जानिये, साल 2019 में किस किताब ने बटोरीं सुर्खियां और किसने पैदा किया विवाद...

By Prabhat Khabar Digital Desk
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साहित्य डेस्क, रांची

साहित्य समाज का आइना है और पुस्तकें इसकी संवाहक. पुस्तकें समाज को दिशा भी दिखाती हैं, तो दशा खराब करके दुर्दशा भी पैदा कर देती है. दुर्दशा इस मायने में पैदा करती हैं कि अगर प्रकाशित पुस्तकों पर राजनीतिक विवाद पैदा न हो, तो वह चर्चित होती हैं और समाज उससे कुछ न कुछ ग्रहण करता है, मगर यदि राजनीतिक विवाद पैदा हो गया, तो सामाजिक और राजनीतिक दुर्दशा होना करीब-करीब तय है. हर साल की भांति वर्ष 2019 के दौरान भी भारत में नामचीन और गुमनाम लेखकों के पुस्तकों का प्रकाशन हुआ, जिसमें कुछ पुस्तकें राजनीतिक विवादों के कारण चर्चा में रहीं, तो कुछ अपने कथानकों, पात्रों और कविताओं की वजह से चर्चित हुईं. आइए, हम जानते उन तमाम तरह के पुस्तकों के बारे में जो समाज के लिए आइना बनीं और जो राजनीतिक विवादों की वजह से दुर्दशा भी...

अख्तरी, संपादन : यतींद्र मिश्र

जानिये, साल 2019 में किस किताब ने बटोरीं सुर्खियां और किसने पैदा किया विवाद...

यतींद्र मिश्र के संपादन में वर्ष 2019 में अख्तरी का प्रकाशन हुआ. इस साल यह किताब काफी चर्चा में रही. इसकी वजह यह रही कि इसमें कई पुराने और नये लेखकों ने गजल गायिका बेगम अख्तर के बारे में अपने संस्‍मरण और लेख साझा किये हैं. बेगम अख्तर के गजल के सफर और उनकी निजी जिंदगी को जानने के लिए यह बेहद दिलचस्‍प किताब है. इस किताब में बहुत बेबाकी से उनके बारे में चर्चा की गयी है. कई नामचीन और नये लेखकों ने किताब में अपने आलेख भी लिखे हैं.

कुली लाइंस, लेखक : प्रवीण झा

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17वीं शताब्दी में भारत आये अंग्रेजों ने आम भारतीयों को रोटी तक को मोहताज कर दिया था. फिर उन्होंने गुलामी की शर्त पर यहां से मजदूरों को विदेश भेजना शुरू कर दिया. इन मजदूरों में बिहार के वैसे लोग भी शामिल थे, जिनके घरों में रोटी के लाले पड़े थे. गिरमिट शब्द अंगरेजी के `एग्रीमेंट' शब्द का अपभ्रंश बताया जाता है. जिस कागज पर अंगूठे का निशान लगवाकर हर साल हजारों मजदूर दक्षिण अफ्रीका या अन्य देशों को भेजे जाते थे, उसे मजदूर और मालिक `गिरमिट' कहते थे. इस दस्तावेज के आधार पर मजदूर गिरमिटिया कहलाते थे. वैसे तो गिरमिटिया मजदूर पर अंग्रेजी के कई लेखकों ने कलम चलायी है, लेकिन प्रवीण झा ने हिंदी में पहली बार सभी द्वीपों के इतिहास को एक साथ रखने का प्रयास किया गया है. गिरमिटिया अपनी छह पीढ़ी के बाद भी अपने आपको भारतीय मानते हैं. उनके इसी संघर्ष की कहानी को प्रवीण झा ने अपनी पुस्तक कुली लाइंस में उकेरने का काफी प्रयास किया है. गिरमिटिया मजदूरों की दास्तां को लेकर यह पुस्तक वर्ष 2019 में काफी चर्चित रही.

बोलना ही है, लेखक : रवीश कुमार

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मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित वरिष्ठ टीवी पत्रकार रवीश कुमार की किताब ‘बोलना ही है’ भी वर्ष 2019 में चर्चा का विषय बनी रही. यह इस बात की पड़ताल करती है कि भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किस-किस रूप में बाधित हुई है, परस्पर संवाद और सार्थक बहस की गुंजाइश कैसे कम हुई और इससे देश में नफरत और असहिष्णुता को कैसे बढ़ावा मिला है. कैसे जनता के चुने हुए प्रतिनिधि, मीडिया और अन्य संस्थान एक मजबूत लोकतंत्र के रूप में हमें विफल कर रहे हैं. इन स्थितियों से उबरने की राह खोजती यह किताब हमारे वर्तमान समय का वह दस्तावेज है, जो स्वस्थ लोकतंत्र के हर हिमायती के लिए संग्रहणीय है. हिंदी में आने से पहले ही यह किताब अंग्रेजी, मराठी और कन्नड़ में प्रकाशित हो चुकी है.

