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सोशल मीडिया में भारत-चीन रिश्ते

By राजीव रंजन
Updated Date

राजीव रंजन, प्राध्यापक, शंघाई विश्वविद्यालय

mrajivranjan@gmail.com

भारत-चीन सीमा पर तनातनी और गलवान घाटी में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी द्वारा 20 भारतीय जवानों की हत्या से दोनों देशों के आपसी संबंध पुनः ढलान पर हैं, जो 1962 के बाद सबसे निम्नतम बिंदु पर हैं. चीनी सैनिकों ने 20 अक्तूबर, 1975 को चार भारतीय सैनिकों की हत्या कर दी थी. उसके बाद यह हिंसा हुई है. तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की चीन यात्रा के बाद से परस्पर संबंधों में निरंतर सुधार आ रहा था, पर गलवान की घटना ने 30 साल की प्रगति पर एक तरह से पानी फेर दिया है.

इस तनाव ने अब भारत के रणनीतिकारों और विश्लेषकों को 'वाशिंगटन सहमति' और 'बीजिंग सहमति' की कशमकश से मुक्त कर अमेरिका की तरफ ठेल दिया है; वह भी तब, जब अमेरिका-चीन संबंध भी बेहद तनावपूर्ण स्थिति में हैं और विश्व एक नये शीत युद्ध के द्वार पर खड़ा है. इस माहौल में भारत गुटनिर्पेक्षता के बारे में अब सोच भी नहीं सकता.

दोनों देशों में सोशल मीडिया पर भारत-चीन सीमा विवाद एक गंभीर मुद्दा है बहस के लिए. वहां एक-दूसरे की कमियों का मजाक भी बनाया जाता हैं, किंतु डोकलाम गतिरोध की तुलना में इस बार सोशल मीडिया बहस काफी मायनों में भिन्न हैं. चीनी सोशल मीडिया योद्धाओं को व्यापक जानकारी ट्विटर और फेसबुक से मिल जाती है. हालांकि ये दोनों माध्यम चीन में प्रतिबंधित हैं, फिर भी वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क के द्वारा लोग इंटरनेट ग्रेट फायर वॉल को तोड़ कर इनका इस्तेमाल करते हैं.

शुरुआती दिनों में चीन में इस तनाव से संबंधित बहुत कम ही सूचनाएं उपलब्ध थीं, तो चीनी लोग भारतीय मीडिया साइटों और ट्विटर से समाचारों को चीनी भाषा में अनुदित कर लेते थे. पैंगोंग त्सो के किनारे 5-6 मई के झगड़े में घायल भारतीय सैनिकों की तस्वीरें आयीं, तब वास्तविक जीवन के भारतीय सैनिकों और बॉलीवुड के रील लाइफ सैनिकों की तुलनात्मक तस्वीरों को सोशल मीडिया पर वायरल किया गया. वेइबो, जिसे चीनी ट्विटर कहा जाता है, पर विंग कमांडर अभिनंदन के पाकिस्तान में हिरासत में होने की पुरानी तस्वीरें भी छायी रहीं.

इस बार चीनी सोशल मीडिया पाकिस्तानी ट्विटर से ज्यादा प्रभावित रहा भारत विरोधी कंटेंट को लेकर. उदाहरण के लिए, पीएलए और पाकिस्तानी सेना का लद्दाख में दोपहर का भोजन करते फोटो, भारतीय वायु सेना की क्षमता का मजाक उड़ाना, सड़क पर झगड़ते दो लोगों में मोटे आदमी को चीन और कमजोर को भारत बताना. यूं कहें कि मेड इन पाकिस्तान जोक्स व मीम आदि सहज उपलब्ध हैं, जिनका इस्तेमाल चीनी सोशल मीडिया करता है.

जब गलवान घाटी में मारे गये सैनिकों की तस्वीरें और नामों की सूची भारत के सोशल मीडिया में आने के साथ ही चीनी सोशल मीडिया पर भी छा गयी थीं, जिससे कई चीनी लोग चीन से सवाल पूछने लगे कि चीन कब अपने मारे गये सैनिकों की जानकारी देगा और उन्होंने अपने सगे-संबंधियों के सही-सलामत वापसी की कामना की. बिजली की गति से सर्वदलीय बैठक के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण को कांट-छांट कर और चीनी भाषा में अनुवाद कर सोशल मीडिया और समाचारों में प्रमुखता दी गयी.

इस भाषण पर बाद में जो स्पष्टीकरण आया, उसको ज्यादा तवज्जो नहीं दी गयी. भारतीय ट्विटर स्पेस भी फर्जी खबरों से भरा रहा. जैसे, मृत चीनी सैनिकों की सूची, जो सच नहीं था. चीन अब पारंपरिक चीनी कैरेक्टर इस्तेमाल नहीं करता और इस सूची के कुछ लोग पहले ही मर चुके थे. इसके इतर, ताइवान से आया पोस्टर, जिसमें भगवान राम को ड्रैगन को मारते हुए दिख रहे हैं, सोशल मीडिया पर काफी वायरल किया गया.

सोशल मीडिया युद्ध से तीन बातें स्पष्ट होती हैं. प्रथम, सूचना प्रौद्योगिकी के विकास और सोशल मीडिया ने स्थानीय संवादों को ग्लोबल रूप प्रदान किया हैं. द्वितीय, भारत-चीन सीमा विवाद अब केवल इन दो देशों के लोगों तक सीमित नहीं रहा. चीनी ने पाकिस्तान के भारत विरोधी भावनाओं को साझा किया, वहीं ताइवान ने भी भारत के प्रति एक तरह से संवेदना जाहिर करते हुए चीन को हारते हुए दिखाया. यह भावनाओं का आपस में साझा करना इन देशों के लोगों के निकट आने और साझे दुश्मन के विरुद्ध एकजुटता को प्रदर्शित करता है.

तृतीय, गौरतलब है कि भारतीयों को चीनी सोशल मीडिया या मीडिया में क्या चल रहा है, तब तक पता नहीं चलता, जब तक उसका अंग्रेजी अनुवाद नहीं आ जाता. हमें सोचना चाहिए कि क्या हमने चीनी भाषा प्रशिक्षण और अध्ययन में जरुरी निवेश किया है? गैर-सरकारी संगठनों और जनहितैषी उद्यमियों ने न के बराबर उदारता दिखायी है. चीनी भाषा और अध्ययन पर कोई शोधवृत्ति नहीं है.

दूसरी तरफ, भारतीय ट्विटर स्पेस पर विदेशी विद्वानों की उपस्थिति निरंतर बढ़ी है, जो बहस को एक अलग रूप देती है, जैसे कोर कमांडरों की बैठक में कथित तौर पर हुवावे 5जी की अनुमति का मामला. अब भारत-चीन सीमा संघर्ष और तनाव दोनों देशों के लोगों तक ही सीमित नहीं हैं, वरन दुश्मन के दोस्त की भी भागीदारी बढ़ी है, जो कि भावनात्मक संदेशों में परिलक्षित हो रहा है. यह कदाचित भारत-चीन सीमा मसले को प्रभावित ही करेगा.

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