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इसरो की ऊंची उड़ान

By संपादकीय
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भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने दस उपग्रहों का एक साथ सफल प्रक्षेपण कर अपनी उपलब्धियों की शृंखला में एक गौरवपूर्ण अध्याय और जोड़ दिया है. यह ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (पीएसएलवी) का 51वां अभियान था. इस मिशन में अमेरिका और लक्जमबर्ग के चार-चार उपग्रहों के साथ लिथुआनिया का भी एक उपग्रह प्रक्षेपित किया गया है. इसके अलावा हर तरह के मौसम में धरती की तस्वीरें लेने में सक्षम एक भारतीय उपग्रह भी भेजा गया है.

इस वर्ष का यह इसरो का पहला प्रक्षेपण है. कोरोना महामारी से पैदा हुई चुनौतियों से जूझते हुए हमारे वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों ने यह सफलता प्राप्त की है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने बधाई संदेश में इस तथ्य को रेखांकित किया है कि इसरो ने कई मुश्किलों के बावजूद तय समय पर मिशन को पूरा किया है. अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में बड़ी प्रतिस्पर्धा है तथा विभिन्न देशों की एजेंसियों के अलावा अनेक निजी कंपनियां भी अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही हैं. ऐसे में इसरो ने कम लागत और उच्च गुणवत्ता के साथ भरोसेमंद मुकाम हासिल किया है, जिसकी वजह से अनेक देश अपने उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजने या पृथ्वी की कक्षा में स्थापित करने के लिए इसरो की सेवाएं लेते हैं.

अमेरिका, जापान, फ्रांस और इस्राइल प्रक्षेपण की अपनी क्षमता होने के बाद भी इसरो के माध्यम से प्रक्षेपण करते हैं. इस संस्थान की विश्वसनीयता का ही परिणाम है कि अमेरिका, कनाडा, डेनमार्क, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, ब्रिटेन, स्विट्जरलैंड जैसे विकसित देशों समेत 20 देशों ने इसरो के जरिये अपने उपग्रहों को छोड़े हैं. वर्ष 2017 में तो इसरो ने एक ही प्रक्षेपण में अनेक देशों के 104 उपग्रहों का प्रक्षेपण कर अपनी दक्षता और क्षमता की उत्कृष्टता का उदाहरण प्रस्तुत किया था.

इससे संगठन को समुचित आमदनी भी होती है और अनुभव का आयाम भी विस्तृत होता है, जो शोध एवं अनुसंधान को आगे बढ़ाने के लिए ठोस आधार मुहैया कराते हैं. अंतरिक्ष अनुसंधान में विभिन्न देशों के साथ भारत के ऐसे सहयोग से द्विपक्षीय और बहुपक्षीय संबंधों को बेहतर बनाने में भी मदद मिलती है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की प्रतिष्ठा भी बढ़ती है. उल्लेखनीय है कि इसरो ने 1999 में व्यावसायिक प्रक्षेपण करना प्रारंभ किया था. आज पीएसएलवी को सबसे अधिक भरोसेमंद प्रक्षेपण यानों में शुमार किया जाता है.

भारत सरकार की कोशिशों से इसरो अब निजी क्षेत्र के साथ साझीदारी बढ़ाने की दिशा में अग्रसर है. इससे आर्थिक और तकनीकी विकास बढ़ने की उम्मीद है, क्योंकि संचार और सुरक्षा में सैटेलाइटों के महत्व में लगातार वृद्धि हो रही है. प्राकृतिक आपदाओं से होनेवाले नुकसान को रोकने में इस तकनीक की अहम भूमिका है. इंटरनेट और मनोरंजन के लिए भी उपग्रहों की जरूरत बढ़ती जा रही है. अब तक के अनुभव और भविष्य की आवश्यकताओं को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि अंतरिक्ष में इसरो की उड़ान ऊंची होती जायेगी.

Posted by: Pritish Sahay

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