लॉकडाउन ही अंतिम विकल्प

A commuter walks on a deserted street during a day long lockdown amid growing concerns of coronavirus, in New Delhi, India, Sunday, March 22, 2020. India is observing a 14-hour "people's curfew" called by Prime Minister Narendra Modi in order to stem the rising coronavirus caseload in the country of 1.3 billion. For most people, the new coronavirus causes only mild or moderate symptoms. For some it can cause more severe illness. (AP Photo/Manish Swarup)
आवाजाही और बाहर निकालने पर पूर्ण पाबंदी संक्रमण पैदा होने और उसके विस्तार को रोकने के लिए अपरिहार्य है. निस्संदेह, लोगों को परेशानियां हो रहीं हैं, लेकिन इसे सहन करने का ही विकल्प है.
लॉकडाउन ही अंतिम विकल्प
अवधेश कुमार
वरिष्ठ पत्रकार
awadheshkum@gmail.com
दुनिया की स्थिति निस्संदेह भयावह है. अब तक 19 हजार से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं तथा संक्रमित लोगों की संख्या सवा चार लाख के आसपास है. ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 21 दिनों के लॉकडाउन की घोषणा देश को महामारी से बचाने एकमात्र विकल्प है. स्थिति ज्यादा डरावना इसलिए है क्योंकि संक्रमितों और मृतकों की संख्या उन देशों में ज्यादा है, जो विकसित व साधनसंपन्न हैं और जिनकी स्वास्थ्य सेवाएं सर्वोत्तम मानी जाती हैं. अमेरिका जैसी महाशक्ति के यहां मरनेवालों का आंकड़ा छह सौ पार कर चुका है. वहां इस समय 50 हजार से ज्यादा लोग संक्रमित हैं. इटली के लिए यह सबसे बड़ी त्रासदी साबित हो रही है. वहां छह हजार के आसपास लोग मारे जा चुके हैं और करीब 59 हजार संक्रमित हैं. इटली के प्रधानमंत्री ने कह दिया है कि स्थिति पर उनका नियंत्रण नहीं है. स्पेन और ब्रिटेन समेत कई अन्य यूरोपीय देश भी संकटग्रस्त हैं.
चीन के बाद यूरोप और अमेरिका कोविड-19 के सबसे बड़े शिकार हैं. अमेरिका में स्वास्थ्य आपातकाल लागू है. अमेरिका के कम से कम 16 राज्यों ने नागरिकों को घर में रहने का आदेश दिया है. फ्रांस सहित अनेक देशों में सेना उतारनी पड़ी है. सच कहा जाये, तो दुनिया के सभी प्रमुख देशों में लॉक डाउन है. सोचने की बात है कि जब इन साधनसंपन्न देशों की ऐसी दशा है, तो अगर इस महामारी ने विकासशील और गरीब देशों को चपेट में ले लिया, तो क्या होगा? यही प्रश्न हमें अपने आपसे पूछना है.
सच यह है कि कोरोना की चपेट से अब कुछ ही देश बचे हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अब अफ्रीका में भी कोरोना संक्रमण की पुष्टि शुरु कर दी है. भारत में 11 मार्च तक केवल 71 मामले थे. अब 600 होने की कगार पर हैं. मतलब, संख्या तेजी से बढ़ रही है. दुनियाभर में ऐसा ही हो रहा है.
तो, इसे यहीं रोकना जरुरी है. हम जानते हैं, कोई दवा इसे नहीं रोक सकती. जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल का यह वक्तव्य वायरल हो रहा है कि हमारा अपना व्यवहार संक्रमण को फैलने से रोकने व धीमा करने का सबसे प्रभावी तरीका है. वे खुद ही आइसोलेशन में हैं. बचाव का एकमात्र रास्ता है अपने को बिल्कुल कैद कर देना. कोरोना महामारी को उस हमले की तरह देखना होगा, जहां चारों ओर से बमबारी हो रही है, गोलियां बरस रहीं हैं और नीचे बारुदी सुरंग बिछा है. जैसे ही आप निकले कि आप उसकी जद में आ गये. सामान्य युद्ध में तो आप अकेले मरते हैं. कोरोना महामारी के युद्ध में यदि आपको वारयस का बम लगा, गोली लगी, तो आपको तत्काल पता भी नहीं चलेगा और आप अपने परिवार, मित्र, रिश्तेदार और न जाने कितनों की जिंदगी ले लेंगे. यूरोप से आती जानकारी का निष्कर्ष यही है कि समय पर कदम न उठाने यानी लोगों की आवाजाही पर रोक न लगाने, एक साथ इकट्ठा होने पर पाबंदी न लगाने आदि के कारण ही महामारी ने इतना भयावह रुप लिया है.
