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आवारा कुत्तों पर अदालत का फैसला संतुलित

Updated at : 25 Aug 2025 5:25 AM (IST)
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Supreme Court on stray dogs

सुप्रीम कोर्ट

Supreme Court on Stray Dogs : सुप्रीम कोर्ट ने बहुत संतुलित निर्णय दिया है. जब आप कुत्तों को सड़कों पर खाना खिलाते हैं, तो कुत्ते उस क्षेत्र को अपना क्षेत्र मानने लगते हैं और वहां से हटते नहीं. ऐसे में, कई बार कुत्ते छोटे बच्चों पर हमला भी कर देते हैं.

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-डॉ आरटी शर्मा,अध्यक्ष, पेट एनिमल वेलफेयर सोसाइटी-

Supreme Court on Stray Dogs : सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों को डॉग शेल्टर में रखने के अपने पूर्व के आदेश में संशोधन करते हुए कहा है कि अब कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण के बाद वापस छोड़ा जायेगा तथा आक्रामक व रेबीज संक्रमित कुत्तों को अलग रखा जायेगा. शीर्ष अदालत ने यह भी आदेश दिया है कि स्थानीय निकाय तत्काल प्रभाव से प्रत्येक वार्ड में आवारा कुत्तों को खाना खिलाने के लिए एक निश्चित स्थान बनायेंगे, कुत्तों को सड़कों या सार्वजनिक स्थानों पर खाना नहीं खिलाया जा सकता. शीर्ष अदालत का यह फैसला देशभर में समान रूप से लागू होगा.


सुप्रीम कोर्ट ने बहुत संतुलित निर्णय दिया है. जब आप कुत्तों को सड़कों पर खाना खिलाते हैं, तो कुत्ते उस क्षेत्र को अपना क्षेत्र मानने लगते हैं और वहां से हटते नहीं. ऐसे में, कई बार कुत्ते छोटे बच्चों पर हमला भी कर देते हैं. ऐसे में न्यायालय का यह निर्णय कि सड़कों पर कुत्तों को खाना नहीं खिलाना चाहिए, सबको स्वीकार्य होना चाहिए. अनेक लोग तो मॉल में दूसरी, तीसरी मंजिल पर भी कुत्तों को खाना खिलाने लग जाते हैं. तीन-चार मंजिली बिल्डिंग में भी लोग कुत्तों को ग्राउंड फ्लोर की सीढ़ियों पर खाने खिलाते हैं. इससे कुत्ते उस पूरे स्थान को अपना मानने लगते हैं और वहां से हटते ही नहीं है. इससे लोगों को, विशेषकर छोटे बच्चों को, आने-जाने में परेशानी होती है.

कुत्ते प्रेमियों को इस सामाजिक पहलू से भी सोचने की जरूरत है. उन्हें थोड़ा संवेदनशील और जागरूक होने की आवश्यकता है. उन्हें चाहिए कि वे सोसाइटी के किसी कोने या कहीं और किसी कोने में एक जगह बना लें और वहीं कुत्तों को खाना खिलायें. इससे किसी को समस्या नहीं होगी, बल्कि इस तरह से सभी चीजें व्यवस्थित हो जायेंगी और जो पशुओं से थोड़ा डरते हैं, हो सकता है वे भी उनके दोस्त बन जाएं, धीरे-धीरे वे उनसे प्रेम करने लगें. यह भी जानना जरूरी है कि पशु किसी को भी ऐसे ही नहीं काट लेते हैं. जब उन्हें डर लगता है या वे असुरक्षित महसूस करते हैं, तभी वे किसी पर हमला करते हैं, उसे काटते हैं.

कोर्ट ने रेबीज से संक्रमित कुत्तों को शेल्टर में रखने और उन्हें वापस न छोड़ने की जो बात कही है, वह भी सही है और समझदारी वाली बात है. रेबीज एक घातक बीमारी है. एक बार किसी को हो जाए, तो वह जान लेकर ही जाती है, क्योंकि इसका इलाज ही नहीं है. जब हम रेबीज ग्रस्त मनुष्य को अलग-थलग रख सकते हैं, तो पशुओं को क्यों नहीं? हालांकि इसमें किसी का कोई दोष नहीं है, क्योंकि रेबीज एक अधिग्रहित रोग यानी एक्वायर्ड डिजीज है. कुत्ते रेबीज के साथ जन्म नहीं लेते. यह बीमारी उनमें उन रेबीज ग्रस्त जानवरों के जरिये आती है, जो उन्हें आकर काट लेते हैं. ऐसे कुत्ते जब किसी को काटते हैं, तो वह मनुष्य भी संक्रमित हो जाता है. इस तरह रेबीज फैलती है. रेबीज को फैलने से रोकने के लिए सरकार को कदम उठाने की जरूरत है. कई देशों में रेबीज पर नियंत्रण के लिए बड़े पैमाने पर टीकाकरण होता है, ऐसा हमारे देश में भी होना चाहिए, क्योंकि हमारा देश रेबीज मुक्त देश नहीं है.


एक और महत्वपूर्ण बात. इस बात का पता कैसे चलेगा कि किस कुत्ते को रेबीज है, किसे नहीं? कौन-सा कुत्ता आक्रामक है, कौन-सा नहीं? इसके लिए जितने भी पेशेवर लोग- मनोवैज्ञानिक, डॉक्टर, नीति-निर्माता- हैं, उन्हें एक दिशा-निर्देश तैयार करना चाहिए. ऐसे शेल्टर होम बनाने की जरूरत है, जहां ऐसे कुत्तों को अलग से रखा जाए, जिन्हें इस तरह का संक्रमण है या होने की आशंका है. और फिर, वहां पर पेशेवर उनका ब्लड सैंपल लेकर जांच करे कि कौन-सा कुत्ता संक्रमित है और कौन-सा नहीं. इसके साथ ही वह उसके व्यवहार पर भी निगरानी रखे. यदि कुत्ते को रेबीज है, तो उसे उसी शेल्टर में रखें और नहीं है, तो बिहेवियर काउंसेलिंग के लिए दूसरे शेल्टर में ले जाएं. यदि उसका व्यवहार सही है, वह आक्रामक नहीं है, तभी उसे लाकर उसके इलाके में छोड़ें. इसे लेकर एक बहुत ही मानवीय और नैतिक दृष्टिकोण होना चाहिए. हमारे लिए सोशल और इकोलॉजिकल बैलेंस बनाना जरूरी है.


सुप्रीम कोर्ट का जो निर्णय आया है, उस पर यदि तत्काल युद्ध स्तर पर अभियान चलाया जाए, तो बहुत अच्छा रहेगा. इसमें विशेषज्ञ नीतियां बनाएं, आरडब्ल्यूए को भी इनमें शामिल करें, ताकि उन्हें भी महसूस हो कि वे भी इस अभियान में अपना योगदान दे रहे हैं. एक बात और, जो पशु प्रेमी हैं और जो पशु से जुड़े एनजीओ हैं, उनको इस बात को लेकर जागरूकता फैलाने की जरूरत है कि हर कुत्ता रेबीज संक्रमित नहीं होता है, न ही हर कुत्ता आक्रामक होता है. यदि कोई कुत्ता आक्रामक है, किसी को काट रहा है, तो उस कुत्ते को अलग-थलग करने में प्राधिकरण की सहायता करनी चाहिए. इस मामले में स्थानीय निकाय की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण है. आखिर सारा काम स्थानीय निकायों को ही तो करना है. न्यायालय के निर्णय से आशा बंधी है कि इस मामले में सभी अपना-अपना योगदान देंगे.
(बातचीत पर आधारित)
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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