कहानी : सियाबर सिपाही

By Prabhat Khabar Digital Desk
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कहानी :  सियाबर सिपाही

- रमेश चंद्र-

रे, आज दसे बजे से देख रहे हैं तू हरदम बेसाइडे हांकता है ? हट, सवारी के जाए दे. रिक्शेवाले ने 'जय बजरंगबली' बोला और सलामी ठोक दी. सियाबर को सबकुछ मिल गया. हंसते हुए बोले, रे जिला-जवारी, देसे गया कि नां ? अब का जांय हुकुम, जबसे गली-गली बैटरी वाला टेम्पू मेंड़रियाने लगा, पेट पर आफ़त आ गया. लोग पलट के न ताकते. सगरी दिन खींचो फिर भी डेढ़-दू सौ न बचता है. ऊपर से सत्तर जमा करायी, पैडिल-पंचर अपने कपारे. एइमे खाए का, बचाए का ? भोरे-भोरे मालिक मटियातेल व मोबिल की शीशी थमा देता है- खींचो कमानी अउर चमकाओ रिक्शा.चलाता हूं मालिक, सामने दूगो आदमी खड़ा है, शायद टिशन जाएगा.

ससुर औकात से बेसी काहे लादता है ? नाड़ी दुहा जायी रे ठेला, सुना न, का कह रहे हैं ? कबो ओवरलोडिंग का हेभी दफ़ा लगा चालान काट देंगे. सियाबर पलट कर चिलाए.'भूत-पिसाच निकट नहिं आवै, महावीर जब नाम सुनावै..!' ठेलेवाले ने सुमरा तो सियाबर खुश हो बोले, ठीक है, जा..जा, बाकि देह-दशा पर धेयान दे. ससुर, दुबरा के तरोई हो गया है.

सोमारी मियां सगड़ लिए आए.मोतियाबिंद की मारी आंखें कम ही देख पाती हैं. ई खानदानी लछमिनिया घोड़ी ही थी जो पार लगा रही थी.जानती थी, परिवार का पेट उसकी पीठ पर पलता है सो सगरी दिन सरकती रहती.सोमारी सलाम बजा बोले, बाबा-पीर के सलाना जलसा में सूफियाना कौवाली है,चलेंगे हुकुम ? सियाबर को मुहमांगी मुराद मिल गई. अरसा बाद रूही ग़िज़ा मिल रही थी.कीर्तन- कौवाली कभी नगा न हुए.रात-रात भर जाग के देखते.बढ़िया झलवहिया भी थे.आखर धर लेते तो आखिर तक बेताल न होते. गला भी गज़ब का था. मानस की चौपाइ व हनुमान- चालीसा पर महारत हासिल थी.धीरे-से बोले- मियां, अबकी गच्चा न देना. गुज़रे साल गोटी बिचला दिया था.

सियाबर का तो सगरी संसार अपना था.बाकि, अदावत दो जन से खुल्लमखुल्ला थी.एक- लहेरिया काट बाइकर्स.ई लहेरिया पकड़ा जाय तो छठी का दूध ईयाद करा देते.तीन दिन पहिले तीन गोड़ा को तीन-तीन सौ उठा-बैठक कराए.बच्चू नाक रगड़ माफी मांगे, कान पकड़, काली माई की किरिया खाए तब जाके छुटकारा मिला.लोग खूब हंसे- 'ठीक से नाड़ सूखा भी ना कि छव- छेदा जींस पहिन हवा में उधियाने लगे.अब अउर चलो नगिनिया चाल..!' दूसरा पीरू पनहेरी था.इ कबो भाव न दिया.रेट एकदम टाइट लेता.पांच का पान चार में काहे दे ? बस डिंठ पर चढ़ा हुआ था.सियाबर सैकड़ों तोख-परतोख देते, कई चौक-चौराहे का रेट बताते बाकि बन्दा टस से मस न होता. झमक के बोलता- हुँह, खाएंगे भर दिन में एक खिली, दु बार सुपारी मांगेंगे, कबो सेंका चाहिए, कबो चिती चाहिए, लवंग, इलायची ऊपर से.तीन बार चुना लेंगे, तवना पर दुनिया भर के लेक्चर झाड़ेंगे..! बीड़ा का बीड़ा पान जब बड़े-बड़े हाकिमों को सप्लाई जाता है त सियाबर कवन खेत की मूली ! बस इसी बात पर ठनी रहती.सियाबर ने भी गांठ बांध ली थी- बाबू, जे दिन फोटर पर चढ़ गए ओ दिन आटे-दाल का भाव मालूम करवा दूंगा.गरमिंटी जमीन पर दूकान डाले सियाबर सिपाही से सीना-तानी..? बावजूद, पीरू पनहेरी रेट न घटाया.मर मिसमिसा के पंच टकिया हवाले करना ही पड़ता.गिरते-पड़ते दिन गुजरिए रहे थे !