मैं हिन्‍दू क्‍यों हूं, लेखक : शशि थरुर

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पिछले कुछ सालों में हिंदू धर्म को लेकर काफी बहस का दौर रहा है. इसी दौरान लेखक और राजनीतिज्ञ शशि थरूर ने 'मैं हिंदू क्‍यों हूं' में हिंदू धर्म को लेकर अपने विचार और संस्मरण लिखे हैं. इसमें उनकी निजी आस्‍था का जिक्र है. कांग्रेस से राजनीति करने वाले शशि थरूर को हिंदू धर्म पर इस किताब में अनेक टिप्पणी की है. एक तरफ जहां हिंदू धर्म, सांप्रदायिकता और धर्म निरपेक्षता को लेकर पूरे साल राजनीति गर्म रही, ऐसे में शशि थरूर की यह किताब राजनीतिक विवादों में भी घिरी रही. इसके पक्ष-विपक्ष में सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर टिप्पणियां भी की गयीं.

द थर्ड पिलर, लेखक : रघुराम राजन

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रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन की पुस्तक ‘द थर्ड पिलर’ का मार्च, 2019 में प्रकाशन किया गया. इस किताब के बारे में राजन ने कहा कि यह किताब आरएसएस जैसे राष्ट्रवादी संगठनों के उद्देश्यों के खिलाफ है. रघुराम राजन एक बार फिर उस समय चर्चा में आये थे, जब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा था कि उनकी पार्टी ने रघुराम राजन से सलाह करने के बाद ही न्यूनतम आय गारंटी योजना (न्याय) का खाका पेश किया है. आरबीआई के पूर्व गवर्नर राजन की यह किताब बाजार में आने के पहले ही सुर्खियों में आ चुकी थी और इसे लेकर काफी विवाद भी पैदा हुआ.

खुशियों के गुप्तचर, लेखक : गीत चतुर्वेदी

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खुशियों के गुप्तचर नामक यह पुस्तक गीत चतुर्वेदी का कविता संग्रह है, जिसमें व्यंग्यात्मक और रोचक कविताएं हैं. इन कविताओं में गीत चतुर्वेदी ने देश के समसामयिक राजनीतिक गतिविधियों में धर्म, पाखंड और अमानवीय हरकतों पर करारा प्रहार किया है. अपनी एक कविता में उन्होंने लिखा है, 'अलग-अलग जगह से ये आये कुछ लोगों का एक गैंग है, इसमें पान टपरी खड़े शोहदे हैं, मंदिरों-मस्जिदों पर पेट पालते कुछ धर्मगुरु हैं...'

गेम चेंजर, लेखक : पाकिस्तानी क्रिकेटर शाहिद अफरीदी

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पाकिस्तानी ऑल राउंडर शाहिद अफरीदी की आत्मकथा के रूप में 'गेम चेंजर' नामक किताब आयी. इस विवादित आत्मकथा को शाहिद अफरीदी तथा पत्रकार वजाहत एस खान ने लिखी. इस पुस्तक का प्रकाशन हार्परकॉलिंस इंडिया द्वारा किया गया. इस पुस्तक में शहीद अफरीदी ने अपनी वास्तविक उम्र के बारे में भी लिखा है. अफरीदी ने इस पुस्तक में जावेद मियांदाद, वकार यूनिस तथा गौतम गंभीर की आलोचना की है. इस वजह से यह किताब काफी विवादों में रही. शाहिद अफरीदी एक पाकिस्तानी क्रिकेटर हैं. उनका जन्म मार्च, 1980 में हुआ था. शाहिद अफरीदी ने अपने कॅरियर में 27 टेस्ट मैच खेले. इनमें उन्होंने 1716 रन तथा 48 विकेट लिये. उन्होंने 398 एकदिवसीय मैच खेले. इनमें उन्होंने 8,064 रन बनाये तथा 395 विकेट लिये. इसके साथ ही, अफरीदी ने 99 अंतरराष्ट्रीय टी-20 मैच खेले. इनमें उन्होंने 1,416 रन बनाये तथा 98 विकेट लिये. अफरीदी ने अपनी पुस्तक में इन सबका वर्णन किया है.

अयोध्या रीविजिटेड, लेखक : पूर्व आईपीएस अफसर किशोर कुणाल

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‘अयोध्या रिविजिटेड’ किताब को पूर्व आईपीएस किशोर कुणाल ने लिखी है. इस पुस्तक में अयोध्या में विवादित जमीन पर राम मंदिर होने का उल्लेख किया गया है. किताब में हंस बेकर का कोट है. इस किताब को रामजन्मभूमि की सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान अदालत के सामने पेश भी किया गया था. सुनवाई के अंतिम दिन हिंदू पक्षकार के वकील विकास सिंह ने पीठ के समक्ष अपना पक्ष रखा. किशोर कुणाल ने लगभग 20 वर्षों तक अयोध्या मामले पर शोध किया है. उन्होंने ब्रिटिश काल की पुरानी फाइलों, प्राचीन संस्कृत सामग्री और पुरातत्व खुदाई की समीक्षाओं के साथ ‘अयोध्या रिविजिटेड’ किताब लिखी है. हालांकि, इसका प्रकाशन वर्ष 2016 में ही कर दिया गया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में साक्ष्य के तौर पर इसे पेश किये जाने के बाद यह पुस्तक वर्ष 2019 में दोबारा सुर्खियों में आ गयी.

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