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नेपाल में चीन का दुष्चक्र

By संपादकीय
Updated Date
प्रतीकात्मक तस्वीर

रामनरेश प्रसाद सिंह

वरिष्ठ फेलो, विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन

delhi@prabhatkhabar.in

नेपाल के प्रधानमंत्री केपी ओली बहुत हद तक चीन के प्रभाव में आ गये थे. जब भी अपने कार्यकाल में उनके ऊपर राजनीतिक संकट आया, तो चीन ने भी उन्हें बचाने में सहयोग दिया. चीनी कूटनीतिक कम्यूनिस्ट पार्टी के नेताओं से मिलते रहे और उनकी बैठकों में भी भाग लिया. यह सब ओली की रक्षा के लिए ही था. ओली और प्रचंड के बीच शुरू में ही यह सहमति बनी थी कि ढाई साल के बाद ओली प्रधानमंत्री का पद प्रचंड के लिए छोड़ देंगे. मौजूदा राजनीतिक संकट का एक बड़ा कारक ओली की वादाखिलाफी भी है.

भारत के साथ कई तनावों के बावजूद नेपाल की जनता के बड़ा हिस्से में भारत के साथ सांस्कृतिक और धार्मिक जुड़ाव की गहरी भावना है. वहां के लोग नाखुशी के बावजूद भारत से अलग नहीं होना चाहते हैं. जब उन्होंने चीन के बढ़ते प्रभाव और चीन की छुपी हुई मानसिकता को देखा, तो उनकी चिंता बढ़ गयी. चीन ने नेपाल में इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने का काम किया है, पर लोग उसके साथ वैसा जुड़ाव नहीं महसूस करते है, जैसा कि भारत के साथ.

ऐसे में लोगों ने ओली का विरोध करना शुरू कर दिया, जो एक तरह से चीन-विरोधी भावनाओं की ही अभिव्यक्ति था. इससे ओली भी घबड़ा गये. प्रचंड ने भी यह महसूस किया कि भारत से बहुत दूरी बनाना और चीन के साथ पूरी तरह घुल-मिल जाना नेपाल के हित में नहीं है. नेपाल में राजशाही समर्थक भी अच्छी संख्या में हैं. ओली के कार्यकाल में भ्रष्टाचार बढ़ने से भी असंतोष का माहौल है. विकास के काम मंथर गति से चल रहे हैं. इन आयामों ने ओली विरोध का दायरा बहुत बढ़ा दिया था. इसी दबाव में उन्होंने राष्ट्रपति से संसद भंग करने की सिफारिश की.

कम्यूनिस्ट पार्टी में टूट की आशंका का माहौल एक साल से है. चीनी कम्यूनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का नेपाल आना और नेपाली कम्यूनिस्ट पार्टी को एक रखने की कोशिश नयी बात नहीं है. उनकी राजदूत पार्टी की बैठकों में शामिल हो चुकी हैं. कूटनीतिक मर्यादाओं से परे जाकर चीनी अधिकारी ओली के संकटमोचक बनते रहे हैं. चीनी पार्टी के नेताओं का आना इसी कड़ी में है. लेकिन मुझे नहीं लगता है कि उनकी कोशिशें इस बार कामयाब हो सकेंगी क्योंकि नेपाल की जनता और प्रचंड गुट के इस सोच का दबाव बहुत अधिक है कि ओली ने जो रवैया अपनाया है, उससे भारत-नेपाल संबंध उत्तरोत्तर बिगड़ते जायेंगे.

नेपाल के लोग यह समझने लगे हैं कि चीन जहां कहीं घुसता है, वहां की आबादी में बदलाव करता है, अतिक्रमण का प्रयास करता है तथा आर्थिक व सांस्कृतिक माहौल को अपने अनुरूप ढालने की जुगत लगाता है. नेपाली शहरों में चीनियों की बढ़ती संख्या और उत्तरी सीमा पर नेपाली क्षेत्र में निर्माण के प्रयासों ने जनता के मन में अविश्वास पैदा कर दिया है तथा वे चीन को एक औपनिवेशिक शक्ति के रूप में देखने लगे हैं.

ऐसा ही पाकिस्तान में भी हो रहा है. नेपाल में बड़ी संख्या में यूरोपीय एनजीओ की मौजूदगी तथा धर्म व संस्कृति में उनका हस्तक्षेप भी नेपाली जनता की चिंता का कारण है. ये एनजीओ घाटी के अलावा पहाड़ी और मधेश इलाकों में भी सक्रिय हैं.

नेपाल, खास कर घाटी, में चीन ने मीडिया और बौद्धिक जगत में बड़ा निवेश किया है. इस कारण उन पर चीन का प्रभाव है और वे उसके पक्ष में लिखते-बोलते रहते हैं. लेकिन चीन को पता है कि उसे नेपाल में भारत-विरोधी वातावरण बनाने में लंबा समय लगेगा. इसलिए ओली के शासन के दौरान उसने अपना प्रभाव तेजी से बढ़ाने की कोशिश की.

लेकिन यह कहा जा सकता है कि चीन द्वारा कम्यूनिस्ट पार्टी को एक रखने और सरकार को प्रभावित करने की कोशिशें बहुत अधिक नहीं चल सकती हैं. भारत की ओर से भी कुछ गलतियां हुई हैं. नेपाल में विकास से जुड़ी जिन परियोजनाओं का जिम्मा भारत ने लिया, उन्हें पूरा नहीं किया. काम की गति भी काफी धीमी रही थी. पहले भ्रम फैलाया गया कि भारत का व्यवहार बड़े भाई की तरह है, वह नेपाल पर काबिज होना चाहता है और वह हर मामले में दखल देता रहता है.

मोदी सरकार ने इस संबंध में एक नीति अपनायी कि भारत नेपाल के आंतरिक मामलों में कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा, जबकि वहां से ऐसे हस्तक्षेप के निवेदन लगातार आते रहे हैं. भारत के तटस्थ रहने की यह नीति पहले की स्थिति के विपरीत है, जब भारत हस्तक्षेप करता था. इससे नेपाली जनता में यह भरोसा भी जगा है कि भारत अपने पड़ोसी देश पर हावी होने का इरादा नहीं रखता है.

इसके बरक्स चीन के निहित स्वार्थों की कलई लोगों के सामने खुलने लगी है. भविष्य में चाहे जो भी सरकार बने, वह ओली की तरह चीन के साथ जुड़ने से परहेज करेगी और भारत के साथ बेहतर संबंध बनाने के लिए प्रयासरत होगी. अनेक वरिष्ठ भारतीय अधिकारियों ने हाल के दिनों में नेपाल की यात्रा कर यह संदेश देने की कोशिश की है कि भारत सहयोग की नीति पर चलने का इच्छुक है, न कि वह हस्तक्षेप कर अपना वर्चस्व बनाना चाहता है.

इसके उलट चीन नेपाल की राजनीति, अर्थव्यवस्था और संस्कृति को प्रभावित और परिवर्तित कर नेपाल को परोक्ष रूप से अपने नियंत्रण में लेना चाहता है. उसके इस इरादे को साकार करने में लगे ओली को संकट का सामना करना पड़ा है कि जनता और अन्य राजनीतिक गुट भारत से दूरी और चीन पर निर्भरता के नीति के विरोधी हैं.

Posted By : Sameer Oraon

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