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रक्षा विनिर्माण पर जोर

Updated at : 23 Feb 2021 10:56 AM (IST)
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रक्षा विनिर्माण पर जोर

Paju: A South Korean army K-9 self-propelled howitzer fires during the annual exercise in Paju, South Korea, near the border with North Korea, Tuesday, June 23, 2020. A South Korean activist said Tuesday hundreds of thousands of leaflets had been launched by balloons across the border with North Korea overnight, after the North repeatedly warned it would retaliate against such actions. AP/PTI Photo(AP23-06-2020_000017B)

रक्षा उपकरणों के आयातक से निर्यातक बनने के लिए रक्षा क्षेत्र में रिसर्च व डेवलपमेंट और मैन्युफैक्चरिंग के लिए ढांचागत विकास पर जोर देना होगा.

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कोरोनाकाल में जब देश राजस्व संकट के कठिन दौर से गुजर रहा था, तो चालबाज चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा पर उलझाने की कोशिशों में लगा हुआ था. सरकार के सामने युद्ध जैसे बन रहे हालात से निपटने और रक्षा क्षमता के विकास की दोहरी चुनौती थी. यह बहुत जरूरी है कि पूर्वी मोर्चे पर अस्थिरता और धोखे की आशंकाओं तथा पाकिस्तान की हरकतों के मद्देनजर भारतीय सेनाओं को अत्याधुनिक हथियारों से लैस किया जाये.

वहीं हिंद महासागर में नौसेना की क्षमता में सतत विस्तार ही चीन को शांत रखने का एकमात्र विकल्प है. एयरोस्पेस में तकनीक उन्नयन और आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस चीन की नयी रणनीति है. ऐसे में भारत को भी अत्याधुनिक उपकरणों के साथ अपने इंटेलीजेंस, निगरानी और टोही क्षमताओं को मजबूत करना होगा. विशेषकर आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस, रोबोटिक्स, क्वांटम कंप्यूटिंग तथा साइबर वारफेयर के क्षेत्र में रिसर्च और डेवलपमेंट को अभी से गति देने की आवश्यकता है. रक्षा जरूरतों को पूरा करने में पर्याप्त पूंजी नहीं होना एक बड़ी बाधा है. हालांकि, शेकातकर समिति के सुझावों को अगर लागू किया जाये, तो रक्षा खर्च में बचत होगी, साथ ही हम रक्षा विनिर्माण में आत्मनिर्भता की ओर तेजी से बढ़ पायेंगे.

देश में अत्याधुनिक हथियारों को विकसित करने की भरपूर क्षमता थी, लेकिन पूर्ववर्ती सरकारों ने हथियारों के आयात का आसान विकल्प चुना. वर्तमान में रक्षा विनिर्माण और निर्यात में क्षमता विकास पर बल दिया जा रहा है. प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है कि यदि रक्षा क्षेत्र में हथियारों और सामानों के विनिर्माण में हम आत्मनिर्भरता हासिल करें, तो इससे न केवल दूसरे देशों पर हमारी निर्भरता घटेगी, बल्कि बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन भी होगा. दशकों बाद रक्षा बजट में 19 फीसदी की बढ़ोतरी और निजी क्षेत्र की भागीदारी का निर्णय, कम लागत में गुणवत्ता पूर्ण उपकरणों को तैयार करने में देश को आत्मनिर्भर बना सकता है.

रक्षा उपकरणों के आयातक से निर्यातक देश बनने के लिए रक्षा क्षेत्र में रिसर्च व डेवलपमेंट और मैन्युफैक्चरिंग के लिए ढांचागत विकास पर जोर देना होगा. टेवॉर एक्स95 राइफल इस्राइल से आयात होती थी, अब इसे देश में निर्मित किया जा रहा है. भारतीय वायु सेना के लिए 83 तेजस लड़ाकू विमानों की आपूर्ति के लिए 48000 करोड़ का कांट्रैक्ट हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड का दिया गया है. रक्षा मंत्रालय ने डीआरडीओ द्वारा स्वदेश निर्मित 118 अर्जुन मार्क-1ए टैंकों को भारतीय सेना में शामिल करने की मंजूरी दी है.

मेक इन इंडिया के तहत छह नये एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल (एइडब्ल्यू एंड सी) को विकसित करने, समुद्री निगरानी तंत्र को सुदृढ़ करने के लिए नये यूएवी और सेना के लिए नयी कार्बाइन खरीद हेतु भारतीय फर्मों को भी आमंत्रित करने जैसे फैसले उम्मीद जगानेवाले हैं. रक्षा उत्पादन-निर्यात प्रोत्साहन नीति 2020 के तहत 2025 तक 35000 करोड़ के रक्षा उपकरणों के निर्यात का लक्ष्य है. निर्यात संवर्धन के साथ-साथ भारतीय फर्मों से घरेलू उपकरणों की खरीद करने से भारतीय रक्षा क्षेत्र, विकास और क्षमता विस्तार की नयी ऊंचाई हासिल कर सकेगा.

Posted By : Sameer Oraon

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