कहानी :  सियाबर सिपाही

आठ बजे तक सोया शहर दस बजते-बजते ऐसे भागने लगता है जैसे सिधवलिया मील में गन्ना गिरा भुखाइल बैल घर भागते हैं. आज भंयकर जाम लगा था. सियाबर को बड़ी मशक्कत करनी पड़ी. जब ट्राफिक सामान्य हुई तो इत्मिनानन की सांस ली. फिर पीरू के पास आए-भयवा, बढ़िया पान खिलाओ.तनि कत्था-चूना जम के लगाओ.बन्दा बिना देखे पान बनाता रहा.इसी बीच पीरू की बड़ी बेटी आसमां आई.पढ़ने में जहीन आसमां दर्जा नौ की छात्रा थी.नातिया-कलाम पेश करती तो शमा बंध जाता.बिला नगा अब्बू को खाना पहुंचाती फिर स्कूल निकल जाती.सियाबर को आठ साल से यहां पान खाते देख रही थी.आज देखते ही 'चाचू सलाम' बोली फिर जाने लगी.सियाबर ने जाती आसमां को गौर से देखा- उसकी चुन्नी आज चलती रहती तो वह भी इस उमर को पा गई होती.ओफ़, पोलियो के मारे पैर कभी खड़े ही न हुए.मइया तो दगा दे गई, बेटी ने भी कहां साथ निभाया ! धत, ऐसे कोई मांझी बीच धार में पतवार फेंकता है ! तनिक न सोची, बावला बाप किस किनारे लगेगा ? लोग बहुत समझाए, सियाबर शादी कर लो, दुपहरिया की झुलसी ज़िन्दगी, तीजहरिया में छांव पा जाएगी.आख़िर, थक-हार के आओगे तो कवने गाछ सुस्ताओगे ? सियाबर टक-टकी लगा ताकते रहते.ड्यूटी से बचा समय अब मंदिर-मठों पर बीतने लगा.पवनसुत-शरन में पहुंचे तो बोझिल ज़िन्दगी हल्की होती लगी.पीरू ने पान बढ़ाया तो ख़ुद में लौटे.देखा, आसमां कब की जा चुकी थी !

