इतिहास में कुछ राजा अपनी तलवारों के लिए याद किए जाते हैं.कुछ अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए. लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं, जिनकी सबसे बड़ी ताकत उनका विश्वास होता है.Manipur के इतिहास में अगर किसी एक व्यक्ति ने धर्म, कला, संगीत और समाज को एक सूत्र में बाँधा, तो वह थे महाराजा भाग्यचंद्र, जिन्हें आज भी लोग सम्मान से राजर्षि भाग्यचंद्र कहते हैं.मैंने डियाना से पूछा...अगर किसी एक व्यक्ति को मणिपुर की सांस्कृतिक आत्मा कहा जाए, तो वह कौन होगा?उन्होंने बिना एक पल गंवाए जवाब दिया- राजर्षि भाग्यचंद्र अगर वे नहीं होते, तो शायद आज दुनिया मणिपुरी रासलीला को इस रूप में कभी नहीं जान पाती.यह केवल एक राजा की कहानी नहीं है. यह उस क्षण की कहानी है, जब आस्था ने कला को जन्म दिया और भक्ति ने एक पूरी सभ्यता की सांस्कृतिक भाषा बदल दी.लेकिन यह परिवर्तन किसी महल में बैठे शक्तिशाली राजा ने नहीं किया था.यह शुरुआत हुई एक ऐसे राजा से, जो उस समय अपना राज्य खो चुका था.वह निर्वासन में थे.राजनीतिक अस्थिरता थी.भविष्य अनिश्चित था.लोककथाएं कहती हैं कि...ऐसे समय में, लोककथाएं कहती हैं कि एक रात उन्हें स्वप्न आया. स्वप्न में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण प्रकट हुए. उन्होंने राजा से कहा कि काइना पहाड़ी पर खड़े एक विशेष कटहल के वृक्ष से उनकी प्रतिमा बनाई जाए. केवल इतना ही नहीं, उन्होंने प्रतिमा का स्वरूप भी बताया और यह भी कहा कि उनके सम्मान में एक विशेष रास का आयोजन किया जाए.इतिहासकार इस घटना को अलग-अलग दृष्टि से देखते हैं. कोई इसे धार्मिक अनुभव मानता है, कोई सांस्कृतिक आख्यान. लेकिन एक बात पर लगभग सभी सहमत हैं- उस स्वप्न ने मणिपुर की सांस्कृतिक दिशा बदल दी.डियाना मुस्कुराते हुए कहती हैं, हमारे यहां लोग इस घटना को केवल कहानी नहीं मानते. हमारे लिए यह हमारी सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा है.राजा ने वापस लौटकर वही किया, जो उन्होंने स्वप्न में देखा था. काइना से कटहल का वृक्ष लाया गया. उसी लकड़ी से भगवान श्री गोविंदजी की प्रतिमा बनाई गई. आज भी इंफाल का श्री गोविंदजी मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि मणिपुर की सांस्कृतिक चेतना का केंद्र माना जाता है.लेकिन राजा भाग्यचंद्र यहीं नहीं रुके.उन्होंने समझ लिया था कि केवल मंदिर बनाकर कोई परंपरा जीवित नहीं रहती. परंपरा तब जीवित रहती है, जब वह लोगों के जीवन का हिस्सा बन जाए. इसलिए उन्होंने भक्ति को केवल पूजा तक सीमित नहीं रहने दिया। उन्होंने उसे संगीत दिया, साहित्य दिया, वेशभूषा दी, रंगमंच दिया और सबसे बढ़कर- नृत्य दिया.यहीं से जन्म हुआ उस परंपरा का, जिसे आज पूरी दुनिया मणिपुरी रासलीला के नाम से जानती है.मैंने डियाना से पूछा, क्या रासलीला केवल एक नृत्य है?वह हल्का-सा हंस पड़ीं. यही तो सबसे बड़ी गलतफहमी है. बाहर से आने वाले लोग इसे dance performance समझते हैं. हमारे लिए यह पूजा है.यह उत्तर अपने आप में बहुत कुछ कह देता है.भारत में शास्त्रीय नृत्य की अनेक traditions हैं.भरतनाट्यम है, कथक है, ओडिसी है, कुचिपुड़ी है.हर शैली की अपनी सौंदर्य-दृष्टि है. लेकिन मणिपुरी रासलीला का उद्देश्य दर्शकों का मनोरंजन करना नहीं है. इसका उद्देश्य भक्त और भगवान के बीच उस अदृश्य संबंध को अनुभव कराना है, जिसे शब्दों में कहना कठिन है.राजा भाग्यचंद्र ने भागवत पुराण के रासपंचाध्यायी अध्यायों को आधार बनाकर विद्वानों, संगीतज्ञों और नृत्याचार्यों को एक साथ बैठाया. परंपरा के अनुसार गुरु स्वरूपानंद और अन्य आचार्यों ने मिलकर नृत्य की ऐसी शैली विकसित की, जिसमें हर गति, हर मुद्रा और हर चक्कर केवल सौंदर्य नहीं, बल्कि साधना का माध्यम बने.सन् 1779 के आसपास पहली बार इस रास का सार्वजनिक आयोजन हुआ. कहते हैं कि स्वयं राजा की पुत्री ने उस पहली राधा की भूमिका निभाई थी. चाहे यह प्रसंग ऐतिहासिक हो या लोकविश्वास, इससे यह अवश्य स्पष्ट होता है कि राजपरिवार ने इस परंपरा को केवल संरक्षण नहीं दिया, बल्कि स्वयं उसका हिस्सा बना.डियाना एक दिलचस्प बात बताती हैं.अगर आप पहली बार रासलीला देखेंगे, तो आपको लगेगा कि कलाकार बहुत धीरे-धीरे नृत्य कर रहे हैं. लेकिन यही उसकी खूबसूरती है. यहाँ हर गति भीतर की यात्रा है. कोई जल्दबाज़ी नहीं है. कोई प्रदर्शन नहीं है.सच भी है.मणिपुरी रासलीला को देखकर ऐसा नहीं लगता कि कलाकार मंच पर कुछ दिखाने की कोशिश कर रहे हैं. ऐसा लगता है जैसे वे किसी और लोक में प्रवेश कर चुके हों और दर्शक अनायास उस आध्यात्मिक यात्रा के सहभागी बन गए हों.यही कारण है कि इस नृत्य में चेहरे की vivid expressions कम दिखाई देती हैं. भाव भीतर बहता है. हाथों की गति कोमल होती है. कदम धरती पर ऐसे पड़ते हैं, मानो उसे चोट न पहुँचे. पूरा वातावरण एक ऐसी शांति से भर जाता है, जो शब्दों से नहीं, केवल अनुभव से समझी जा सकती है.फिर मैंने डियाना से एक और सवाल पूछा-क्या केवल रासलीला ही बदली, या पूरा समाज?उन्होंने कहा, पूरा समाज.यह उत्तर सुनने में छोटा है, लेकिन इसके भीतर पूरा इतिहास छिपा है.मंदिर से समाज तक : मणिपुर की जीवंत वैष्णव परंपराराजा भाग्यचंद्र ने मंदिरों को केवल पूजा का स्थान नहीं रहने दिया. वे शिक्षा के केंद्र बने. संगीत की शिक्षा वहीं हुई. मृदंग वादन, जिसे आज पुंग के नाम से जाना जाता है, वहीं विकसित हुआ. वैष्णव साहित्य की रचना हुई. संस्कृत और मीतै भाषा के बीच संवाद गहरा हुआ. सामुदायिक जीवन मंदिरों के इर्द-गिर्द संगठित होने लगा.यानी मंदिर केवल भगवान से मिलने की जगह नहीं थे.वे समाज से मिलने की जगह भी थे.आज अगर आप इंफाल के श्री गोविंदजी मंदिर जाएं, तो वहां केवल आरती नहीं दिखेगी. आपको परंपरा सांस लेती हुई दिखाई देगी. सफेद वस्त्र पहने श्रद्धालु, बच्चों के हाथों में मंजीरे, पुंग की गूंज, सामूहिक कीर्तन और भगवान के लिए तैयार होने वाला भोग- यह सब मिलकर समझाता है कि मणिपुर में धर्म केवल निजी आस्था नहीं, बल्कि सामुदायिक संस्कृति भी है.डियाना ने मुस्कुराकर कहा, हमारे यहां भगवान के लिए 108 प्रकार का भोग तैयार किया जाता है। लेकिन उससे भी बड़ी बात यह है कि उसे बनाना भी एक सामूहिक सेवा माना जाता है.शायद यही मणिपुर की सबसे बड़ी खूबी है.यहां भक्ति केवल मंदिर की दीवारों के भीतर नहीं रहती.वह संगीत बन जाती है.नृत्य बन जाती है.कविता बन जाती है.और धीरे-धीरे... पूरे समाज की पहचान बन जाती है.लेकिन अगर आपको लगता है कि कहानी यहीं पूरी हो जाती है, तो अभी उसका सबसे जीवंत अध्याय बाकी है.क्योंकि मणिपुर में भगवान केवल मंदिरों में नहीं रहते.साल में एक बार...वे स्वयं रथ पर बैठकर हर गली, हर मोहल्ले और हर घर के दरवाज़े तक आते हैं.और शायद, भारत में रथयात्रा का ऐसा रूप आपको कहीं और देखने को नहीं मिलेगा.प्रभात खबर सनातन विशेष : मणिपुर की सनातन यात्रा - 1: जहां सनातन ने किसी पर विजय नहीं पाई, बल्कि एक सभ्यता का हिस्सा बन गयाप्रभात खबर सनातन विशेष : Gen Z Special: Idea of Shiva ही है भारत की सबसे पुरानी कल्चरल यूनिटी का आधार प्रभात खबर सनातन विशेष : कश्मीर की सनातन-यात्रा -1: Kashmir का भूला हुआ Kashi…जहां कभी खड़ा था 12 मंजिला शिव मंदिर