भारत के नैतिक भूगोल के मानचित्रकार थे राही मासूम रजा

Updated at : 16 Mar 2026 7:51 PM (IST)
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Rahi Masoom Raza

राही मासूम रजा

Rahi Masoom Raza : रजा की मृत्यु के साढ़े तीन दशक बाद उन्हें पढ़ते हुए एक अजीब-सी बेचैनी महसूस होती है. जिन आशंकाओं के बारे में उन्होंने दशकों पहले लिखा था, वे आज कहीं अधिक परिचित लगती हैं. यह डर, कि पहचान इंसानियत पर हावी हो सकती है, अब केवल साहित्यिक या अतीत की चिंताएं नहीं रह गयी हैं.

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-प्रो मनोज कुमार झा-
(राज्यसभा सांसद, राजद)

Rahi Masoom Raza : राही मासूम रजा की पुण्यतिथि केवल साहित्यिक कैलेंडर की एक तारीख भर नहीं है. यह एक निमंत्रण या यों कहें कि एक नैतिक पुकार है, कि हम उस भारत की कल्पना को फिर से याद करें, जो कभी हमारे लिए स्वाभाविक लगती थी, लेकिन अब दिन-प्रतिदिन नाजुक होती दिखाई देती है. रजा केवल गांवों के जीवन या पहचान की बेचैनियों के लेखक नहीं थे. एक गहरे अर्थ में वह भारत के नैतिक भूगोल के मानचित्रकार थे.

उन्होंने पूर्वी उत्तर प्रदेश की मिट्टी से लिखा, उन बोलियों और स्मृतियों से लिखा, जो अक्सर आधिकारिक इतिहासों में जगह नहीं बना पातीं. उनकी दृष्टि किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं थी. गांवों की गलियों और शहरों की असहज मित्रताओं के माध्यम से उन्होंने उस सभ्यता को चित्रित किया, जो अपनी विविधता को बचाये रखने के लिए संघर्ष कर रही थी.


आज भी इसकी सबसे ईमानदार पड़ताल करते हैं कि सांप्रदायिक पहचानें कैसे धीरे-धीरे कठोर होने लगती हैं. ये किताबें नारे नहीं लगातीं, बल्कि असहज कर देने वाली सच्चाइयों को लगभग फुसफुसाहट की तरह सामने लाती हैं. ‘आधा गांव’ को ही देखिये. सतह पर यह पूर्वी उत्तर प्रदेश के गंगौली गांव की कहानी है, जो विभाजन के आसपास के वर्षों में घटित होती है. लेकिन गंगौली केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं है; वह एक रूपक है-उस दौर के समाज और राजनीति का एक छोटा-सा रूप. गंगौली में हिंदू भी रहते हैं, मुसलमान भी. वे आपस में झगड़ते हैं, एक-दूसरे से मजाक करते हैं, उधार लेते-देते हैं, एक-दूसरे की शादियों में शामिल होते हैं और दुख-सुख बांटते हैं. धर्म की सीमाएं मौजूद हैं, लेकिन साथ रहने की लंबी आदत उन्हें नरम बना देती है.


सदियों तक भारत का सामाजिक जीवन केवल पहचान की अमूर्त धारणाओं के आधार पर संगठित नहीं था. वह निकटता के आधार पर बना था-साथ रहने, साथ बहस करने और साथ जीने-मरने की निकटता पर. पर धीरे-धीरे राजनीति की हवाएं गंगौली तक पहुंचने लगती हैं. अफवाहें तथ्यों से तेज चलने लगती हैं और भड़काऊ नारे समझ से पहले आ जाते हैं. और फिर रोजमर्रा की भाषा बदलने लगती है. पड़ोसी अब केवल पड़ोसी नहीं रहता; वह एक धार्मिक पहचान का प्रतिनिधि बनकर दिखाई देने लगता है. रजा इस परिवर्तन को किसी नाटकीय टकराव से नहीं दिखाते.

