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अर्थव्यवस्था में गति लाना जरूरी

By मोहन गुरुस्वामी
Updated Date

मोहन गुरुस्वामी, वरिष्ठ स्तंभकार

mohanguru@gmail.com

केंसियन और शिकागो सिद्धांत के बीच अंतर काफी प्रतिरोधी है, बिल्कुल शिया-सुन्नी, कैथोलिक-प्रोटेस्टेंट या थेलाकाराई-वाडाकराई अयंगर टकराव की तरह. अभी एकमात्र विवाद राष्ट्रीय आय को लेकर है कि इसमें संकुचन कितना होगा. वित्त मंत्रालय को उम्मीद है कि इसमें कोई फर्क नहीं पड़ेगा. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के मुताबिक यह 4.5 प्रतिशत होगा. रेटिंग एजेंसियों ने 6.8 प्रतिशत, जबकि कई अन्य का अनुमान लगभग 10 प्रतिशत तक के संकुचन का है. हम इससे कैसे निपटें? भारत सरकार का अनुमान रूढ़िवादी है और आर्थिक राहत पैकेज पर कोई गंभीर टिप्पणी नहीं दी गयी है. वास्तव में वह राहत पैकेज नहीं है. यह समस्या कहीं दार्शनिक है.

केंसियन अर्थशास्त्र का एक सिद्धांत है, जो कहता है कि वृद्धि के लिए सरकार को मांग बढ़ानी चाहिए. केंसियन मत है कि अर्थव्यवस्था में उपभोक्ता मांग प्राथमिक शक्ति है. परिणामतः यह सिद्धांत विस्तारक राजकोषीय नीति का समर्थक है. शिकागो दर्शन नवशास्त्रीय आर्थिक विचार है, जो 1930 में शिकागो विश्वविद्यालय से शुरू हुआ था.

इसका मुख्य मत है कि अर्थव्यवस्था में मुक्त बाजार संसाधनों का आवंटन बेहतर तरीके से करता है और न्यूनतम या नगण्य सरकारी हस्तक्षेप आर्थिक समृद्धि के लिए अच्छा होता है. वे राजकोषीय घाटे को नापसंद करते हैं. यही कारण है कि वास्तविक राहत पैकेज मात्र 63,000 करोड़ रुपये है. शिकागो अर्थशास्त्री जैसे- रघुराम राजन और उनके पूर्व छात्र कृष्णामूर्ति सुब्रह्मण्यम, वर्तमान मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीइए), राजकोषीय घाटे को लेकर सतर्क रहते हैं.

वे राजकोषीय घाटे के आकार के हिसाब से भारत जैसे देशों को आंकने के लिए वाशिंगटन मतैक्य के सच्चे अनुयायी हैं. स्थिति के आकलन के लिए मूडीज जैसी रेटिंग एजेंसियां उपकरण की तरह हैं, जिसने हाल ही में भारत की रेटिंग कम की है. हमें इससे परेशान नहीं होना चाहिए. भारत का विदेश में शायद ही कोई कर्जदार है और रिजर्व के तौर पर 490 बिलियन डॉलर का ऋणदाता है. जब सीइए से बड़ी राहत के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा- कोई भी चीज मुफ्त नहीं होती, जोकि वास्तव में मिल्टन फ्रीडमैन का मत है.

लेकिन, वे सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की अनदेखी कर रहे हैं, जोकि अमेरिका है. राहुल गांधी के साथ वीडियो वार्ता में रघुराम राजन ने 65 हजार करोड़ के पैकेज को वर्तमान स्थिति के लिए पर्याप्त कहा था. नोबेल विजेता अभिजीत भट्टाचार्य और पूर्व सीइए अरविंद सुब्रह्मण्यम ने अमेरिका या जापान जैसे बड़े पैकेज का सुझाव दिया था. अमेरिका ने 3.5 ट्रिलियन डॉलर का पैकेज घोषित किया है, जो कि जीडीपी का 15 प्रतिशत है. मोदी का राहत पैकेज जीडीपी का मात्र 0.3 प्रतिशत है.

कई गंभीर अर्थशास्त्री राजकोषीय घाटे को अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक मानते हैं. जॉन मेनॉर्ड केयनेस के अनुसार, इस घाटे से देशों को मंदी से निकलने में मदद मिलती है. दूसरा, वित्तीय रूढ़िवादियों का मानना है कि सरकारों को संतुलित बजट के लिए घाटे से बचना चाहिए. उभरती और बड़ी अर्थव्यवस्थाएं- अमेरिका, चीन, जापान और ज्यादातर पश्चिम यूरोपीय देशों का ऋण जीडीपी अनुपात उच्चतम है.