अमेरिका की सर्जन जर्नल डॉक्टर जेरोम एडम्स ने कहा है कि उनके यहां मरनेवालों में 53 प्रतिशत की उम्र 18 से 49 साल के बीच है. यह उस धारणा से अलग है कि ज्यादातर बुजूर्ग ही अपनी जान गंवा रहे हैं. यह सोचना ठीक नहीं कि हम अगर जवान हैं, तो हमारी मौत इससे नहीं हो सकती. पटना में कतर से आये एक 38 वर्षीय युवक की मौत हो गयी. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ हर्षवर्धन ने बताया है कि देश में आठ हजार लोगों को सरकार के क्वारैंटाइन सेंटर में रखा गया है और 1.87 लाख लोग कॉम्युनिटी सर्विलांस पर हैं.
करीब दो लाख लोगों ने हेल्पलाइन नंबर पर फोन किया है और 50 हजार लोगों ने ईमेल भेजकर जानकारी मांगी है. यह समय ऐसा है कि क्वारैंटाइन में रह रहे लोगों की मदद की जाये. ये सभी संक्रमित नहीं हैं, लेकिन संदिग्ध तो हैं. यह संख्या सामान्य नहीं है. विदेश से आये भारी संख्या में लोगों ने वायदे के अनुसार अपने को आइसोलेशन में नहीं रखा. उनकी पहचान कर जबरन अलग रखने के प्रयास हो रहे हैं. यह कितना कठिन है, इसका अनुमान आप स्वयं लगा सकते हैं. ऐसे में लॉकडाउन या कर्फ्यू को जनता और देश के हित में उठाया गया कदम ही कहा जायेगा.
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने पहले संबोधन में लोगों से घरों में रहने की अपील की थी और उसका असर भी हुआ. अधिकतर लोग घरों में या जहां हैं, वहीं अपने को कैद रखे हुए था. किंतु एक बड़ी संख्या बाहर भी निकल रही थी. वे समझ नहीं रहे थे कि वायरस के चेन को तोड़ना है, तो सड़कों, बाजारों, दफ्तरों आदि को कुछ दिनों के लिए खाली रखना पड़ेगा. भारत में अभी तक वही लोग संक्रमित हुए हैं जो या तो विदेशों से आये या विदेशों से आये लोगों के संपर्क में थे.
आवाजाही और बाहर निकालने पर पूर्ण पाबंदी संक्रमण पैदा होने और उसके विस्तार को रोकने के लिए अपरिहार्य है. अब बारी लोगों की है. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने लोगों को समझाते हुए कहा है कि यदि हमारे यहां 25-30 हजार कोरोना संक्रमित हो गये, तो हम कुछ नहीं कर सकते. यह पूरे भारत पर लागू होता है. अगर राजधानी दिल्ली इसे संभालने की स्थिति में नहीं होगी, तो कौन शहर और राज्य इसमें सक्षम हो सकेगा? कोई नहीं.
यूरोप में स्थिति इतनी खराब इसीलिए हुई, क्योंकि जनवरी में मामला सामने आने के बावजूद वहां लोगों की आवाजाही को प्रतिबंधित करने से लेकर बचाव के अन्य कदम नहीं उठाये गये. वहां तो हवाई अड्डों पर अनिवार्य स्क्रीनिंग तक की व्यवस्था नहीं हुई. भारत ने जनवरी से ही स्क्रीनिंग शुरू की और जांच भी. वास्तव में ऐसे पूर्वोपाय के कारण ही हमारे देश में स्थिति नियंत्रण में है. चीन के हुबेई प्रांत के साथ 20 राज्यों में ऐसा लॉकडाउन किया गया, जो हमारे यहां के कर्फ्यू से ज्यादा सख्त था.
वायरस के केंद्र वुहान और उसके आसपास के इलाकों में आवश्यक सेवा ही नहीं, मेडिकल स्टोर तक बंद कर दिये गये. जिसे लेकर आशंका हुई, उसे पुलिस जबरदस्ती उठा लेती. इसमें अनेक त्रासदियां हुईं. अनेक होटल और घर ध्वस्त किये गये. वहां कोई धरना-प्रदर्शन हो नही सकता. हमारे यहां स्थिति जितनी बिगड़ जाये, तब भी वैसा कर ही नहीं सकते. निस्संदेह, लोगों को परेशानियां हो रहीं हैं, लेकिन अगर स्वयं को, परिवार को, देश को बचाना है तो फिर इसे सहन करने का ही विकल्प है.
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