कहानी : डंक

By Prabhat Khabar Digital Desk
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कहानी : डंक

-सीमा स्वधा-

पूरे पंद्रह दिनों बाद आज घर लौट रही थी. सफर की थकान सबके चेहरे पर चस्पां थी. बस खचाखच भरी हुई थी. यात्री जैसे बस में न होकर जिन्सों की तरह बोरे में भरे जा रहे थे. अब बस में किसी के सरकने की गुंजाइश नहीं थी मगर कंडक्टर जहाँ-तहाँ बस रोककर एक दो पैसेंजर लेता ही जा रहा था. धूप और गर्मी से हाल-बेहाल था, हमारी खीझ भी बढ़ती जा रही थी. पर इस नपुंसक खीझ के सहारे क्या किसी कुव्यवस्था से लड़ा जा सकता है भला. पिछले दो दिनों से हम सफर कर रहे थे. गर्मी की छु़ट्टियों में आखिर हमारी हिमाचल की चिर-प्रतीक्षित यात्रा पूरी हो गई. पर सफर का सारा रोमांच घर तक पहुँचने की जद्दोजहद में जैसे तिरोहित होता जा रहा था.

मुजफ्फरपुर तक हमारा ट्रेन का आरक्षण था. बाकी घर तक की यात्रा बिहार के परिवहन व्यवस्था के सहारे ही पूरी करनी थी. जहाँ के लोकल बसों के भुक्तभोगी यात्री ही इस सफर का रोमांच बयां कर सकते हैं. बहरहाल, जैसे-तैसे यात्रा पूरी होने के कगार पर थी. कस्बे और शहर को जोड़ता लोहे का वो पुराना-जर्जर पुल बस कब का छोड़ चुकी थी. थोड़ा सफर शेष था. आँखें मूंदे मैं राहत की साँस ले रही थी कि बस घरघराहट के साथ एकाएक रुक गई.

मैंने देखा अस्पताल परिसर के आसपास ढेर सारे लोग जमा हैं. तीन-चार बसें पहले से ही रुकी हुई थी. पता चला अस्पताल का घेराव हो रहा है. बढ़ी हुई दाढी और आँखों में चश्मा लगाये एक नेता टाइप सहयात्री तो अस्पताल तक हो आया था. बस में आते ही हमारी उत्सुकता भाँप बताना शुरू किया-‘अगले दो-तीन घंटो तक बस के निकलने का कोई चांस नहीं, जब तक पुलिस आकर व्यवस्था नहीं संभाल लेती, कुछ भी हो सकता है.’

मैंने खिड़की से सिर निकाल कर झाँका. हाथ में डंडा और माथे पर टोपी लगाये किसी समुदाय विशेष के व्यक्तियों के खिलाफ नारे लगा रहे थे तथा डॉ शर्मा की गिरफ्तारी की माँग भी कर रहे थे. नरेन ने धरना का कारण जानना चाहा.एक दस बारह साल के लड़के को ‘ततैया’ ने काटा था. परसों शाम से ही लड़का अस्पताल में भरती था. कल शाम तक उसकी हालत में सुधार था. रात अचानक उसकी बेचैनी बढ़ गई. उस समय कोई डॉक्टर नहीं था ड्यूटी पर. सुबह होते-होते लड़का मर गया. नेता टाइप सहयात्री फिर थोड़ा फुसफुसा कर बोला‘भाई मुझे तो आसार ठीक नहीं लग रहे. दंगा भी भड़क सकता है.’

‘ततैया’ के काटने से लड़के का मर जाना और इस कारण दंगे का आसार, बात कुछ जम नहीं रही थी. नरेन ने कुरेदा. ‘भैया, इसमें दंगा कहाँ से आ गया. माना कि लड़का मर गया है पर न तो उसे किसी ने ट्रेन में जिंदा जलाया है ना हत्या की है. उसके दिन पूरे हो गये होंगे वरना साँप का काटा भी जीता है कि नहीं.’

‘ठीक फरमा रहे हैं साहब.’ अपनी मिचमिची आँखों को थोड़ा दबाते हुये उसने राज भरे अंदाज में कहा, ‘पर आप नहीं जानते, ड्यूटी पर जो डॉक्टर थे वो शर्मा थे और मरने वाला हसन. ये लापरवाही जान बूझकर भी तो की जा सकती है. वैसे मरने वाला यहीं पास का ही था.’ नरेन भौचक थे पर बात की तह तक पहुँचने की आश्वस्ति भी थी उनके चेहरे पर. आज की इस अवसरवादी राजनीति पर लानते भेजती मैं इस चिंता में थी कि जाने कब तक जाम हो. राजनीति और पैसे के घालमेल ने इस पेशे को भी नहीं बख्शा था. यहाँ से हमारा घर मात्र डेढ़ किलोमीटर था.

