पाकिस्तान में शिया और सुन्नी एक दूसरे के खून के प्यासे, ये है जंग की वजह

Shia and Sunni Muslims conflict
Violence In Pakistan : पाकिस्तान का कुर्रम जिला जो सोवियत-अफगान युद्ध के दौरान मुजाहिदीनों का लॉन्चिंग पैड था, आज एक बार फिर हिंसा की आग में दहक रहा है. वर्चस्व की लड़ाई में शिया मुसलमान बहुल इस क्षेत्र में सुन्नी अकसर उन्हें टक्कर देते रहते हैं. यहां की सरकारों ने भी सुन्नी आतंकवादी संगठनों का समर्थन ही किया है, हालांकि हिंसा की आग बढ़ जाने की वजह से यह क्षेत्र सरकार के लिए सिरदर्द बन चुका है और अब कोशिश यह की जा रही है कि इलाके में शांति स्थापित की जाए.
Violence In Pakistan : पाकिस्तान भारत का एक ऐसा पड़ोसी मुल्क है, जहां राजनीतिक हिंसा के साथ-साथ जातीय हिंसा की घटनाएं भी लगातार होती रहती हैं. इस तरह की हिंसा में अनगिनत लोग अपनी जान भी गंवाते हैं. हालिया मामलों की बात करें तो नवंबर महीने में पाकिस्तान के खैबर-पख्तूनख्वा के कुर्रम इलाके में शिया-सुन्नी आपस में भिड़ गए और अबतक 100 से ज्यादा लोगों की मौत हुई. मरने वालों में महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं.
पाकिस्तान के प्रतिष्ठित अखबार डॉन का दावा है कि कुर्रम में हिंसा की घटनाओं में लगातार वृद्धि हुई है. यह इलाका पाकिस्तान के बनने से पहले भी अशांत रहा है. डॉन का दावा है कि 21 नवंबर को ताजा झड़पें शिया और सुन्नी मुसलमानों के बीच हुईं, जब मंडोरी के पास यात्री वाहनों पर घात लगाकर हमला किया गया. इस घटना में 44 शिया मुसलमान मारे गए. इस घटना का बदला लेने के लिए कुर्रम के बग्गन बाजार में आग लगा दी गई जिसमें करीब 40 लोग मारे गए. इन इलाकों में सीजफायर का ऐलान हो चुका है बाजवूद इसके हिंसा जारी है. 26 नवंबर को शिया-सुन्नी विवाद में 10 लोग मारे गए और 21 घायल हैं. पुलिस ने इस बात की पुष्टि की है.
कुर्रम में हिंसा का इतिहास क्या है?
खैबर पख्तूनख्वा राज्य के कुर्रम जिले में सांप्रदायिक हिंसा का इतिहास काफी पुराना है. भारत-पाकिस्तान के बंटवारे से पहले 1938 में सांप्रदायिक हिंसा हुई थी, उस वक्त कुर्रम के आदिवासी अपने लोगों का समर्थन करने के वहां जाना चाहते थे. उस वक्त कुर्रम में उनकी इच्छा का सम्मान नहीं हुआ और अन्य समुदाय ने इसका विरोध किया, उसी वक्त से यहां सांप्रदायिक हिंसा शुरू हुई, जो बदस्तूर आज भी जारी है.
इन घटनाओं ने कुर्रम को बनाया जंग का मैदान

