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परीक्षाओं में गड़बड़ी अस्वीकार्य है

ऐसी कोई खबर मीडिया नहीं छाप रहा है कि जो पेपर आज से चार-पांच साल पहले लीक हुए उसमें शामिल अपराधियों में से किसी को सजा हुई है या नहीं. और कितनी कठोर सजा हुई.

बीते कुछ समय से देश में होने वाली प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक, नकल, धांधली की घटनाएं बहुत बढ़ गयी हैं. नीट परीक्षा में धांधली को लेकर हजारों विद्यार्थी सड़कों पर हैं. यह मामला अभी शांत भी नहीं हुआ है कि अब परीक्षा में गड़बड़ी की आशंका को देखते हुए यूजीसी-नेट परीक्षा रद्द कर दी गयी है. इस तरह की स्थिति अत्यंत अस्वीकार्य है और यह व्यवस्था की अक्षमता को प्रदर्शित करती है. निश्चत रूप से जिन लोगों पर इन परीक्षाओं को आयोजित करने का उत्तरदायित्व है, उन्हें अपनी कर्मठता और लगनशीलता को नये आयाम देने पड़ेंगे. हम इस मामले को हल्के में नहीं ले सकते.

लंबे संघर्ष के बाद वैश्विक समुदाय में हमने अपना स्थान बनाया है. पर कुछ ऐसे मामले भी हैं, जो देश के लिए चिंता का विषय बने हुए हैं. आज देश की शिक्षा व्यवस्था में असामाजिक तत्व और भ्रष्ट प्रवृत्तियां लगातार बढ़ रही हैं, जो व्यवस्था को खोखला कर रही हैं. इन मुद्दों पर चर्चा और तत्काल निर्णय लेने की जरूरत है. पहली चिंता है परीक्षा में लगातार बढ़ती नकल और पेपर लीक की समस्या. ऐसे मामले देश के अनेक राज्यों से सामने आते रहते हैं. बीते पांच वर्षों में देश के 15 राज्यों में पेपर लीक के कारण एक करोड़ चालीस लाख युवाओं की मेहनत पर पानी फिर गया है. इन सबके बावजूद इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि ऐसे आपराधिक मामलों में शामिल कितने लोगों पर अब तक कानूनी शिकंजा कसा है.

परीक्षा प्रणाली में सुधार के लिए कुछ चीजें तो तुरंत करने की जरूरत है, साथ ही साथ दीर्घकालिक योजना बनाने की भी जरूरत है. दो-तीन बातें जो महत्वपूर्ण हैं, वो हैं कि जो माफिया आज की परीक्षा के पेपर लीक में शामिल है, वह तीन वर्ष पहले भी ऐसी गतिविधियों में शामिल था. इसका सीधा अर्थ यह निकलता है कि देश में कानून इतना शिथिल है अथवा माफियाओं की पहुंच इतनी ज्यादा है कि उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं होती. ऐसी कोई खबर मीडिया नहीं छाप रहा है कि जो पेपर आज से चार-पांच साल पहले लीक हुए उसमें शामिल अपराधियों में से किसी को सजा हुई है या नहीं. और कितनी कठोर सजा हुई. यदि यह सजा तीन या चार महीने में हो जाती तो निश्चित रूप से थोड़ा उसका प्रभाव पड़ता.

जो माफिया आज की परीक्षा के पेपर लीक में शामिल है, वह तीन वर्ष पहले भी ऐसी गतिविधियों में शामिल था. इसका सीधा अर्थ यह निकलता है कि देश में कानून इतना शिथिल है अथवा माफियाओं की पहुंच इतनी ज्यादा है कि उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं होती. ऐसी कोई खबर मीडिया नहीं छाप रहा है कि जो पेपर आज से चार-पांच साल पहले लीक हुए उसमें शामिल अपराधियों में से किसी को सजा हुई है या नहीं. और कितनी कठोर सजा हुई.

हमारे यहां लोगों को मालूम है कि हमारी न्याय व्यवस्था इतनी शिथिल है कि मामला लटकता जायेगा और कुछ होगा नहीं. प्रश्न है कि एक व्यक्ति या चार व्यक्ति मिलकर एक परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक करते हैं, और 48 लाख या 13 लाख लोगों पर प्रभाव पड़ता है, इसमें यदि उनके परिवारवालों को जोड़ लिया जाए, तो करोड़ों लोग इससे प्रभावित होते हैं. कितने परिवारों पर आर्थिक दबाव पड़ता है. इस बात की कोई संभावना नहीं है कि पेपर लीक मामले में शामिल लोगों को कोई सजा हो भी पायेगी. हमारे देश के नियम इतने शिथिल हैं कि इतनी सारी घटनाएं होने के बाद भी आज तक किसी नेता या मंत्री को उत्तरदायी क्यों नहीं माना गया? यह स्थिति चिंताजनक और दुर्भाग्यपूर्ण है.

