शहरी संस्कृति की प्रेम कहानियों को बयान करती ''बंद दरवाजों का शहर''

By Prabhat Khabar Digital Desk
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रानी सुमिता

एक लेखक समाज का नब्ज तभी पकड़ता है, जब वह समाज के मनोविज्ञान को भांपता और एहसास करता है. उसके एहसास का जरिया कलम बनती है. लेखिका रश्मिश् रविजा ने अपने पहले कथा संग्रह 'बंद दरवाजों का शहर' समाज के इसी मनोदशा को समझने की कोशिश की है. इसमें कुल 12 कहानियां हैं. नगरीय जीवनशैली के इर्द-गिर्द बुने गये कथानक में स्त्रीवादी नजरिये के साथ पुरुष दृष्टिकोण को ध्यान रखा गया हैं. रश्मि की कलम से निकले शब्द स्त्री जीवन के दर्द, विषाद, प्रेम का सफल मनोवैज्ञानिक चित्रण करते हैं.

पहली कहानी 'चुभन टूटते सपनों के किरचों की' बेहद मार्मिक और शहरी प्रेम पर आधारित है. इसके बाद इस कथा संग्रह की अन्य कहानियों 'अनकहा सच' 'पराग तुम भी' 'दुश्चक्र' 'बंद दरवाजों का शहर' 'कशमकश' 'खामोश इल्तिजा' 'पहचान तो थी पर पहचाना नहीं' 'होठों से आंखों तक का सफर' 'दुख सके मस्तक पर हौसले खुदा' 'बदलता वक्त' आदि कहानियां भी बेहद मार्मिक और शहरी प्रेम को बखूबी दर्शाती हैं.

रश्मि रविजा का यह कहानी संग्रह आज के समाज में चारों ओर घटित हो रही घटनाओं, समस्याओं का सूचीबद्ध पंजीकरण है. वर्तमान समाज में बोली जानेवाली हिंग्लिश भाषा आम चलन में है. लेखिका ने इसे अपनी कहानियों में बखूबी इस्तेमाल भी किया है. इससे ये कहानियां आसपास घटित हो रही घटनाओं की प्रतिध्वनि-सी प्रतीत होती है. समाज में पनप रहे कई कुंठाओं पर परोक्ष रूप से वार करती ये तमाम कहानियां पाठकों के मन में कई तरह के सामाजिक और मनोवैज्ञानिक प्रश्न खड़े करती है और उनके नब्ज को छूती है.

सभी कहानियां रोचक प्रवाह लिए हुए हैं, पर एक-दो कहानियों का अंत अचानक हुआ दिखता है. कई जगह संपादन की कमी चुभती है, जिन्हें अगले संस्करण में सुधारने की आवश्यकता है. वैसे इन्हें अगर नजरअंदाज करें, तो यह कहानी संग्रह आज के दौर की सच्चाई बयां करती है. खुद में एक ठहराव और युवापन लिए हुए है. यही कारण है कि इन्हें पढ़ते वक्त पाठक तरोताजगी महसूस कर सकते हैं.

रश्मि रविजा एक जनप्रिय लेखिका हैं. उनका यह संग्रह पाठकों के बीच जगह बनाने में सफल होगा. समाज और सामाजिक संबंधों के विभिन्न पक्षों को दर्शाता यह कहानी संग्रह अपनी भावपूर्ण प्रस्तुति के कारण निश्चित रूप से पाठकों के लिए अनुपम भेंट है.

पुस्तक : बंद दरवाजों का शहर
लेखिका : रश्मि रविजा
प्रकाशक : अनुज्ञा बुक्स, दिल्ली
मूल्य : 225 रुपये

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