सामान नहीं होता तो पैदल भी जा सकते थे. बहरहाल, हमने बस छोड़ना ही तय किया. सामान उठाये हम भीड़ के बगल से जगह बनाते-बनाते अस्पताल की दूसरी ओर आ गये, तोड़फोड़ के आसार देख रिक्शे वाले भी जाने कहाँ बिला गये थे. एक ठेला पर सामान रखा और हमने पैदल जाना ही तय किया.तभी अचानक भीड़ सुगबुगाई. एक टोपी लगाये खद्दरधारी नेता भीड़ के मुखातिब था. ‘भाइयों एवं बहनों, यह सरकार गरीबों का हमदर्द होने का ढ़ोंग भर करती है. सच तो यह है कि सरकार के साथ-साथ इसकी व्यवस्था भी गरीब विरोधी है.

वरना इलाज के बिना एक गरीब बच्चे की मौत यूं होती भला. मान लीजिये, ये किसी मंत्री या अफसर का बेटा होता तब भी डॉक्टर यूं ही ड्यूटी में लापरवाह.....’उसकी आवाज हमारे कानों तक पहुँच ही रही थी कि भीड़ ने नारा दिया-‘अल्लाह हो अकबर, हत्यारा डॉक्टर सामने आओ. हमें इंसाफ चाहिए.’ भीड़ की भले ही कोई शक्ल नहीं होती पर ताकत भरपूर होती है. भीड़ शायद बेइख्तियार हो चली थी. कुछ लोग गली से दौड़ते हुये अस्पताल की ओर जा रहे थे. भय और दहशत से हमारा बुरा हाल था. मन ही मन ईश्वर को याद करते हुये हम अपने घर तक पहुँचने की जल्दी में थे. तभी सामने से पुलिस की तीन-चार गाड़ियाँ दनादन गुजरी.

शाम के चार बज रहे थे. पर सूर्य देवता की तपिश जस की तस थी. हमारा घर शहर से कुछ दूर एक मोहल्ले में था. गली में जगह-जगह लोग गुटों में बतिया रहे थे जैसे किसी गंभीर मसले पर कोई चर्चा हो रही हो. ताला खोलकर अब हम घर में थे. अभी पंखा ऑन कर सोफे पर बैठे ही थे कि घर के पिछवाड़े से रोने की आवाज सुनाई दी. सीढियाँ लांघती मैं छत पर जाकर पीछे का जायजा लेने लगी. वहाँ अनवर मियाँ के घर के सामने ढेर सी औरतें मातम मना रही थी. माजरा अब कुछ-कुछ मेरी समझ में आने लगा.‘तो क्या मरने वाला आदिल था.’मेरी सोच ने मुझे ही भटका दिया.

एक पल को उसकी भोली मासूमसूरत मेरे आँखों के आगे तैर गई पर वो तो यादव जी के घर काम करता था. सफर की थकान जाने कहाँ गायब हो गई और एक अजीब सी बेचैनी हावी हो गई. मैं घटना की तह जाना चाह रही थी पर किससे पुछूँ. दरअसल, जहाँ हमारा घर था वहाँ अधिकांश आबादी मुसलमानों की ही थी. नरेन के दोस्तों ने इस मुहल्ले को मिनी पाकिस्तान नाम दे रखा था. हिंदुओं के सात-आठ घर ही थे पर संपन्न थे, जबकि मुसलमानों में अधिसंख्यक गरीब ही थे. अनवर मियाँ और उनके परिवार को मैं अच्छी तरह जानती थी. इस नये घर में सारे फर्नीचर उनसे ही बनवाये थे हमने. इस दरम्यां आदिल भी अपने अब्बा से मिलने कितनी दफा हमारे घर आ चुका था.