सियाबर के चले जाने के बाद पीरू ग्राहकों को इनके किस्से सुनाने लगा- हज़रत जब नया-नया बहाल हुए थे तो ड्यूटी का जोश दूना रहता.एक दिन कोई चोर पकड़ाया.बड़े बाबू ने थाने वास्ते चलता कर दिया.सियाबर ने साथ लिए चोर को देखा- ससुर, देह में गिद्ध न अघाए और लमहर सेंधमारी में हाथ लगा दिए, अब जाओ दु साल के लिए.मोड़ पर चोर ने सियाबर को सलामी मारी- हुज़ूर, आख़िर त हमको भीतर जाना ही है, एगो लुखुत है मालिक- मैं बीड़ी पीता हूं, आप तनिक इहें ठहरें, सामने दूकान से एक अठन्नी बीड़ी ले आता हूँ.सियाबर दिमाग दौड़ाए- हमको बुड़बक बुझता है का रे, तेरे जैसे तेरह को अंदर करवा चुके हैं. इहां खड़ा कराकर कहीं उधरे से पार हो गया तो ? चोर हाथ जोड़ चिरौंती किया- हुज़ूर,चोर-सिपाही के धरम पर बट्टा न लगाऊंगा,कसम बजरंगबली, बस गया और आया.सियाबर खुश हो मुड़ी हिलाए- त ऐसा कर, तूं ही इहां खड़ा रह, पैसवा दे, हमीं ला देते हैं.और, सियाबर चल दिए.जब बीड़ी ले लौटे तो चोर नौ दु ग्यारह हो गया था.नतीज़ा, अच्छा न हुआ.सियाबर सस्पेंड हो गए.सेवा में स्याही लग गई.महकमे में यह घटना ढेर दिन तक कही-सुनी गई.दु साल बाद सस्पेंसन उठा.दूसरी घटना सुनाते पीरू चटकारे लिया- बोर्ड परीक्षा में नकल करते एक लड़का- लड़की धराए.हाकिम का फरमान हुआ, इन्हें थाने ले जाओ.थाना थोड़ी दूर था और मोटर से जाना था सो डर जैसी कोई बात न थी.फिर, सियाबर भी मुस्तैद थे.चलती गाड़ी में लड़की रोने लगी- 'ओह, अब तो हनुमान जी से विश्वास उठ गया.सुना था, पवनसुत पार लगा देते हैं, इहां त मंझधारे में नाव डूब गई.मइया सुनेगी तो जीते जी मर जाएगी.' लड़की के छ-छ पांती आंसू सियाबर से देखे न गए.कोई हनुमानजी से विश्वास उठाए, ई कैसे हो सकता है ! कुछ सोचे.फिर जाम में जैसे ही गाड़ी रुकी, उन्होंने लड़की को नीचे उतार दिया.आंखें बंद की और खुद में खो गए.गाड़ी जब थाने पहुंची तो देखा, लड़का भी गायब था.दोहरी मार पड़ी.नतीज़ा, फिर बुरा हुआ.सियाबर दूसरी बार सस्पेंड हुए.अबकि तनि लम्बा खींच गया.साथी सिपाही कहते- सियाबर, तेरी सेवा में तो ललकी स्याही लग गयी.अब का होगा ? रिटायर करोगे तो फूटी पाई पिंसिल न मिलेगी.बन्दा हाथ उठा कहते- संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरे हनुमत बलबीरा..! और मस्ती में यूँ रमे रहते, जैसे कुछ हुआ ही न हो.कई दंड-विधान के बाद सस्पेंसन उठा.सख़्त चेतावनी दी गई.तबसे ट्राफिक ड्यूटी सम्भाल रहे हैं.इन पर तो कोई असरे न हुआ- जैसे कोंहड़ा छानी पर, ओइसे कोंहड़ा भुंइया..! पीरू ऐसे कह रहा था जैसे सचित्र- कथा पढ़ी जा रही हो.लोग खूब हंसे, कुछ सियाबर पर तरस भी खाए.