हाल के जीडीपी के 20 प्रतिशत पैकेज से पहले जापान का ऋण जीडीपी अनुपात 253 प्रतिशत से अधिक था. चीन का ऋण जीडीपी के 180 प्रतिशत से अधिक है. अमेरिका का ऋण जीडीपी अनुपात 105 प्रतिशत है. फिर भी वह कोविड-19 संकट से निकलने के लिए तीन ट्रिलियन डॉलर कर्ज के रूप में जुटा रहा है. भारत का ऋण जीडीपी अनुपात मात्र 62 प्रतिशत है, फिर भी जीडीपी का मात्र 0.3 प्रतिशत घोषित किया है?

उधार लेकर अर्थव्यवस्था को गति देना बुरा नहीं है. जब राष्ट्र सुनिश्चित लाभ और सामाजिक विकास के लिए ऋण को उचित पूंजी के तौर पर व्यय करते हैं, तो उससे समृद्ध होते हैं. लेकिन, भारत में ऋण को सब्सिडी के रूप खर्च किया जाता है. अगर किसी परिवार को कर्ज लेकर बच्चे की शिक्षा या आदमी के पीने की आदत पर खर्च करने का विकल्प दिया जाये, तो तर्कसंगत विकल्प स्पष्ट है. बच्चे की शिक्षा का लाभ लंबी अवधि में मिलेगा, जबकि पीनेवाले को तुरंत संतुष्टि मिलेगी. लेकिन, दुर्भाग्य से हमारी सरकारों ने हमेशा गलत विकल्प चुना है.

अगर कर्ज की रकम से उत्पादकता, विकास और समृद्धि आती है, तो वह सराहनीय है. हम सरकार से राजकोषीय घाटा लक्ष्य नहीं, बल्कि आर्थिक विकास, रोजगार और निवेश के बारे में सुनना चाहते हैं. अगर सरकार घाटा वित्तीयन से बचना चाहती है, तो अन्य विकल्प भी हैं. लेकिन, वित्तमंत्री और आरबीआइ गवर्नर के रूप में नौसिखियों के साथ कमजोर आर्थिक प्रबंधन टीम की वजह से वह असमर्थ है. भारत के पास 490 बिलियन डॉलर की विदेशी कमाई का भंडार है, जिस पर कम ब्याज प्राप्त होता है.

अगर इसका 10 प्रतिशत मुद्रीकृत किया जाये, तो यह 3.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक राशि होगी. आरबीआइ के पास 9.6 लाख करोड़ का रिजर्व है. वित्तीय आपात में इसका उपयोग हो सकता है. अभी अभूतपूर्व आर्थिक संकट है. अन्य स्रोत भी हैं, लेकिन उसके लिए राजनीतिक साहस चाहिए. सैन्य व अर्धसैनिक बलों को छोड़कर हमारी संचित सरकारी मजदूरी और पेंशन बिल जीडीपी का लगभग 11.4 प्रतिशत है. एलटीसी रद्द करके और डीए बढ़त को कम करके जीडीपी के एक प्रतिशत का लक्ष्य बना सकते हैं.

सरकार बैंक जमाओं में से एक निश्चित प्रतिशत अधिकार ले सकती है. दस बड़ी निजी कंपनियों के पास 10 लाख करोड़ से अधिक कैश रिजर्व है. लॉकडाउन का दर्द अकेले गरीबों को नहीं उठाना चाहिए. रिकवरी फंड के लिए सरकार आसानी से जीडीपी के 5-6 प्रतिशत यानी 10-12 लाख करोड़ का लक्ष्य बना सकती है.

फौरी तौर पर, आपात अवधि के दौरान बीपीएल लोगों के जनधन खातों में 3000 रुपये प्रतिमाह डाला जा सकता है. कुछ सेक्टरों को जीएसटी रियायत दी जा सकती है. रोजगार के लिए ग्रामीण परियोजनाओं का पुनर्निर्माण शुरू हो सकता है. भारत को दोबारा गति देने के लिए धन प्राप्त करना बड़ी समस्या नहीं है. इसके बीच में दार्शनिक सोच आ जाती है. इसे शिकागो का अर्थशास्त्र कहें या गुजराती मानसिकता. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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