कहानी : अतीत की खूंटी

By Prabhat Khabar Digital Desk
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कहानी : अतीत की खूंटी

-राघवेन्द्र सिंह-

पिछले 8 साल से शेखर का मन उसी अतीत की खूंटी से टंगा है. खूंटी के सहारे कुछ यादें लटकी हैं , जिनमें से अधिकतर को जंग लगने लगा है. कितनी बार शेखर को लगा कि खूंटी उखाड़ कर फेंक दे पर कुछ था जो रोक रहा था. जाने क्या था...जो भी था शेखर के अहं को तुष्ट करता था. आदमी का अहं तुष्ट होना ही उसके जीवन की सार्थकता है. धन और सम्मान भी तो अहं तुष्टि का ही साधन हैं. यदि तुम्हें धन और सम्मान का मोह नहीं था तो फिर मुझमें क्या कमी थी? शेखर ने जैसे ये सवाल अनायास ही अपने से पूछा. और अचानक ही ईवा का वो जवाब याद हो आया जो अब तक शेखर ने खूंटी से उतारा नहीं है....

"मन नहीं है तुम्हारे साथ का"

"और मेरे मन का क्या?" शेखर ने बच्चे सा सवाल किया.

"इसमें discuss करने जैसी तो कोई बात है नहीं...." और ईवा की तरफ से बात और संबंध ख़त्म.

मन क्या है? मन तो कही भी लगा सकते है..जबर्दस्ती परीक्षा के समय पढाई में मन नहीं लगाते? या किसी पार्टी में जबर्दस्ती भी तो झेलना होता है कई लोगों को. फिर तुम मुझसे जबर्दस्ती मन क्यों नहीं लगा सकती?.....घर आते ही शेखर ने यह sms ईवा को भेजा जिसका जवाब आज तक नहीं आया.

और आज का एक दिन है...सोशल मीडिया पर एक अपडेट बस किया था शेखर ने.....delhi i am coming. और उधर से ईवा का whatsapp मैसेज आया कि lets meet when you get free for a cup of tea. क्या बदल गया...उस एक दिन जब 8 साल पहले शेखर एक पूरी रात ईवा के फ्लैट के बाहर मिलने का इंतेजार करता रहा और ईवा को मिलने का मन नहीं था. और आज का एक दिन जब मन है तो एक बार शेखर के मन की जानना भी ठीक नहीं समझा ईवा ने.

कहानी : अतीत की खूंटी

when you get free....इस वाक्य में कितना आत्मविश्वास झलकता है ईवा का.....जैसे उसे पता हो कि कुछ भी हो शेखर ईवा के लिए समय तो निकालेगा ही. शेखर को अचानक ही गुस्सा हो आया अपने पर...क्या जरूरत थी सोशल मीडिया पर अपडेट की. पर उसे भी तो कहां पता था कि ईवा जवाब देगी.

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दिल्ली आये आज तीसरा दिन हो गया है. तबसे हजारों बार शेखर ने मैसेज बॉक्स तक जा के मैसेज टाइप करने से हाथ पीछे खींच लिया है. हर बार ईवा का स्टेटस ऑनलाइन होता है और एक टीस सी उठती है शेखर के मन में...

एक ख्याल आता है कि एक शाम प्लान करते हैं और फिर एक दूसरा ख्याल आता है कि जो 8 साल मैंने रेत में पानी की तरह बहा दिया उसका क्या?

सार थीं तुम मेरे जीवन की...सोपान भी. खुश होता तुम्हारे साथ किसी दूर पहाड़ी शहर में एक छोटी सी नौकरी कर...जहां तुम होतीं, सर्द मौसम होता, बादलों से घिरा आसमान होता, चमकीली धूप होती, मैगी हर नुक्कड़ पर मिलती, और पैसे उतने ही होते जितने में हम दोनों सुख से रह लेते. न किसी समाज की जवाबदेही, न किसी दुनियादारी की मगजमारी. फ्लैट नहीं होता....एक घर होता जिसके पीछे एक अमलतास का पेड़ होता और दोपहरों में हम दोनों वहां ऊंघ रहे होते. एक हलके से कंबल में. चाय की पत्ती तुम लाती और दूध चीनी मैं....शाम की चाय हम दोनों के सहजीवन का toast होती. इतने ही सीधे सपने थे मेरे. न जाने क्यों तुम्हें मेरी इस दुनिया में रस नहीं दिखा था.