अचानक सरकारिया एलान हुआ.शहर में ट्राफिक की बढ़ती समस्या पर सरकार ने कड़ी कार्रवाई की.सड़क के दोनों किनारे साफ़ होने लगे. साथ ही, साफ़ होने लगे छोटे-छोटे दुकानदार. हप्ते दिन के अंदर सड़क ख़ाली करने का कानूनी नोटिस आ गया. अब कोई गुंजाइश न बची. ढर्रे पर चलती ज़िन्दगी, ब्रेक लगने से तिलमिला गई. दो दिन और रह गए थे.सियाबर मुच्छों पर ताव देते पान खाने चले. सोच रहे थे, आज पहाड़ के नीचे आए ऊंट को करीब से देखेंगे. फिर पूछेंगे- अब का होगा बबुआ ? जब पास पहुंचे तो देखा, पीरू ने आधी दूकान हटा ली थी. बुझा चेहरा बहुत कुछ बयां कर रहा था.सियाबर को देखा तो नज़रें नीची कर ली.इसी बीच आसमां आ गई.खाने का टिफ़िन रखते बोली- अब्बू, मैथ- सायन्स के टीचर रिटायर हो चले गए. कहें तो ट्यूशन ले लूं. जब तक नए सर आएंगे तब तक बोर्ड एग्जाम निकल चुका होगा. अच्छे मार्क्स के लिए यह जरूरी है. क्या कहते हैं..? पीरू ने कातर नज़र बेटी को देखा- रहने दे आसमां, अब ये न हो सकेगा. कल तक पूरी दूकान उठ जाएगी. दूकान उठने के साथ ज़िन्दगी के मायने भी उठ जाएंगे.इतने बड़े परिवार के साथ तुम्हरे ट्यूशन का बोझ लड़खड़ाते कन्धे शायद न उठा पाएं ! आसमां ने देखा, अब्बू पलकों पर आए आंसुओं के बोझ को संभालने की कोशिश कर रहे थे.फिर ओ रुकी नहीं. सियाबर ने जा रही आसमां के ख़ामोश पैरों को देखा, रहा न गया सो उधर ही चल दिए.आज पान न खाए.

छः माह बीते. ईद आई, ढेर सारी खुशियां लायी.अखबारों ने अपने मुख्य पृष्ठ पर ख़बर छापी-'पीरू पनहेरी की बेटी जिला टॉपर बनी.!'दूसरी ख़बर सुर्खियों तो न बनीं अलबत्ता रिक्शा व ठेले वालों को उदास जरूर कर गई.सोमारी मियां सगड़ वाले की तो कमर ही टूट गई. खबर आई कि सियाबर सिपाही बर्खास्त हो गए. हासिये पर हंसी जाती ज़िन्दगी के ज़ज़्बातों को जमीं कहां मय्यसर होती है भाई !

उस दिन आसमां के स्कूल में उत्सवी माहौल था.बतौर मुख्य अतिथि जिला कप्तान पधारे थे.टॉपर्स इन्ही के हाथों ईनाम पाने वाले थे.बारी- बारी से बच्चे बुलाए जाने लगे.आसमां की बारी आई तो लोगों ने आसमान उठा लिए.लगातार तालियों बजती रहीं.कैमरों के फ्लैश चमके.मंच पर जाने के पहले ही तमाम हाज़रिने मज़लिश खड़े हो गए.पीरू पनहेरी की बेटी आज महफ़िल की शान थी.गले में मेडल डाले जाने के पहले ही आसमां ने रोक दिया.फिर मुख्य अतिथि के हाथ पकड़ रोने लगी.सभी आवाक रह गए.आसमां बोली-सर, मैंने सुना है आप जिला के सबसे बड़े अधिकारी हैं.मेडल की जगह मुझे कुछ और दे दीजिए.मैं दामन फैलाकर अपने चाचू की नौकरी वापस मांगती हूं. और, सचमुच उसने दामन फैला दिए.साहब सन्न रह गए- बेटी तूं किस चाचू की बात कर रही है ? जी, सियाबर सिपाही. आज जो मेडल आप मेरे गले में डाल रहे हैं, इस मेडल के वास्ते चाचू ने अपनी नौकरी निछावर कर दी.साब जी, उनका इस धरती पर कोई न है.ओ परम भक्त हनुमान हैं.मैं दीगर मज़हब से आती हूं. बावज़ूद, उनके जानिब मैंने हनुमान चालीसा सीखा और, आसमां बुक्का फाड़ रो पड़ी. चारों तरफ नीरव सन्नाटा छा गया.कप्तान साहब ने बड़ी मुश्किल से आसमां को चुप कराया.फिर, विस्तार से घटना की जानकारी ली.

