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चीन का श्रीलंका पर कसता शिकंजा

By विजय चौधरी
Updated Date
चीन का श्रीलंका पर कसता शिकंजा
चीन का श्रीलंका पर कसता शिकंजा
File Photo

श्रीलंका की संसद में 25 मई को कोलंबो पोर्ट सिटी इकोनॉमिक कमिशन बिल पारित हो गया. इसके तहत समुद्र किनारे भूमि-उद्धार कर 269 हेक्टेयर क्षेत्र को देश का पहला विशेष आर्थिक क्षेत्र घोषित कर दिया गया है. इसमें से 153 एकड़ भूमि को चीन की चाइना हार्बर कंपनी को 99 साल के लिए लीज पर दिया जायेगा.

इस भूमि को 140 करोड़ डॉलर (लगभग 10,000 करोड़ रुपये से अधिक) का चीनी ऋण-निवेश कर एक अंतरराष्ट्रीय महत्व के बंदरगाह एवं वैश्विक आर्थिक केंद्र के रूप में विकसित करने की योजना है. श्रीलंका में इस बिल को लेकर शुरू से काफी विवाद रहा है एवं आशंका व्यक्त की जा रही है कि इससे देश की राजधानी कोलंबो के अंदर एक तरह से नये चीनी प्रांत की स्थापना हो जायेगी.

इसके पूर्व 2017 में ही कोलंबो के निकट हम्बनटोटा बंदरगाह विकसित करने के लिए एक चीनी कंपनी को 99 वर्षों के लीज पर दिया गया था एवं धीरे-धीरे उसका प्रबंधन एवं प्रशासन चीन के हाथ में चला गया. इसे पूरी दुनिया ने साम्राज्यवादी कदम करार दिया था. वर्तमान बिल के प्रावधान उससे भी ज्यादा खतरनाक है, क्योंकि इस विशेष आर्थिक क्षेत्र का शासन एवं प्रबंधन राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत एक आयोग को दिये जाने का प्रावधान है.

इस आयोग का गठन एवं क्रिया-कलाप पूर्ण रूप से चीन के दिशा-निर्देशन में चलने की संभावना है. श्रीलंका के लोग मानते हैं कि यह श्रीलंकाई संविधान एवं कानून से बिल्कुल असंगत प्रावधान किया गया है. वास्तव में, इसके जरिये चीन वहां अपना शासन चलाने की तैयारी में है. गौरतलब है कि समुद्री सिल्क परियोजना के नाम से चर्चित यह योजना चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की तथाकथित अति महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड परियोजना का हिस्सा है.

इसे चीन एवं श्रीलंका की साझा दूरगामी प्रभाववाली योजना के रूप में क्रियान्वित किया जा रहा है. भौगोलिक स्थिति के कारण दक्षिण एशिया में श्रीलंका का सामरिक एवं आर्थिक दृष्टिकोण से अत्यधिक महत्व है. फिलहाल दक्षिण एशिया के समुद्री क्षेत्र में हांगकांग एवं दुबई दो स्थापित अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक अड्डे हैं. जाहिर तौर पर, कोलंबो पोर्ट सिटी को इन दोनों के मुकाबले अंतरराष्ट्रीय व्यापार का बेहतर एवं ज्यादा उपयोगी केंद्र बनाने की योजना है.

चीन द्वारा ऋण-जाल की सोची-समझी नीति खुल्लमखुल्ला अपनायी जा रही है. इसके तहत विकासशील देशों में आधारभूत संरचना के निर्माण एवं विकास के लिए आसान किस्तों पर ऋण उपलब्ध कराया जाता है. फिर संबंधित देश द्वारा अपनी कमजोर अर्थव्यवस्था के कारण ऋण अदायगी में देर करने पर अपनी प्रभाव क्षमता का इस्तेमाल कर नवसृजित परिसंपत्ति के प्रबंधन एवं स्वामित्व का अधिकार चीन द्वारा हासिल कर लिया जाता है.

इसलिए माना जा रहा है कि इस कदम से श्रीलंका चीनी उपनिवेश बनने के मार्ग पर बढ़ चला है. इस बिल के पास होने से पहले श्रीलंकाई संविधान के प्रावधान के अनुसार इसके विरूद्ध 19 आवेदन वहां के उच्चतम न्यायालय में दाखिल किये गये. इन आवेदनों में सबसे गंभीर आरोप संप्रभुता से समझौता करने का लगा, पर इन्हें नजरअंदाज कर चीनी दबाव में संसद ने बिल पास कर दिया.

