयी. हर वर्ग के लोगों को इस मंदिर से जोड़ा गया. अलग-अलग काम का जिम्मा अलग-अलग जाति के लोगों को सौंपा गया.

इसके पीछे ठाकुर एनीनाथ शाहदेव की मंशा समाज को जोड़ने की थी. इसलिए उन्होंने हर वर्ग के लोगों को पूजा की कोई न कोई जिम्मेदारी दी. उरांव परिवार को मंदिर की घंटी देने की जिम्मेदारी मिली, तो तेल व भोग की सामग्री का इंतजाम भी उन्हें ही करने के लिए कहा गया. बंधन उरांव और बिमल उरांव आज भी इस जिम्मेदारी को निभा रहे हैं.

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धुर्वा के जगन्नाथपुर स्थित मंदिर पर झंडा फहराने, पगड़ी देने और वार्षिक पूजा की व्यवस्था करने के लिए मुंडा परिवार को कहा गया. रजवार और अहिर जाति के लोगों को भगवान जगन्नाथ को मुख्य मंदिर से गर्भगृह तक ले जाने की जिम्मेवारी दी गयी. बढ़ई परिवार को रंग-रोगन की जिम्मेवारी सौंपी गयी. लोहरा परिवार से कहा गया कि वह रथ की मरम्मत का जिम्मा संभाले. कुम्हार परिवार को मिट्टी के बरतन उपलब्ध कराने के लिए कहा गया.

ठाकुर एनीनाथ शाहदेव के राज में जो व्यवस्था बनी थी, उसी के अनुरूप आज भी सभी जाति के लोग अपनी-अपनी जिम्मेवारियों का निर्वहन कर रहे हैं. झारखंड की राजधानी रांची के धुर्वा स्थित जगन्नाथपुर में जो भगवान जगन्नाथ का मंदिर है, वहां से हर साल आषाढ़ माह में रथ यात्रा निकलती है. इसमें भारी संख्या आदिवासी एवं गैर-आदिवासी भक्त शामिल होते हैं.

यहां का आयोजन ओड़िशा के पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर की रथ यात्रा से किसी भी मायने में कम नहीं है. यहां विशाल मेला भी लगता है. इसमें आसपास के इलाकों के श्रद्धालु आते हैं, तो आसपास के जिलों ही नहीं, राज्यों से भी कारोबारी अपना सामान बेचने यहां आते हैं. कई ऐसी चीजें सिर्फ जगन्नाथपुर के मेला में ही मिलती है, जो आम दिनों में बाजार में उपलब्ध नहीं होता.

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इस वर्ष यानी वर्ष 2020 में व्यापारियों से लेकर मेला घूमने आने वालों तक में निराशा है. कोरोना वायरस के संक्रमण की वजह से इस वर्ष मेला लगाने की इजाजत प्रशासन ने नहीं दी. रथ यात्रा भी इस बार धूमधाम से नहीं निकलेगी. सिर्फ परंपरा का निर्वहन किया जायेगा. 1692 से अब तक यह पहला मौका है, जब रांची में भगवान जगन्नाथ की भव्य रथ यात्रा का आयोजन नहीं हो रहा है.

Posted By : Mithilesh Jha

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Mithilesh Jha

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By Mithilesh Jha

मिथिलेश झा PrabhatKhabar.com में पश्चिम बंगाल राज्य प्रमुख (State Head) के रूप में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार हैं. उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 32 वर्षों से अधिक का व्यापक अनुभव है. उनकी रिपोर्टिंग राजनीति, सामाजिक मुद्दों, जलवायु परिवर्तन, नवीकरणीय ऊर्जा, कृषि और अन्य समसामयिक विषयों पर केंद्रित रही है, जिससे वे क्षेत्रीय पत्रकारिता में एक विश्वसनीय और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित हुए हैं. अनुभव : पश्चिम बंगाल, झारखंड और बिहार में 3 दशक से अधिक काम करने का अनुभव है. वर्तमान भूमिका : प्रभात खबर डिजिटल (prabhatkhabar.com) में पश्चिम बंगाल के स्टेट हेड की भूमिका में हैं. वे डिजिटल न्यूज कवर करते हैं. तथ्यात्मक और जनहित से जुड़ी पत्रकारिता को प्राथमिकता देते हैं. वर्तमान में बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 पर पूरी तरह से फोकस्ड हैं. भौगोलिक विशेषज्ञता : उनकी रिपोर्टिंग का मुख्य फोकस पश्चिम बंगाल रहा है, साथ ही उन्होंने झारखंड और छत्तीसगढ़ की भी लंबे समय तक ग्राउंड-लेवल रिपोर्टिंग की है, जो उनकी क्षेत्रीय समझ और अनुभव को दर्शाता है. मुख्य विशेषज्ञता (Core Beats) : उनकी पत्रकारिता निम्नलिखित महत्वपूर्ण और संवेदनशील क्षेत्रों में गहरी विशेषज्ञता को दर्शाती है :- राज्य राजनीति और शासन : झारखंड और पश्चिम बंगाल की राज्य की राजनीति, सरकारी नीतियों, प्रशासनिक निर्णयों और राजनीतिक घटनाक्रमों पर निरंतर और विश्लेषणात्मक कवरेज. सामाजिक मुद्दे : आम जनता से जुड़े सामाजिक मुद्दों, जनकल्याण और जमीनी समस्याओं पर केंद्रित रिपोर्टिंग. जलवायु परिवर्तन और नवीकरणीय ऊर्जा : पर्यावरणीय चुनौतियों, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और रिन्यूएबल एनर्जी पहलों पर डेटा आधारित और फील्ड रिपोर्टिंग. डाटा स्टोरीज और ग्राउंड रिपोर्टिंग : डेटा आधारित खबरें और जमीनी रिपोर्टिंग उनकी पत्रकारिता की पहचान रही है. विश्वसनीयता का आधार (Credibility Signal) : तीन दशकों से अधिक की निरंतर रिपोर्टिंग, विशेष और दीर्घकालिक कवरेज का अनुभव तथा तथ्यपरक पत्रकारिता के प्रति प्रतिबद्धता ने मिथिलेश झा को पश्चिम बंगाल और पूर्वी भारत के लिए एक भरोसेमंद और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित किया है.

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