आसमां कहती गई- उस दिन जब अब्बू ने ट्यूशन दिलाने से इनकार किया तो दौड़ कर चाचू ने सरपरस्ती का हाथ रख दिया- बेटी, हिम्मत से काम लो. हौसले बुलंद रखो.जहां चाहो, जो चाहो, पढ़ो. पैसे की कमी न होगी. तेरे अब्बू की दूकान भी न हटेगी. मैंने पूछा- ये कैसे होगा, सबकी तो हट रही है ? ये मुझ पर छोड़ दो. और..सचमुच उन्होंने मेरी पढ़ाई ख़ातिर अपना गला घोंट लिया. रपट भेज दी कि सड़क- किनारे सगरी दूकाने हट गईं हैं, जबकि मेरे अब्बू की दूकान हटी न थी.अब्बू तो आज भी न जानते हैं कि ये सब उनका किया-धरा है.तीन महीने तक दूकान चलती रही.इस बीच एग्जाम भी निकल गया.बाद में किसी ने सच सामने ला दिया और चाचू..! सिसकियां फिर बंध गयी.साहब लगभग चीख़ ही पड़े- कहां है ओ पापी पवनसुत भक्त ? नहीं, साहब, मैंने बहुत कोशिश की, कई जगह ढूंढा लेकिन कहीं पता न चला.एक दिन बड़ी बहन को छोड़ने स्टेशन गई.अचानक चाचू दिख गए- ओ हाथ में केटली लिए घूम-घूम कर चाय बेच रहे थे.शरीर सुख कर कांटा हो गया था.मैं चिलायी-चाचू, चाचू ..! उन्होंने मुझे देख भी लिया लेकिन रुके नहीं.मैंने बहुत खोजा, लेकिन दुबारा दिखाई न दिए.मुझे लगा, शायद ओ मेरे सामने आना न चाहते थे सो कहीं छुप गए.तबसे रोज स्टेशन जाती हूँ, लेकिन चाचू का कहीं पता न चलता.बाद नमाज़, रोज़ दुआ करती हूँ- मौला, चाचू से सिर्फ़ एक बार मिला दे, उनके एहसान तो लौटा नहीं सकती, कम से कम शुक्रिया तो अदा कर लूँ ! ऐसे में इस मेडल का क्या मतलब रह जाता है ? अपनी बात कह आसमां कातर भाव साहब को ताकने लगी, जैसे कोई मासूम बच्ची अपनी फरियाद कर जवाब के इंतज़ार में मइया को ताकती है.साहब बोले, बेटी हमारे हाथ बहुत बड़े हैं.हम ढूंढ लेंगे तेरे चाचू को.फिर उन्होंने अपने मोबाईल नम्बर आसमां को दिए और गाड़ी की तरफ़ बढ़ गए.

सियाबर सिपाही को ढूंढने की कोशिश जारी रही.बैरक, छावनी सब छान मारे गए, सियाबर न मिले.गांव भी आदमी भेजे गए.वहां भी पता न चला.वक़्त ने एक छोटी-सी छलांग भरी.! फिर बसंती बयार बही.फिर होली आयी.

आसमां का दाखिला जिले के बड़े स्कूल में हुआ.पीरू व दीगर दुकानदारों को सरकारी दुकानें मिल गई.ज़िन्दगी फिर ढर्रे पर चल पड़ी.आसमां को सरकारी सायकिल क्या मिली, पैरों में पंख लग गए.वज़ीफे अलग से मिले.आज भी वह अब्बू का टिफ़िन लिए आती है.चारों तरफ़ देखती है, फिर चाचू को ढूंढती निगाहें उदासी लिए लौट जाती हैं.सियाबर की कुर्बानी जान, पीरू पागल-सा हो गया.महज रुपया भर के लिए हुज़्ज़त करने वाला हमदर्द फ़रिश्ता अब आंखों से ओझल था.