पूर्व राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना के हटने के बाद राजपक्षे भाइयों (महिंदा राजपक्षे प्रधानमंत्री एवं गोटेबाया राजपक्षे के राष्ट्रपति के रूप में) के सत्तासीन होने के बाद से ही चीन से श्रीलंका के संबंध प्रगाढ़ होने लगे हैं. अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में राजपक्षे का झुकाव चीन की तरफ शुरू से ही स्पष्ट रहा है.

सिरिसेना के समय एक संतुलित नीति अपनाने का प्रयास किया गया था, परंतु इसमें वे सफल नहीं हो पाये. इस बिल की अहमियत एवं दोनों देशों के गहराते रिश्तों का आकलन इस आधार पर भी किया जा सकता है कि अप्रैल के अंत में जब श्रीलंका सहित पूरे दक्षिण एशिया में कोरोना संक्रमण चरम पर था एवं आम यातायात प्रतिबंधित थे, ऐसे समय में चीनी रक्षा मंत्री का श्रीलंका दौरा हुआ. इसमें इस बिल के साथ भविष्य की रणनीति पर दोनों भाइयों के साथ गहन मंत्रणा हुई. बातें जिस रूप में बढ़ रही हैं, कोलंबो को चीन का सैनिक अड्डा बनने से कोई रोक नहीं सकेगा.

स्वाभाविक रूप से भारत के लिए यह मामला संवेदनशील ही नहीं, बल्कि चिंता का विषय है. चीन से भारत के रिश्ते जगजाहिर हैं. हाल के दिनों में गलतफहमी और तनाव में इजाफा ही हुआ है. अक्साई िचन, लद्दाख, अरुणाचल एवं अन्य क्षेत्रों में भूमि विवाद के कारण चीन शुरू से ही भारत के प्रति वैमनस्य रखता है. विश्व व्यापार एवं अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में चीन का अमेरिका के साथ भी मतांतर एवं विरोध सीधे तौर पर है, लेकिन एक सशक्त पड़ोसी के रूप में भारत पर चीन हमेशा वक्रदृष्टि रखता है.

साथ ही, सियाचिन से लेकर गलवान घाटी तक समय-समय पर भारत की बांह मरोड़ने की असफल कोशिश भी करता है. दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन बनाये रखना भारत के लिए अनिवार्य है. इसके लिए कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों, यथा- सार्क, आसियान, बिम्सटेक आदि के गठन एवं क्रियाकलाप में भारत नेतृत्वकर्ता की भूमिका निभा रहा है.

क्वाड समूह (भारत, जापान, आस्ट्रेलिया एवं अमेरिका) के गठन में अहम भूमिका से भारत की स्थिति सुदृढ़ हुई है. इन सब कारणों से भी भारत चीन की आंखों की किरकिरी बना हुआ है. इस बिल के पास होने से अपने पिछवाड़े में चीन की जबरदस्त सामरिक उपस्थिति की संभावना से भारत का भविष्य के लिए सशंकित होना लाजिमी है.

उल्लेखनीय है कि पश्चिम में पाकिस्तान, उत्तर में नेपाल एवं तिब्बत, पूर्व में बांग्लादेश और दक्षिण में श्रीलंका- इन सब देशों में चीन व्यापारिक समझौतों एवं ऋण-जाल की नीति से अपनी उपस्थिति एवं ताकत मजबूत कर रहा है. भारत पिछले कई दशकों से चीन के साथ मैत्रीपूर्ण एवं शांतिपूर्ण सहजीविता के आधार पर अच्छा पारस्परिक रिश्ता कायम रखना चाहता है, जबकि चीन हमेशा भारत को क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखता है.

इस परिप्रेक्ष्य में भारतीय विदेश नीति की बड़ी परीक्षा सामने है. इस महाद्वीप एवं आसपास के क्षेत्र में चीन के कसते शिकंजे पर नजर रखने एवं उससे जूझने के लिए उपयुक्त कूटनीति अपनाने की प्राथमिकता होनी चाहिए. स्वाभाविक रूप से पड़ोसी मुल्कों के साथ कूटनीतिक विश्वसनीयता एवं रिश्तों की मजबूती के प्रयास से अपनी स्थिति सुदृढ़ करनी होगी. कूटनीति में संवाद का अपना महत्व होता है. संवादहीनता स्थिति को बदतर बनाती है. इस कारण चीन से भी पूर्ण सतर्कता से बातचीत जारी रखना होगा. भविष्य में दक्षिण एशिया एवं विशेष रूप से भारतीय उपमहाद्वीप में शांति कायम रखना ही राष्ट्रहित में उचित होगा.

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