जहां तक प्रश्न है कि किस तरह ये अपराधी इस मामले को अंजाम देते आ रहे हैं, तो इसका उत्तर है कि या तो प्रतिष्ठान इनके साथ मिला हुआ है या यह उस एजेंसी की अक्षमता है और उसके भी भ्रष्टाचार में लिप्त होने की संभावना भी है, जिसके ऊपर इस परीक्षा की जिम्मेदारी है. हालांकि, परीक्षाओं में कदाचार को रोकने के लिए हाल में केंद्र सरकार ने एक मॉडल एक्ट बनाया है. कुछ राज्य सरकारों ने भी नकल और पेपर लीक को लेकर कड़े कदम उठाने का वादा किया है. पर हमारा पिछला रिकॉर्ड इतना खराब है कि इन बातों पर भरोसा करना मुश्किल है. इन सभी समस्याओं का समाधान एनइपी-2020 के जरिये किया जा सकता है. इस नीति में देश की शिक्षा व्यवस्था की खामियों को दूर करने की संभावना है. यह नीति देश की शिक्षा व्यवस्था में मूल्यों को स्थापित कर उसमें नैतिकता लाने के साथ ही युवाओं में नयी आशा का संचार कर सकती है.

हमें यह देखना पड़ेगा कि बार-बार ऐसा क्यों हो रहा है. दूसरी बात है कि सभी शिक्षाविदों को देशभर से बुलाकर बैठाना होगा और उनसे पूछना होगा कि इस समस्या से निपटने के लिए किस तरह का प्रबंधन किया जाए. एक होता है ब्यूरोक्रेटिक एडमिनिस्ट्रेशन और दूसरा होता है एकेडमिक एडमिनिस्ट्रेशन. आज सभी बोर्ड ऑफ स्कूल एजुकेशन, टेक्स्टबुक कॉरपोरेशन आदि के हेड ब्यूरोक्रेट होते हैं, जबकि पहले सब एकेडमिक के लोग होते थे. वर्ष 1970-75 तक जितने भी देश के राज्यों के लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष होते थे, उनकी साख, उनके साथ काम करने वालों की साख इतनी ऊंची होती थी कि हर युवा को विश्वास होता था कि मेरे साथ कोई अन्याय नहीं होगा. नतीजा कोई पेपर लीक नहीं होता था. देखिए, जब देश में बार-बार परीक्षाओं के पेपर लीक होंगे तो संबंधित एजेंसी पर प्रश्न तो उठेंगे ही, क्योंकि देश में अभी इतनी अक्षमता नहीं है कि सक्षम लोग ढूंढ़े नहीं जा सकें. सक्षम लोगों को ढूंढ़ा जाना चाहिए. जो नियुक्तियां होती हैं वे पूरी तरह से पारदर्शी होनी चाहिए और व्यक्तियों की साख और उनकी ईमानदारी पर ध्यान दिया जाना चाहिए.

सबसे बड़ी बात है कि लोग इस बात को देखते हैं कि हमारा नेतृत्व कैसा है, हमारे मंत्री कैसे हैं, बोर्ड के अध्यक्ष कैसे हैं आदि. उनका आचरण कैसा है, उनके बारे में लोग क्या कहते हैं, इन सब चीजों का प्रभाव पड़ता है. इस समय देश के सांसदों को भी इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उसका आचरण अनुकरणीय हो कि उसे देश का युवा वर्ग देख रहा है. नैतिकता ऊपर से छनकर नीचे तक आती है. जब ऊपर के लोगों में नैतिकता होगी, तो प्रश्न ही नहीं उठता है कि निचले स्तर पर लोग अनैतिक हो जाएं. तीसरी बात यह है कि अब नयी-नयी पद्धतियां आ गयी हैं. जैसे नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओपन लर्निंग ने आज से बीस-पच्चीस वर्ष पहले ऑन डिमांड एग्जामिनेशन का प्रस्ताव दिया था. यानी जिसे जब सहूलियत हो कंप्यूटर के जरिये परीक्षा दे दे.

इस तरह की संभावनाओं पर अब विचार करना पड़ेगा. इस समस्या के समाधान के लिए देश के जाने-माने शिक्षाविदों के साथ बात करनी चाहिए, इसमें किसी तरह की कोई राजनीति नहीं होनी चाहिए. सभी सरकारों को मिलकर एक नयी शिक्षा प्रणाली के लिए आगे बढ़ना चाहिए और यह संभव है. इसके बाद उन कारणों का पता लगाना चाहिए जिसके चलते यह स्थिति निर्मित हुई है. यह बहुत शर्मनाक स्थिति है और भारत की प्रतिष्ठा का प्रश्न है. अब समय आ गया है जब देश की शिक्षा व्यवस्था को पूरी गंभीरता से लिया जाए. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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