इसके बजाय वह कहीं अधिक बेचैन कर देने वाली प्रक्रिया दिखाते हैं-परिचय का धीरे-धीरे क्षरण. मजाक अब निर्दोष नहीं रह जाता. हरेक टिप्पणी में संदेह घुलने लगता है. जो बातचीत कभी सहज बहती थी, वह अब ठहरने लगती है. ‘आधा गांव’ में विभाजन की त्रासदी केवल भूगोल का विभाजन नहीं है. असली त्रासदी विश्वास का सिकुड़ जाना है. रजा दिखाते हैं कि गांव अचानक नहीं बदलता; बदलती है वह नजर, जिससे लोग एक-दूसरे को अब देखने लगते हैं. यदि ‘आधा गांव’ साझा जीवन के टूटने को ग्रामीण संदर्भ में दिखाता है, तो ‘टोपी शुक्ला’ वही बेचैनी शहरी मित्रता के भीतर ले आता है.

इस उपन्यास के केंद्र में है टोपी शुक्ला, एक हिंदू युवक और उसका मुसलमान मित्र इफ्फन. उनकी मित्रता स्वतंत्रता के बाद के उन दशकों में विकसित होती है, जब गणतंत्र का सपना अभी जीवित है, लेकिन उसके ऊपर संदेह की हल्की छाया भी पड़ने लगी है. टोपी एक बेचैन दिमाग है. वह विरासत में मिले पूर्वाग्रहों पर सवाल उठाता है. इफ्फन के भीतर एक शांत-सी चेतना है कि समाज उसकी पहचान को उसकी इंसानियत से पहले पढ़ता है.


रजा की मृत्यु के साढ़े तीन दशक बाद उन्हें पढ़ते हुए एक अजीब-सी बेचैनी महसूस होती है. जिन आशंकाओं के बारे में उन्होंने दशकों पहले लिखा था, वे आज कहीं अधिक परिचित लगती हैं. यह डर, कि पहचान इंसानियत पर हावी हो सकती है, अब केवल साहित्यिक या अतीत की चिंताएं नहीं रह गयी हैं. फिर भी रजा निराशावादी नहीं थे. उनकी कहानियों और उनके पात्रों की उदासी के नीचे एक जिद्दी विश्वास भी छिपा है, कि भारत की सभ्यता के भीतर सहअस्तित्व की एक गहरी प्रवृत्ति है. हमें यह बिसराना नहीं चाहिए कि भारतीय गणतंत्र केवल संवैधानिक प्रावधानों से नहीं बना. यह रोजमर्रा की परंपराओं-यानी साझा त्योहारों, साझा बाजारों, साझा भाषाओं और साझा दुख-सुख से बना.


ये वे अदृश्य आधार थे, जिन पर भारतीय समाज की इमारत खड़ी थी. जब यह आधार कमजोर होता है, तो क्षति तुरंत दिखाई नहीं देती. संस्थाएं चलती रहती हैं, चुनाव होते रहते हैं और लोकतंत्र की बाहरी संरचना कायम रहती है. पर धीरे-धीरे कुछ और कमजोर होने लगता है, टूटने और बिखरने-सा लगता है. इसीलिए आज राही मासूम रजा को याद करना केवल साहित्यिक श्रद्धांजलि नहीं है. यह एक असहज प्रश्न से सामना करना है : क्या भारत का विचार केवल कानूनों से टिक सकता है? हमारे समय का खतरा केवल खुला टकराव नहीं है. असली खतरा लोगों के बीच की दूरी का धीरे-धीरे सामान्य हो जाना है.


जब पड़ोसी एक-दूसरे को साझा जीवन के हिस्से की तरह नहीं, बल्कि अमूर्त पहचान के रूप में देखने लगते हैं, तब गणतंत्र अपनी भावनात्मक नींव खोने लगता है. इसलिए असली प्रश्न यह नहीं है कि भारत का विचार अचानक ढह जायेगा या नहीं. अधिक चिंताजनक यह है कि वह साझा कल्पना, जिसने गणतंत्र को अर्थ दिया था, धीरे-धीरे सिमटने लगे. रजा के शब्द आज भी इतनी शांति से, लेकिन इतनी गहरी बेचैनी के साथ हमारे भीतर गूंजते हैं. वे हमें याद दिलाते हैं कि भारत को कभी पहचानों की किलेबंदी नहीं होना था. उसे एक घर होना था. एक ऐसा घर, जहां अनेक इतिहास, अनेक आस्थाएं, अनेक भाषाएं और अनेक भोजन बिना भय के साथ रह सकें. क्या हम अब भी उस घर में रहना चाहते हैं?

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