नरेन के दोस्तों के इस मजाक से कोई फर्क नहीं पड़ता था कि हम मिनी पाकिस्तान के बाशिंदे थे. सीढ़ियां उतर ही रही थी कि ‘अल्लाह हो अकबर’ का गगन भेदी नारा पिछवाड़े गूँजा. मैं दौड़कर एक बार फिर छत पर थी. अनवर मियाँ के घर से होते हुये सैकड़ों लोगों का हुजूम तलवार भाले से लैस अस्पताल की दिशा में दौड़ रहा था. किसी अनहोनी की आशंका से घबराई मैं नीचे उतर ही रही थी कि नरेन ने पुकारा, ‘क्या कर रही हो छत पर जल्दी नीचे आओ. शहर में दंगा हो रहा है.’ अकबकाई सी मैंने दौड़कर पहले मेन गेट में ताला लगाया. घर के पीछे के सारे दरवाजे बंद कर हम बैठक में थे. नरेन ने बताया ‘यादव जी अभी चौक से जान बचाकर भागे हैं. भीड़ ने अस्पताल पर हमला बोल दिया. तोड़फोड़ करके अस्पताल की गाड़ी को आग लगा दिया. डॉ शर्मा की हालत चिंताजनक है. आखिर वो भीड़ के हत्थे चढ़ ही गये. उन्हें पटना रेफर किया है.’ नरेन ने अपने मित्र मोहन को फोन लगाया था. उसने घटना की पुष्टि कि शर्मा को चिंताजनक हालत में पुलिस गाड़ी में ले जाया गया है. अबतक तो सबकुछ एकतरफा था. अब हिंदुत्व की रोटी खाने वाले नेताओं ने प्रतिपक्ष का बागडोर संभाल लिया था. अल्लाह हो अकबर का जवाब अब बकायदा ‘जय श्रीराम’ से दिया जा रहा था.

इस खबर से हम सकते में थे. इतने लम्बे प्रवास के बाद घर काफी अस्त-व्यस्त था. कोई सामान्य दिन होता तो पहले मैं किचेन साफ कर चाय बनाती. चाय पीकर घर की सफाई करती. फिर नहा-धोकर खाने का इंतजाम करती. पर आज सारी बातें गौण थी. घर में ना तो सब्जी थी, ना दूध. दुकान तो सारे बंद होंगे. वैसे भी इस हालत में कौन जाएगा बाजार तक. तभी सायरन बजाती पुलिस गाड़ी गुजरी. साथ ही धारा 144 की घोषणा भी हो रही थी. नरेन एक बार फिर फोन पर अपने उसी दोस्त के मुखातिब थे. मैंने झट से स्पीकर आन कर दिया. ‘हाँ, अब स्थिति नियंत्रित है किसी हदतक. एस.टी.एफ. के आने के पहले. जो होना था हो चुका है. धैर्य रखो. अब कुछ नहीं होगा.

प्रशासन ने व्यवस्था संभाल लिया है.’ मित्र ने शायद हमारी स्थिति भाँप ली थी. आखिर हम मिनी पाकिस्तान के वाशिंदे जो थे. शाम के सात बज रहे थे. सूर्यास्त हो चुका था मगर रौशनी अब भी थी. घिरते अंधेरे के साथ एक अनजाना भय भी हमपर हावी हो रहा था जिसे मैं और नरेन शब्दों में व्यक्त करने से बच रहे थे. नन्ही शिप्रा बार-बार खाने की जिद कर रही थी. वहीं आकाश अपने स्तर पर सारे घटनाक्रम को समझना चाह रहे थे. मेरी समझ में नहीं आ रहा था. इस नन्ही जान को कैसे और किस स्तर पर इस जहर बेल का परिचय दूं. सफर में बचे कुछ ब्रेड और बिस्कुट अब भी बैग में थे. मैंने हॉर्लिक्स के साथ बच्चों को वही दिया. खुद भी काली चाय पी और बाहर की टोह लेने लगे .

तभी बिजली आ गई. मैंने दौड़कर टी.वी. ऑन किया. पर हाय री किस्मत. इस मुहल्ले तक तो केबल की पहुंच ही नहीं थी. इतनी जल्दी नेशनल चैनल पर इस घटनाक्रम की जानकारी कहाँ मिलती भला. नेशनल न्यूज में इतने छोटे कस्बे का न्यूज दो लाइन में पढ़कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते शायद. प्रादेशिक चैनल होता तो कोई और बात था. मैंने रेडियो ऑन किया वहाँ भी संगीत का कोई प्रोग्राम आ रहा था. अभी न्यूज का समय नहीं था और एक कस्बे में दंगा होना कोई क्रिकेट जैसा दिलचस्प मैटर तो था नहीं. जो अबाध प्रसारित हो. अपनी सारी दुश्चिंताओं एवं आशंकाओं से लैस मैं मन ही मन स्थिति सामान्य होने की प्रार्थना कर रही थी. पता नहीं मेरी प्रार्थना उस ईश्वर या अल्लाह तक पहुँच भी रही थी या वो भी अपने नुमाइंदो की रहनुमाई में ही व्यस्त थें.

