कविता : अश्क

By Prabhat Khabar Digital Desk
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कविता : अश्क

-विनोद सिंह-


मन आकुल व्याकुल विरह विकल

व्यथित बोझिल थकित हर पल।

हां!सच में सुकून पाता है वह

आंखों से आते जब अश्क निकल।।



मन हृदय हल्का हो जाता है

मन स्वच्छ सुघर हो जाता है।

हां ,अश्क के प्रबल प्रवाह में

विघ्न-विषाद बह जाता है।।



जब मन आपा खो देता है

अंतर आकुल हो रोता है।

नयन जल नीर बहा कर के

अपनी मलिनता धोता है।।



अरे!रोक इसे ये रूकेगा नहीं

चाहे लाख करो छिपेगा नहीं।

सुख-दुख के भावातिरेक जहां

बन नैन-प्रपात बहेगा वहीं।।



हां!बड़भागी है वह भाई

बहाता जिस पर है अश्क कोई।

सजल संवेदना न मिलता तो

बहु विपदा सहता कैसे कोई।।



ऐ अश्क तुम्हारा मूल्य नहीं

तू अमिय अंबु है शून्य नहीं।

नहीं वास तुम्हारा जिस हिय में

हां!जड़ है वह, चैतन्य नहीं।।

(कवि लंबे से लेखन से जुड़े हैं और भावुक करने वाली कविताएं लिखते रहे हैं)

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