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घेरे में पाकिस्तान

Updated at : 05 Jan 2021 10:05 AM (IST)
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घेरे में पाकिस्तान

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नवनिर्वाचित अमेरिकी कांग्रेस की बैठक के पहले ही दिन प्रतिनिधि सभा में पाकिस्तान से नाटो के एक बड़े सहयोगी देश दर्जा वापस लेने का प्रस्ताव एक महत्वपूर्ण परिघटना है. नाटो अमेरिकी और अनेक यूरोपीय देशों का साझा सैन्य संगठन है. अफगानिस्तान में तालिबान शासन और अल-कायदा के आतंकी ठिकानों के विरुद्ध कार्रवाई में नाटो देशों को पाकिस्तान का सहयोग लेना पड़ा था.

उसी समय 2004 में तत्कालीन बुश प्रशासन ने पाकिस्तान को यह दर्जा दिया था. यह और बात है कि पाकिस्तान एक ओर आतंक के विरुद्ध लड़ने में मददगार होने का ढोंग दिखाता रहा और दूसरी ओर स्वयं आतंक के सबसे बड़े संरक्षक की भूमिका भी निभाता रहा.

इस कारण उसे कई बार चेतावनी देने के साथ अमेरिका को 2018 में पाकिस्तान को दी जानेवाली आर्थिक व सैन्य सहायता को भी रोकना पड़ा था. इसके अलावा पाकिस्तान में सक्रिय कई आतंकी एवं चरमपंथी गिरोहों और उनके सरगनाओं पर वैश्विक पाबंदी लगाने के फैसले भी हुए. ये तत्व भारत और अफगानिस्तान समेत दक्षिणी एशिया में अशांति व हिंसा फैलाने के साथ दुनिया के अन्य हिस्सों, जिनमें यूरोप व अमेरिका भी शामिल हैं, में आतंकवाद का प्रसार करने में आज भी लगे हुए हैं.

इमरान खान ने प्रधानमंत्री पद ग्रहण करते हुए यह भरोसा दिलाया था कि वे आतंकवाद के विरुद्ध कड़े कदम उठायेंगे, लेकिन वे स्वयं भी परोक्ष रूप से उनकी पैरोकारी करने लगे. उन्होंने अमेरिकी यात्रा के दौरान स्वीकार भी किया था कि पाकिस्तान में हजारों आतंकी हैं, जो देश के भीतर और बाहर अस्थिरता फैलाने में लगे हुए हैं. आतंकवाद को प्रश्रय देनेवाले देशों के विरुद्ध कार्रवाई करनेवाली अंतरराष्ट्रीय संस्था ने भी पाकिस्तान को चेतावनी दी है कि वह आतंकियों की शरणस्थली न बने तथा उनके धन व आय के स्रोतों को रोके.

वास्तव में आतंक पाकिस्तान की रक्षा और विदेश नीति का मुख्य आधार है. ऐसा दशकों से चला आ रहा है. पाकिस्तान की राजनीति पर सेना और उसकी कुख्यात खुफिया तंत्र आइएसआइ की पूरी पकड़ है. अपने राजनीतिक स्वार्थों को साधने के लिए वहां के सभी राजनीतिक दल प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से आतंकी समूहों के पक्ष में खड़े मिलते हैं.

अपने विरुद्ध लगातार हो रही कार्रवाइयों तथा धन के लालच के कारण पाकिस्तानी राजनीति और सेना की नजदीकी चीन से बढ़ी है. चीन न केवल पाकिस्तान को अपने आर्थिक चंगुल में लेता जा रहा है, बल्कि वह आतंकियों की हिमायत भी कर रहा है. वह इस रणनीति से अफगानिस्तान में भी अपना वर्चस्व बनाना चाह रहा है. अमेरिका और यूरोप इस बात से पूरी तरह आगाह हैं कि पाकिस्तान कमोबेश चीन की कठपुतली बन चुका है.

भारत ने अपने कूटनीतिक प्रयासों से तथा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान की असलियत दुनिया के सामने रखने में बड़ी भूमिका निभायी है. अमेरिका भी अब समझ चुका है कि पाकिस्तान एक खतरनाक देश है. अलग-थलग पड़ते पाकिस्तान के लिए अमेरिकी कांग्रेस का प्रस्ताव एक बड़ा झटका है

Posted By : Sameer Oraon

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संपादकीय is a contributor at Prabhat Khabar.

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