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बेरोजगारी का हो स्थायी समाधान

यह कुशल सिविल सेवा के लिए क्षमता निर्माण का समय है, जो भ्रष्टाचार मुक्त कल्याण प्रणाली, आधुनिक अर्थव्यवस्था और तेजी से बेहतर सार्वजनिक सामान प्रदान करने की चुनौतियों का सामना कर सके.

By वरुण गांधी
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वरुण गांधी, सांसद, भाजपा

fvg001@gmail.com

साल 2019 में हर घंटे एक भारतीय ने बेरोजगारी, गरीबी या दिवालियापन के कारण खुदकुशी की. करीब 25 हजार भारतीय 2018 से 2020 के बीच बेरोजगारी या कर्ज में डूबने के कारण आत्महत्या के लिए मजबूर हुए. प्रदर्शनकारियों ने रेलवे भर्ती प्रक्रिया में कथित खामियों को लेकर जनवरी, 2022 में रेलवे के डिब्बे फूंक दिये. सरकारी नौकरीवालों के लिए भी स्थिति ज्यादा बेहतर नहीं है. मई, 2022 में हरियाणा में 2,212 संविदा स्वास्थ्यकर्मियों की सेवाएं एक झटके में समाप्त हो गयीं. इनमें नर्स, सफाईकर्मी, सुरक्षा गार्ड और पैरामेडिकल स्टाफ शामिल हैं. इन लोगों को कोविड महामारी के दौरान काम पर रखा गया था. दिल्ली में लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज और राम मनोहर लोहिया अस्पताल सरीखे विभिन्न मेडिकल कॉलेजों/संस्थानों के सैकड़ों नर्सों, पैरामेडिकल स्टाफ, लैब तकनीशियनों आदि ने रातोंरात रोजगार अनुबंधों के खत्म होने का दंश झेला है.

शॉर्ट नोटिस पर लोगों को रखना और उन्हें हटाना हमारी कार्य संस्कृति का हिस्सा नहीं है, बल्कि इसे बाहर से आयात किया गया है. असम में 8,300 पंचायत और ग्रामीण विकास संविदाकर्मियों ने फरवरी 2022 में विरोध प्रदर्शन किया. वे 12-14 वर्षों से अनुबंध पर थे और उन्हें बोनस, भत्ते, पेंशन या वेतन संशोधन नहीं दिये गये. भारतीय टेलीफोन उद्योग के 80 श्रमिकों को एक दिसंबर, 2021 को सूचित किया गया कि उनकी सेवा समाप्त की जा चुकी है. अप्रैल, 2022 में छत्तीसगढ़ के राज्य बिजली विभाग के 200 संविदाकर्मियों पर पहले पानी की बौछार की गयी और फिर उन्हें गिरफ्तार किया गया. दरअसल, इस पूरे मामले में समस्या दोहरी है.

पहली, रिक्त पदों को पर्याप्त गति से नहीं भरा जा रहा है. जुलाई, 2021 में सभी स्तरों पर सरकार में 60 लाख से अधिक रिक्तियां थीं. इनमें से 9,10,513 केंद्रीय विभागों के पास थीं, जबकि पीएसयू बैंकों में लगभग दो लाख रिक्तियां थीं. राज्य पुलिस में 5,31,737 से अधिक रिक्तियां, जबकि प्राथमिक विद्यालयों में 8,37, 592 पद खाली हैं. सरकार ने डेढ़ वर्षों में मिशन-मोड में 10 लाख लोगों की भर्ती की बात कही है. हमें इस मोर्चे पर ज्यादा गंभीर पहल करनी होगी. दूसरे, जहां रिक्तियां भरी भी जा रही हैं, वो ज्यादातर संविदा के आधार पर ही हैं.

