Sindoor tradition : हिंदू महिला के लिए क्यों इतना खास है सिंदूर, 5000 साल पुराने सभ्यता में भी मिलती है ये परंपरा

Published by : Rajneesh Anand Updated At : 11 Apr 2025 12:56 PM

विज्ञापन

सिंदूर लगाने की परंपरा

History of Wearing Sindoor : सिंदूर यानी भारतीय विवाहित महिला की पहचान. सिंदूर लगाने की परंपरा भारतीय जनमानस में कब से मौजूद है यह बता पाना मुश्किल है, लेकिन यह बात तय है कि यह भारतीय इतिहास का अंग है. विवाह के पश्चात माता सीता और द्रौपदी भी सिंदूर लगाती थी और देवी दु्र्गा के शक्ति का स्रोत ही सिंदूर माना जाता है. सिंदूर की परंपरा सिंधु घाटी के सभ्यता से भी जुड़ी है.

विज्ञापन

History of Wearing Sindoor : भारतीय समाज में सिंदूर लगाने की परंपरा हजारों वर्षों से चली आ रही है. हिंदू मान्यता के अनुसार यह अखंड सौभाग्य का प्रतीक है. यह एक विवाहित स्त्री की पहचान और उसके समर्पण और शक्ति का भी प्रतीक माना जाता है. चूंकि सिंदूर हमारी परंपरा का हिस्सा है और परंपरा कहने का अर्थ ही है कि वह हमारी संस्कृति का वह पक्ष जिसकी शुरुआत के बारे में स्पष्ट जानकारी उपलब्ध ना हो. बावजूद इसके यह कहा जा सकता है कि सिंदूर लगाने की परंपरा का इतिहास हजारों साल पुराना है और धार्मिक मान्यताओं में भी यह मौजूद है.

कब हुई थी सिंदूर लगाने की शुरुआत?

भारतीय सभ्यता में सिंदूर लगाने की परंपरा काफी पुरानी है. शिव पुराण में ऐसा बताया गया है कि माता पार्वती ने वर्षों की तपस्या के बाद जब भगवान शंकर को पति के रूप में प्राप्त किया, तो उन्होंने सिंदूर को अपना सुहाग चिह्न बनाया और यह भी कहा कि जो स्त्री सिंदूर लगाएगी उसके पति के आयु लंबी होगी. स्कंद पुराण में भी सिंदूर का जिक्र मिलता है. त्रेता युग में माता सीता को विवाह के वक्त सिंदूर लगाया गया था, वहीं द्वापर में द्रौपदी भी सुहाग चिह्न के रूप में सिंदूर लगाती हैं. भारतीय परंपरा के अनुसार सिंदूर सौभाग्य का प्रतीक है, वह एक विवाहित स्त्री की पहचान भी है. भारतीय परंपरा में देवी दुर्गा शक्ति का प्रतीक हैं. देवी दुर्गा को माता पार्वती का ही स्वरूप माना जाता है. देवी दुर्गा लाल सिंदूर लगाती हैं और उसे उनकी शक्ति का प्रतीक माना जाता है.

सिंधु घाटी सभ्यता में भी मौजूद है सिंदूर लगाने की परंपरा

Harappan civilization sindoor evidence
सिंधु घाटी सभ्यता में सिंदूर लगाने की परंपरा

सिंधु घाटी सभ्यता को विश्व की सबसे प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक माना जाता है. इस काल की जो मूर्तियां सामने आई हैं, उसमें स्पष्ट तौर पर महिलाओं को सिंदूर लगाए हुए दिखाया गया है. देवियों की मूर्तियों में सिर के बीच में सीधी रेखा बनी हुई है, जिसपर लाल रंग भरा है, जिसके बारे में यह अनुमान लगाया जा रहा है कि यह सिंदूर ही है. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से जुड़े पुरातत्वविद्‌ डॉ एनजी मजूमदार और जॉन मार्शल ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि सिंधु घाटी सभ्यता की कुछ स्त्री मूर्तियों के सिर के बीच में लाल रंग की रेखा खिंची हुई है, जो आज के सिंदूर लगाने की परंपरा से मेल खाती प्रतीत होती है.

वैदिक काल में सिंदूर लगाने की परंपरा

भारतीय इतिहास के वैदिक काल में भी सिंदूर लगाने की परंपरा का स्पष्ट उल्लेख है. ऋग्वेद और अथर्ववेद में यह बताया गया है कि विवाहित स्त्रियां पति की लंबी आयु के लिए सिंदूर लगाती थीं. वैदिक युग में सिंदूर को कुंकुम कहा जाता था. सिंदूर को देवी लक्ष्मी और पार्वती से जोड़ा जाता है, क्योंकि यह उनके सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है.

आधुनिक युग में सिंदूर की परंपरा

Hindu wedding practices
भारतीय समाज में सिंदूर लगाने की परंपरा

भारतीय परंपरा में आधुनिक युग में भी सिंदूर लगाने की परंपरा मौजूद है. विवाह के वक्त सिंदूरदान की परंपरा होती है, उसके बाद ही विवाह संपूर्ण माना जाता है. सिंदूर एक विवाहित स्त्री के सम्मान से जुड़ा मसला आज भी माना जाता है. बदलते दौर में कई स्त्रियां पूरी मांग में सिंदूर भले ही ना लगाती हों, लेकिन सिंदूर को सौभाग्य का प्रतीक आज भी माना जाता है. पर्व-त्योहार और विशेष अवसरों पर सिंदूर लगाने की परंपरा आज भी स्वीकार्य है. इस तरह की मान्यता है कि सिंदूर नकारात्मक ऊर्जा से बचाता है. आयुर्वेद यह कहता है कि सिंदूर में हल्दी, पारा और चूना रहता है, जो मानसिक संतुलन को बनाए रखता है.

Also Read : बेलछी गांव में हुआ था बिहार का पहला नरसंहार, 11 दलित की हत्या कर आग में झोंक दिया गया था

हिंदू और मुसलमान के बीच भारत में नफरत की मूल वजह क्या है?

विभिन्न विषयों पर एक्सप्लेनर पढ़ने के लिए क्लिक करें

 पंबन ब्रिज और रामसेतु का है रामेश्वरम से खास नाता, क्यों सरकार ने बनाई थी रामसेतु को तोड़ने की योजना

क्या है ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, कैसे करता है काम?

विज्ञापन
Rajneesh Anand

लेखक के बारे में

By Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola