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स्पष्ट हों जी-20 सम्मेलन के उद्देश्य

Updated at : 24 Nov 2020 3:37 AM (IST)
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स्पष्ट हों जी-20 सम्मेलन के उद्देश्य

स्पष्ट हों जी-20 सम्मेलन के उद्देश्य

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मधुरेंद्र सिन्हा

वरिष्ठ पत्रकार

मानवता की रक्षा के लिए अमीर देशों को अपने खजाने का मुंह खोलना ही पड़ेगा. आज यूरोपीय देशों की यह जिम्मेदारी है कि वे अफ्रीका के गरीब देशों को कोविड-19 के चंगुल से मुक्त कराने में हाथ बटाएं. इस बार जी-20 सम्मेलन ऐसे समय हुआ जब पूरी दुनिया कोविड-19 महामारी से जूझ रही है. लाखों लोगों को जिंदगी से हाथ धोना पड़ा है, देशों की अर्थव्यवस्थाएं तबाह हो गयी हैं और कई देशों के करोड़ों लोग दाने-दाने को मोहताज हो गये हैं. देशों का एक-दूसरे से आवागमन ठप है. जाहिर है, ऐसे में यह सम्मेलन किसी खास जगह नहीं हो सकता था.

हालांकि सउदी अरब इसका मेजबान था और उसने खासी तैयारियां भी कर रखी थीं. लेकिन यह सम्मेलन वर्चुअल हुआ और सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने वीडियो के जरिये इसमें भाग लिया. दरअसल, जी-20 दुनिया के 19 देशों की सरकारों और यूरोपियन यूनियन का एक अंतरराष्ट्रीय मंच है, जिसे अंतरराष्ट्रीय वित्तीय स्थिरता को बढ़ावा देने के लिए बनाया गया है.

हालांकि कोरोना महामारी ने इस बार इन देशों को कोविड पर ही चर्चा केंद्रित करने पर मजबूर कर दिया. सम्मेलन में कोरोना का टीका आने पर दुनिया के सभी देशों को देने की व्यवस्था तथा फंड कैसे दिया जाये, इसी बात पर चर्चा हुई. इसकी संयुक्त विज्ञप्ति में भी यह बात कही गयी कि आज की चुनौतियों में इस समूह के लिए वैश्विक कार्रवाई, एकजुटता तथा पारस्परिक सहयोग जैसी जिम्मेदारियां और बढ़ गयी हैं एवं इसके लिए हम सभी साथ खड़े हैं ताकि लोगों का सशक्तिकरण, पृथ्वी की रक्षा हो और नयी सीमाएं खोली जा सकें.

यह भी कहा गया कि कोविड-19 के बाद के विश्व को मजबूत, टिकाऊ, संतुलित और समग्र बनाने के लिए जी-20 प्रतिबद्ध है. इन देशों ने मनी लाॅन्ड्रिंग और दहशतगर्दी के लिए धन देनेवालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की भी बात की, जो पाकिस्तान को चुभ रही है. कहा गया कि इस सम्मेलन का उद्देश्य एक स्वतंत्र, न्यायोचित, मुक्त अंतरराष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा देना है ताकि कोविड के बाद पूरी दुनिया में सुचारु रूप से अबाध व्यापार हो सके.

यह बात इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि 2020 में सारी दुनिया का कारोबार घटकर 4.4 प्रतिशत रह गया है और अब इसे पटरी पर लाना टेढ़ी खीर साबित होगी. गरीब देशों के पास इतने स्रोत नहीं हैं कि वे कोविड-19 के टीके की खोज करें और उसे जनता में बांटें. जी-20 देशों ने कहा है कि वे दुनिया के देशों को कोविड का टीका उपलब्ध करायेंगे. उन्होंने यह भी कहा कि इसके लिए जरूरी फंड भी दिये जायेंगे ताकि टीके का विकास, देशों में उसका पूर्ण उत्पादन और सुचारु वितरण हो सके.