बिजली अपना दर्शन देकर कब का जा चुकी थी. वैसे भी इस कस्बे में उसका आना आकस्मिक ही होता था. सफर की थकान से शिप्रा और आकाश सो रहे थे. पर मेरी और नरेन की थकान गायब थी. फिल्मों और कहानियों में दंगा की बावत देखे और पढ़े हुये ढेर सारी घटनाएं जेहन में आ जा रही थी और मन अनजानी आशंका से ग्रस्त था. बाहर चाँदनी फैली हुई थी. मौसम और हालात की मिली-जुली तपिश से बेहाल हमदोनों एकबार छत पर थे. शहर में कर्फ्यू लग चुका था. जिसका एलान बाकायदा हो रहा था. तभी फायरिंग की आवाज आई. धुएं का सैलाब सा चारों ओर फैल गया. भीड़ को तीतर-बितर करने के लिए पुलिस बल ने आंशु गैस का इस्तेमाल किया था. मैं और नरेन नीचे आ गये .

नरेन ने जेनरेटर स्टार्ट किया ताकि रौशनी के बीच हमारा भय कुछ कम हो सके. मैंने घर में इधर-उधर पड़े बेकार चीजों को इकट्ठा करना शुरू कर दिया. मसलन फ्यूज बल्ब, ईंट-पत्थर के टुकड़े, टूटा-फूटा सामान. एकाएक सारे परिचित चेहरे हमलावर में तब्दील होते जा रहे थे हमारी कल्पना में. दूसरे ही क्षण मुझे खुद पर ग्लानि होती. इतने दिनों तक जिसके साथ हर सुख-दुःख बाँटकर जिया वो ही पड़ोसी हमारे दुश्मन क्यों होने लगे. पर सुनी-सुनाई किस्से कहानियों में उलझा मेरा मन भीड़ की मानसिकता पर यकीन नहीं कर पा रहा था. व्यक्ति सहिष्णु हो सकता है, धर्म-निरपेक्ष और मानवीय भी, पर वही व्यक्तियों का समूह जब भीड़ की शक्ल अख्तियार करता है तो इतना अमानवीय कैसे हो जाता है, भुक्तभोगी न सही पर इतिहास की विद्यार्थी होने के नाते आजादी के बाद से लेकर सिख विरोधी दंगो तक. दंगों की विभीषिका को पढ़ा है मैंने. तभी नरेन ने चुप्पी तोड़ी- ‘सरिता मैंने अलमारी में बिजली के तार रखे थे कहाँ रख दिया तुमने.’ लफ्जों में खीझ एवं झल्लाहट स्पष्ट थी. उनकी मंशा समझते मुझे देर नहीं लगी. आखिर मैंने भी सुना था. इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद दंगाई भीड़ के आक्रमण से बचने के लिए कैसे सरदार जी ने मेन गेट में नंगे तार से बिजली की धारा प्रवाहित कर अपनी रक्षा की थी. सारी तैयारियों से लैस होने के बाद मन थोड़ा आश्वस्त हुआ. मैंने कुकर में थोड़ी खिचड़ी चढ़ाई. आखिर पेट की भी अपनी पुकार होती है. कबतक अनसुना किया जा सकता है भला. अचार के साथ थोड़ा बहुत निगल कर हम बरामदे में बैठ गये. वह रात कयामत की रात ही लग रही थी. हमारे बीच संवाद तक गायब हो चुके थे जैसे मुहल्ले से चहल-पहल. कुर्सी पर उनींदे से बारी-बारी जगकर हमने रात बितायी.

बीच-बीच में पुलिस की गुजरती गाड़ियों का सायरन हमारे लिये सुरक्षा का आश्वासन लगता. आखिर सुबह भी हुई. दिन में दस से बारह बजे कर्फ्यू में ढील की घोषणा हुई. रात शांतिपूर्वक गुजर चुकी थी. ग्यारह बजे नरेन बाइक से बाजार गये. जरूरी चीजों की ढेर सारी खरीदारी करने. कौन जाने हालात आगे भी कैसा हो. मैंने ढेर सारे निर्देशों के साथ डरते-डरते भेजा. मसलन, किसी से बात नहीं करना, कोई टिप्पणी नहीं करना, कोई सुगबुगाहट हो तो सीधे घर आना, एक आज्ञाकारी बच्चे की तरह नरेन हाँ में सिर हिलाते रहे. धड़कते दिल से मैं इंतजार करती रही जैसे बाजार में हमलावरों की भीड़ नरेन का इंतजार कर रही हो. नरेन वापस आ चुके थे. इसी बीच यादव जी हाल पूछने आये. उनका तो भरा-पूरा परिवार था जबकि हम पति-पत्नी, दो छोटे बच्चों के साथ रहते थे. आदिल उनके यहाँ काम करता था.