साल 2014 में 43 फीसदी सरकारी कर्मचारियों की नौकरी अस्थायी या संविदा पर थी. इनमें करीब 69 लाख लोग आंगनबाड़ी जैसे शीर्ष कल्याण योजना के तहत कम वेतन पर और न के बराबर सामाजिक सुरक्षा कवर के तहत काम कर रहे थे. साल 2018 में इस श्रेणी के कर्मचारियों की संख्या 59 फीसदी तक पहुंच गयी. मार्च, 2020 में केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों (सीपीएसई) के लिए संविदात्मक कर्मचारियों का आंकड़ा 498,807 तक पहुंच गया.

मार्च, 2020 में ओएनजीसी के पास 81 फीसदी यानी 43,397 कर्मचारी संविदा पर थे. महामारी के कारण बढ़ी बेरोजगारी के दौर में उत्तर प्रदेश सरकार ने ग्रुप बी और सी कर्मचारियों के लिए भर्ती में संशोधन की मांग की. संविदात्मक कर्मचारियों को भत्ते और विशिष्ट लाभ की पेशकश नहीं की गयी. साल 2020 में यूपी में ऐसे कर्मचारियों की संख्या नौ लाख थी. पांच साल की अवधि के बाद नियमितीकरण की भी बात कही गयी. अलबत्ता इसके लिए एक कठोर मूल्यांकन प्रक्रिया से गुजरना लाजिमी होगा. जो इस प्रक्रिया में पास नहीं हुए, उन्हें बर्खास्त कर दिया जायेगा. फरवरी 2013 में, सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया कि यदि ज्यादातर सरकारी कर्मचारियों के पास अनुबंध की शर्तें हैं, तो इससे सार्वजनिक लोकाचार की नौतिकता कैसे बहाल रह पायेगी?

हमें संविदात्मक रोजगार की बजाय सार्वजनिक सेवाओं को बढ़ावा देना चाहिए. कुछ दशकों से सार्वजनिक वस्तुओं में निवेश कम हुआ है. हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था के पास सामान्य परिस्थितियों में भी स्वास्थ्य सहायता प्रदान करने की क्षमता नहीं है. सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा को बढ़ाने से सामाजिक संपत्ति का निर्माण होगा. इससे आयुष्मान भारत जैसे बीमा-आधारित मॉडल के भी कारगर होने में मदद मिलेगी. इससे शहरों और गांवों में उत्पादकता और जीवन की गुणवत्ता में सुधार होगा. इसी तरह अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में भी रोजगार की संभावनाएं हैं. इलेक्ट्रिक वाहनों और हरित गतिशीलता को प्रोत्साहित करने से रोजगार पैदा होगा. हमें पर्माकल्चर, बागवानी, नर्सरी प्रबंधन और शहरी खेती को प्रोत्साहित करना चाहिए. चुनिंदा पीएसयू सुधार की दिशा में अधिक स्वायत्तता वाले लोक उपक्रम की दिशा में सकारात्मक तरीके से सोचा जा सकता है.

सरकारी नौकरियों की चमक फीकी पड़ गयी है. हमें प्रतिभा को सरकार की ओर आकर्षित करने की जरूरत है. पेंशन और लाभों की लागत को कम करने या उससे बचने की बजाय इसे अपेक्षित शक्ल देनी होगी. हमारी सार्वजनिक सेवाओं में ज्यादातर डॉक्टरों, शिक्षकों, इंजीनियरों और कुछ डेटा क्लर्कों की आवश्यकता होती है. इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रशासनिक सुधार आयोग द्वारा समर्थित सुधार हमारा प्रारंभिक कदम होना चाहिए. यह कुशल सिविल सेवा के लिए क्षमता निर्माण का समय है, जो भ्रष्टाचार मुक्त कल्याण प्रणाली, आधुनिक अर्थव्यवस्था और तेजी से बेहतर सार्वजनिक सामान प्रदान करने की चुनौतियों का सामना कर सके. कभी ‘जय जवान, जय किसान’ सरकार के लिए प्रेरक आदर्श था. आज तो इस मूल्य को खारिज करना ही आदर्श हो गया है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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