कुर्रम जिला जनजातीय बहुल है. इस जिले को ‘तोते की चोंच’ कहा जाता है क्योंकि इसकी भौगोलिक स्थिति इस प्रकार की है कि यह अफगानिस्तान से बिलकुल सटा है. काबुल से यहां की दूरी बहुत कम है. कुर्रम की सीमा पर ही ओसामा बिन लादेन का मुख्यालय भी था. जहां वह अपने लड़ाकों को प्रशिक्षण दिया करता था. इन पांच वजहों से कुर्रम में है अशांति.
1. ईरान में इस्लामिक क्रांति के बाद उसे इस्लामिक गणराज्य घोषित किया गया. ईरान एक शिया बहुल देश है, जबकि सऊदी अरब में सुन्नी आबादी है. कुर्रम में शिया और सुन्नी का ही विवाद था, जिसे इन दोनों देशों ने भड़काया और यह एक युद्ध क्षेत्र बन गया.
2. सोवियत-अफगान युद्ध के दौरान कुर्रम मुजाहिदीनों का लॉन्चिंग पैड बना, जहां से उन्हें अफगानिस्तान भेजा जाता था. साथ ही युद्ध से भाग रहे सुन्नी लोगों के लिए यह शरणस्थली भी बना. जिसकी वजह से यहां आतंकवाद का जन्म हुआ.
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3. कुर्रम में शिया आबादी ज्यादा है, जबकि सुन्नी यहां अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहते हैं, जिसकी वजह से यहां कई आतंकवादी गुट पनपे जिनका उद्देश्य शिया आबादी को खत्म करना है. शिया विरोधी पाकिस्तानी तालिबान (टीटीपी) जैसे आतंकवादी गुट इसका प्रमाण हैं.
4. कुर्रम क्योंकि जनजातीय इलाका था, इसलिए 1947 के बाद इन इलाकों को संघ प्रशासित जनजातीय क्षेत्र बनाया गया, जहां सीधे केंद्र के कानूनों के हिसाब से शासन चलता था. लेकिन धीरे-धीरे यहां हिंसा इतनी बढ़ती गई कि 2018 में इन जनजातीय क्षेत्रों को जिनमें कुर्रम भी शामिल था, खैबर पख्तूनख्वा प्रांत का हिस्सा बना दिया गया. इनमें सात जनजातीय जिले शामिल थे. इन जनजातीय क्षेत्रों के लोगों और सांसदों ने भी इस प्रस्ताव का विरोध किया था. उनका यह मानना था कि जनजातीय क्षेत्रों का अलग राज्य बनाया जाए. इसकी वजह से भी यहां तनाव लगातार बढ़ा है.
क्या है हिंसा का ताजा मामला
कुर्रम में हिंसा का ताजा जमीन विवाद से जुड़ा है. विवाद में शिया और सुन्नी समुदाय शामिल है. पाकिस्तान की आबादी का लगभग 80 प्रतिशत सुन्नी मुसलमान हैं. कुर्रम जिले की आबादी 7.85 लाख है (2023 की जनगणना के अनुसार). इनमें से 99% पश्तून हैं जो तुरी, बंगश, जैमुश्त, मंगल, मुकबल, मसुजाई और परचमकानी जनजातियों से संबंधित हैं. जिले की कुल आबादी का 45 हिस्सा शिया मुसलमानों का है. शिया मुसलमान कुर्रम के ऊपरी हिस्से में रहते हैं, जबकि निचले और मध्यम भागों पर सुन्नियों का कब्जा है. शिया समुदाय में शिक्षा स्तर बेहतर है. इनके बीच लड़ाई की वजह प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जे को लेकर है. ब्रिटिश काल में इन क्षेत्रों पर अपना कब्जा बनाए रखने के लिए उन्होंने कुछ जनजातियों को फायदा पहुंचाया और उनके नाम पट्टे कर दिये, जिसकी वजह से आपसी तनाव बढ़ा.
शिया और सुन्नी मुसलमान में क्या है फर्क

इस्लाम धर्म को मानने वालों की दो शाखाएं हैं. एक को शिया और दूसरे को सुन्नी कहा जाता है. पूरे विश्व में मुसलमानों की कुल आबादी का 85 प्रतिशत सुन्नी और 15 प्रतिशत शिया समुदाय से हैं. इन दोनों संप्रदायों के बीच जो मुख्य अंतर है वह पैगंबर मोहम्मद साहब के उत्तराधिकार को लेकर है. 632 ई में पैगंबर मोहम्मद साहब की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार को लेकर उनके अनुयायियों में मतभेद हुआ, क्योंकि मोहम्मद साहब का कोई पुरुष उत्तराधिकारी नहीं था. मोहम्मद साहब ने अपने उत्तराधिकारी के बारे में कुछ घोषणा भी नहीं की थी. यही वजह था कि विवाद हुआ. एक पक्ष यह मानता था कि उत्तराधिकारी का चुनाव आम सहमति से हो, जबकि दूसरा पक्ष सिर्फ पैगंबर के वंशजों को ही उनका उत्तराधिकारी बनना चाहता था. पहले पक्ष को इस विवाद में जीत मिली और पैगंबर के करीबी दोस्त अबू बकर को उनका उत्तराधिकारी और इस्लाम का पहला खलीफा चुना गया. यह संप्रदाय सुन्नी के रूप में जाना जाता है. दूसरा पक्ष जो पैगंबर के वंशजों को उनका उत्तराधिकारी बनना चाहता था उसे शिया संप्रदाय के रूप में जाना जाता है.
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By रजनीश आनंद
रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.
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रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.
आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.
रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.
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