पर मैंने ये दुनिया गढ़ी भी तो थी तुम्हारे मन के लिए....तुम्हें भी तो बेहद पसंद था ये सब...धूप में अमलतास के पेड़ के नीचे सोने का ख्याल भी तो तुम्हारा ही था...

तुमने कहा था और मैंने बिना सोचे दुनिया गढ़ भी दिया था...भले उसके लिए अमलतास पहाड़ पर उगाना पड़ा हो...मैंने तुम्हारे कहे के लिए जो दुनिया गढ़ा वो दुनिया मैंने अकेले अपनाया....बिना अपने मन का सोचे कि मुझे कैसी दुनिया पसंद है....और तबसे जिए जा रहा हूं उसी दुनिया में.....

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ईवा को लगा कि कॉल करके एक बार शेखर से पूछ ले कि वो कहीं फिर से तो बिना मिले शिलांग नहीं चला गया. कितनी ही बार ऐसा हुआ है...जाने कैसे शेखर के लिए उसके मन में झिझक सी बैठ गई है....ऐसा पहले नहीं था...रात के तीन बजे भी बात करने में तकल्लुफ नहीं थी...इधर खुद शेखर ने ही यह दूरी बना दी है.

कुछ भी हो मैं रह नहीं सकती तुम्हारे साथ....प्रेम है तुमसे...पर उसे पति पत्नी और live in पार्टनर के दायरों में नहीं बांध सकती मैं.......मैं किसी का होके नहीं रहना चाहती....मेरी पहचान सिर्फ मेरा नाम है....हां मुझे पसंद है तुम्हारे घर के पीछे लगा वो देवदार का पेड़ जिसको अक्सर तुम प्रोफाइल फोटो की जगह लगाते हो....यह भी समझती हूं की तुम एक संकेत देते हो उस फोटो के जरिये...पर फिर भी मुझे तुम्हारी पत्नी बनने की बात नहीं जंचती.

कहानी : अतीत की खूंटी

हासिल करने की उस पूरी प्रक्रिया से मैं दूर और तटस्थ रहना चाहती हूं.... माना कि तुम मुझे हासिल करने के लिए निर्वासन में जीवन जी रहे हो.....पर मैं भी यहां सुख में नहीं हूं...जाने क्यों एक अपराधबोध में जी रही हूं....तुम्हारे निर्वासन के लिए खुद को जिम्मेदार मानती हूं अक्सर.... मन होता है कि तुम्हारे साथ रहूं आकर.... पर शेखर मैं ये कैसे कहूं तुमसे कि मैं ऊब जाती हूं हर उस चीज से जो प्रिय है मुझे...तुमसे ऊब के फिर मेरे जीवन की दिशा क्या होगी ये सोच के ही डर लगता है...तुम दूर हो तो एक उम्मीद रहती है कि कभी कभार कुछ बात हो जायेगी....तुम कभी आ कर मिल लोगे....कभी कुछ कहोगे जो मन को भिगो देगा....ऊब जाउंगी तो तुम भी बासी हो जाओगे...फिर तुम्हारा आना और जाना बेमतलब हो जायेगा मेरे लिए....ये आखिरी चीज होगी जो जीवन में चाहूंगी...

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एक notification ने तन्द्रा भंग किया ईवा का...... Shekhar has updated his status "Back in the cold mountains and dark foggy days....."

आज शेखर को दिल्ली आये पांचवां दिन था...

लेखक कापरिचय

लेखक भारतीय प्रशासनिक सेवा में हैं और वर्तमान समय में बिहार के बक्सर जिले के डीएम पद पर पदस्थापित हैं. इन्होंने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से राजनीतिशास्त्र में परास्नातक किया. है. 2013 बैच के आईएएस अधिकारी हैं. कहानी लेखन में इनकी विशेष रुचि है.

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