रमजान के पच्चीस रोज़े निकले तो शहर में चहल-पहल बढ़ गयी.आसमां पहली बार रोज़े रख रही थी.पीरू की बड़ी बेटी ईद मनाने आ रही थी.घर में दूनी खुशियां एक साथ आयीं.बड़ी दूकान की बड़ी आमदनी ने हालात बदल दिए.नन्हें नमाज़ियों ने महंगे कपड़ों की फरमाइश कर रखी थी.बेटी-दामाद के लिए कपड़े पहले ही ख़रीदे जा चुके थे.रात नौ बजे की ट्रेन से उन्हें आना था.सभी घण्टे भर पहले ही स्टेशन पहुंच गए.अम्मी बोली, अजी सुनते हैं, दामाद जो पान खाते हैं ओ लाए हैं न ? पीरू ने मुस्कराते हुए पांच बीड़े पान दिखाए.नियत समय पर ट्रेन आई.बेटी-दामाद उतरे.आसमां दौड़ कर बहन की गोद से मुन्ने को ले लिया.बाहर सोमारी मियां सगड़ लिए खड़े थे.आज बन्दे की बोहनी भी न हुई थी.पीरू को देखा तो ललचाई नज़र डाली- भैया, बैठो न, जो बुझाए सो दे देना.आसमां दौड़ कर सगड़ पर बैठ गयी.फिर सभी बैठे.लछमिनिया चल पड़ी.रामनगर मुहल्ले से जब सगड़ गुज़रा तो आसमां के कान खड़े हो गए.दूर मंदिर में हनुमान जी का कीर्तन हो रहा था.आवाज़ पहचानी-सी लगी.बेशब्री से बोली, सोमारी चाचा, मंदिर की तरफ़ चलो.सभी सकते में आ गए.सोमारी ने आसमां को देखा और मंदिर की तरफ़ सगड़ मोड़ ली.जैसे ही मंदिर पहुंचे, आसमां मुन्ने को बहन की गोद में डाली और मंदिर में घुस गई.सामने जो देखा तो आंखें विश्वास न कर पायीं.लेकिन ये सच था.उसने बिना देरी किए कप्तान साहब को फोन कर दिया.सियाबर सिपाही गाए जा रहे थे-

' श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मन मुकुर सुधारि, बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि.'...लेकिन यह क्या, आवाज़ लड़खड़ा गयी सियाबर की.जबर्दस्त खांसी उखड़ी.जर्जर शरीर साथ न दिया.मूर्छित हो गिर पड़े.आसमां आगे बढ़ माइक थाम ली और गाने लगी-

'बुद्धिहीन तनु जानिकै सुमिरौं पवन कुमार,

बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं हरहु कलेश विचार.'

ये पहला अवसर था जब दीनी मज़लिश में नातिया-कलाम गाने वाली बेटी यहाँ सुरीली आवाज़ में हनुमान- चालीसा गाए जा रही थी-

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर.

जय कपीस तिहुँ लोक उजागर..

कहानी :  सियाबर सिपाही

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और मनोरथ जो कोई लावै.

सोहि अमित जीवन फल पावै..

कोई आधे घण्टे तक आसमां गाती रही.अब्बू, अम्मी और बड़ी बहन ने भी पीछे से स्वर भरना शुरू किया.मंगलवार होने के चलते मंदिर में लोग पहले से थे.सुरमई स्वर ने शमां बांधा तो बेतहाशा भीड़ आ गई.जन-समाज झुमने लगे.इसी बीच कप्तान साहब आए.लोग सन्न रह गए.आसमां ने आगे गाना शुरू किया-

साधु संत के तुम रखवारे.

असुर निकंदन राम दुलारे..

कान में चौपाई के स्वर जाते ही सियाबर को होश आ गए.सामने जो देखा तो विश्वास न हुआ.बड़ी तन्मयता से कप्तान साहब कीर्तन सुन रहे थे.उधर आसमां ने अंतिम चौपाई को ऊंचा स्वर देना शुरू किया-

पवनतनय संकट हरन मंगल मूरति रूप.

राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप. आसमां को लगा, कुछ अजीब-सी कैफ़ियत तारी हो रही है.पवनसुत के मुख खुल रहे हैं.उसमें ब्रम्हांड गोते लगा रहा है.स्वर टूटने लगा.रोज़े से लरज़ा शरीर तार सप्तक में लगे सुर की ऊंचाई को झेल न सका.लड़खड़ाई और मूर्छित हो गई.इसके पहले कि आसमां जमीन पर गिरे, कप्तान साहब ने आगे बढ़ थाम लिया.एक बार फिर सभी सन्न रह गए.पानी के छींटे जब मुख पर पड़े तो आसमां ने आंखें खोली.देखा- सियाबर चाचू रो रहे थे.कप्तान साहब की आंखें भी गंगा-जमुना हो गईं थीं.कप्तान साहब बोले- 'आज पहली बार हिंदुस्तान के सही स्वरूप को देख रहा हूँ.हिन्दू-मुस्लिम को साथ आलाप भरते देख आह्लादित हूँ.मजहब के इस मायने को सैल्युट करता हूं ' फिर सियाबर से मुखातिब हो बोले- लो ये मेडल, अपनी बिटिया के गले में डाल दो.इसे मेरे हाथ से पहनना गंवारा नहीं था.बड़ी जतन से सम्भाल कर रखा हूं.सियाबर ने कांपते-कांपते मेडल गले में डाल दिया.आसमां बोली- साहब, सिर्फ़ मेडल ही ..! नहीं रे पगली, मैं तेरे चाचू की नौकरी भी साथ लाया हूँ.लेकिन हुज़ूर मैंने तो भारी पाप किया है, सियाबर बोले.कप्तान साहब सियाबर के कंधे पर हाथ रख बोले- कुछ पाप नेकियों पर भी भारी पड़ जाते हैं.कल से ड्यूटी पर आ जाना.और, कप्तान साहब निकल गए.

आसमां ने ज़िद कर सियाबर को साथ ले लिया.सोमारी मियां ने सगड़ बढ़ाया.सभी साथ जा रहे थे. थकी आसमां को नींद आने लगी.अब कोई शिकवा भी नहीं था.अभी कोस भर जाना था.उसने चाचू की गोद में सर रख दिया.लम्हे न लगे, बड़ी आराम से सो गई.पीरू ने सियाबर की तरफ़ पान बढ़ाया.सियाबर बोले- कहीं फिर तूँ उल्टा-पुल्टा रेट मांगने लगा तो मैं कहाँ से दूंगा ? वैसे, मेरे पास अभी अधेला भी नहीं है.मइया ने पति के हाथ से पान छीन सियाबर के मुंह में डाल दिया.बन्दे की बोलती बंद हो गई. सभी साथ ठहाके लगाए.उधर सोमारी मियां ने घोड़ी को पुचकारा.आज बूढ़ी लछमिनिया के पैरों में जवानी की फुर्ती समा गई थी.उसने सरपट भागना शुरू किया..!

लेखक का परिचय

रमेश चंद्रा बिहार के सिवान जिले के बड़हरिया प्रखंड अंतर्गत कैलगढ़ के रहने वाले हैं. वर्ष 1991 में बिहार शिक्षा सेवा में आये. कथा व नाट्य साहित्य पर लिखते रहे हैं. मुख्यमंत्री अक्षर आँचल योजना में श्रेष्ठ कार्य निष्पादन के लिए इन्हें 'अक्षर श्री' उपाधि से अलंकृत किया जा चुका है. 26 नवंबर, 2018 को नशामुक्ति दिवस पर इनके द्वारा लिखित गीत को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने काफी सराहा था. इस गीत पर लघु फ़िल्म निर्माणाधीन है, जो पूरे बिहार में प्रसारित होगी. इनकी कई कहानियां विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित हो चुकी है.

संपर्क : rameshchandra0100@gmail.com

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