पौधों की देखभाल, झाड़ू वगरैह लगाना, मैंने सोचा, इन्हें तो आदिल की मौत का दुःख होगा ही. आखिर साथ रहते-रहते कुत्ते के संग भी आदमी की आत्मीयता हो जाती है. आदिल तो फिर भी कुछेक वर्षों से उनका नौकर था. चाय लेकर बैठक में आई तो यादव जी अपने विचार प्रकट कर रहे थे.‘जानते हैं, नरेन बाबू ये कौम ही ऐसी है. खायेंगे, रहेंगें यहाँ और रूहों का सुकून तलाशेंगे जिन्ना की कब्र के आसपास. वहाँ तो किसी हिन्दू को इतनी अहमियत नहीं दी जाती. यहाँ तो इन्हें सिर पर चढ़ा रखा है वोट के सौदागरों ने.’ मैंने चाय टेबुल पर रख नरेन के चेहरे पर गौर किया. पता नहीं वहाँ सहमति थी या असहमति पर असमंजस जरूर स्पष्ट था. यादव जी अपनी रौ में थे. ‘अब देखिये न, अनवर मियाँ की गरीबी देखकर उस लौंडे को काम पर रख लिया वरना अपनी जात वालों की कमी तो नहीं थी.’ बात स्पष्ट करते हुए कहा. ‘उसदिन आदिल को पप्पू की माँ ने ही बागीचा भेजा था कच्चे आम के लिये. कई दिनों से मैं चटनी बनाने के लिये जोर दे रहा था. अब उन्हें क्या पता था कि लौंडा लौट के ही नहीं आएगा. ये तो अच्छा हुआ बात खुली नहीं वरना मुझे भी लपेट लेते. आज की सुबह ही अनवर मियाँ के यहाँ कुछ पैसा देने के बहाने गया था पर वैसी कोई चर्चा...... .’ यादव जी की सारी चालाकियाँ अब मेरी समझ में आ रही थी. उफ़ जाति और कौम की बिना पर ही आदमी की संवेदना भी पैदा होती है, मिटती है. आदमी के सोच का घटियापन आखिर किस सीमा पर खत्म होगा? तभी फोन की घंटी बजी. नरेन के उसी मित्र का फोन था. नरेन ने बताया, डॉ शर्मा नहीं रहे. मोहन बता रहा था, अल्पसंख्यक समुदाय का प्रतिरोध तो शायद धीमी पड़ जाए पर बहुसंख्यकों में उबाल है. कुछ बड़े नेताओं के आने की भी चर्चा है. हालात इतनी जल्दी सुधरने वाले नहीं लगते. यादव जी जा चुके थे.

चिंतामग्न नरेन की चाय अधपिये ठंडी हो चुकी थी. जूठे कप समेटती मैं आने वाले समय का सामना करने का हौसला जुटा रही थी. मन ही मन सोचा, बच्चों का ऐसे माहौल में कुछ दिनों तक स्कूल नहीं भेजना ही मुनासिब होगा. नरेन से कहूँगी आज ही डिब्बाबंद दूध, चाय, चना वगैरह लाकर रख दे . पुलिस की गाड़ी फिर सायरन बजाती निकल गई. बेमन मैं घर को व्यवस्थित करने में जुट गई. आशंकाओं से ग्रस्त मन सारे घटनाक्रम की तह तक पहुँचना चाहता था. आखिर पिछले तीन दिनों में हम आमजनों ने इतना कुछ सहा. सालों का हमारा आपसी सामंजस्य डगमगा गया. इन सारी घटनाओं का जिम्मेदार आखिर कौन है? क्या सिर्फ वो ‘ततैया’ जिसने सहज प्रवृत्तिवश उस अकेले लड़के पर आक्रमण कर दिया था. उस जहर की तो काट हो सकती थी शायद. पर इस जहर की कोई काट नहीं जिसे इन अवसरवादी ‘ततैयों’ ने समाज को दंगे रूपी डंक के जरिये दिया था.


लेखिका का परिचय :सम्प्रति: लेखन एवं अध्यापनप्रकाशित पुस्तक: तपती धरती पे नंगे पाँव(काव्य संग्रह)प्राप्त सम्मान: सहारा समय कथा चयन सम्मान, कादम्बिनी क्लब सम्मान, सरोजनी नायडु सम्मान, साहित्य कलारत्न सम्मान, साहित्य गौरव सम्मान
संपर्क : सीमा स्वधा द्वारा प्रिंस पैलेस, बनकटवा,डाकघर-बगहा,जिला-पश्चिम चंपारण,बिहार-845101.मोबाइल-9801267638

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