लेकिन यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि इस बारे में कोई विस्तृत रूपरेखा नहीं बनायी गयी, न ही यह बताया गया कि कौन सा देश कितनी फंडिंग करेगा. यह बात इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सिर्फ दिलासा देने से बात नहीं बनेगी. मानवता की रक्षा के लिए अमीर देशों को अपने खजाने का मुंह खोलना ही पड़ेगा. आज यूरोपीय देशों की यह जिम्मेदारी है कि वे अफ्रीका के गरीब देशों को कोविड-19 के चंगुल से मुक्त कराने में हाथ बटायें.

परंतु यह तभी संभव होगा जब इन देशों को बड़ी राशि तथा अन्य संसाधन दिये जायेंगे. एक समय इंग्लैंड सहित कई यूरोपीय देशों ने अफ्रीकी देशों से काफी लाभ उठाया था और अब उसे चुकाने का समय है. जी-20 के देश अपने-अपने फंड के बारे में खुलकर बतायें और यह भी बतायें कि वे व्यावहारिक रूप में इन गरीब देशों की मदद करेंगे.

भारत ने इस सम्मेलन में काफी आशावादिता दिखायी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारत पर्यावरण के मामले में न सिर्फ पेरिस समझौते के अपने लक्ष्य को हासिल कर रहा है, बल्कि उससे भी अधिक कर रहा है. प्रधानमंत्री ने पहले ही बताया था कि भारत ने कार्बन उत्सर्जन में 30-35 प्रतिशत कटौती का लक्ष्य रखा है और उसे पाने की ओर वह अग्रसर है.

उन्होंने यह भी कहा कि जलवायु परिवर्तन के खिलाफ अलग-थलग होकर लड़ाई लड़ने के बजाय एकीकृत, व्यापक और समग्र सोच को अपनाया जाना चाहिए. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि संपूर्ण विश्व तभी तेजी से प्रगति कर सकता है, जब विकासशील राष्ट्रों को बड़े पैमाने पर टेक्नोलॉजी और वित्तीय सहायता मुहैया करायी जाये. उनकी इस बात में बहुत दम है, क्योंकि इस समय उत्कृष्ट टेक्नोलॉजी मुट्ठी भर देशों के पास ही है जिसे उन्हें अन्य देशों को देना चाहिए.

उन्होंने यह भी कहा कि हर मनुष्य को समृद्ध करने से ही मानवता समृद्ध होगी. भारत ने कार्बन उत्सर्जन को रोकने के लिए कई बड़े कदम उठाये हैं जिनमें एलइडी बल्बों का ज्यादा इस्तेमाल और सौर ऊर्जा के बढ़ते उत्पादन ने बड़ी भूमिका निभायी है. आठ करोड़ परिवारों को खाना बनाने के लिए गैस कनेक्शन देना भी एक बड़ा कदम है, जिससे न केवल महिलाओं के स्वास्थ्य में सुधार हुआ है बल्कि कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन में भी कमी आयी है.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने गुस्से का यहां भी इजहार किया और पेरिस समझौते से बाहर रहने के अपने फैसले को फिर से दुहराया. उन्होंने कोविड-19 से विश्वव्यापी संघर्ष के बारे में भी कुछ नहीं कहा, न ही पर्यावरण बचाने के बारे में कोई सकारात्मक बात की. इससे साफ हो गया है कि अमेरिका इस मंच पर बाकी देशों से अलग-थलग खड़ा है.

अमेरिका के आर्थिक सहयोग के बिना ये दोनों बड़े काम नहीं हो सकते. लेकिन खैरियत है कि नव-निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन ने अमेरिका के पेरिस समझौते में वापसी के जोरदार संकेत दिये हैं. कुल मिलाकर इस बार का जी-20 सम्मेलन उतना जोरदार और प्रोत्साहित करने वाला नहीं प्रतीत हुआ. इसमें शामिल देशों को अभी और स्पष्ट शब्दों में न केवल अपनी बात कहनी होगी, बल्कि तुरंत कुछ करके दिखाना भी होगा.

posted by : sameer oraon

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