घर लौट आयी है बंगाल की मूल आत्मा, पढ़ें प्रभु चावला का खास आलेख

प्रधानमंत्री मोदी के साथ शुभेंदु अधिकारी
Bengal election results : कांग्रेस, वाम मोर्चा और बाद में तृणमूल कांग्रेस ने बंगाल को एक बिखरे और आत्महीन राज्य में बदल दिया. वोट बैंक की राजनीति ने समाज को धार्मिक और क्षेत्रीय आधार पर विभाजित किया. बांग्लादेश से घुसपैठ ने सीमावर्ती जिलों को अस्थिर बना दिया.
Bengal election results : नौ मई की तपती दोपहर को कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड में इतिहास ने केवल एक पन्ना नहीं पलटा. वह एक गेरुआ उभार के रूप में फूट पड़ा, जिसने सात दशकों से अधिक की वैचारिक जड़ता को झुलसा दिया. पश्चिम बंगाल के इतिहास में पहली बार गेरुआ वस्त्रधारी एक नेता ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. पचपन वर्षीय शुभेंदु अधिकारी ने तृणमूल कांग्रेस से उभरकर अपनी पहचान बनायी. उनका परिधान केवल वस्त्र नहीं था, बल्कि एक ऐसे राज्य में, जो लंबे समय तक कांग्रेस की निष्क्रियता, मार्क्सवादी कुप्रबंधन और ममता बनर्जी की राजनीति से बंधा रहा, सांस्कृतिक पुनरुत्थान की चुनौतीपूर्ण घोषणा के रूप में था.
राज्यपाल आरएन रवि भी, जिन्होंने तमिलनाडु में अपने कार्यकाल के दौरान शायद ही कभी पारंपरिक वस्त्र पहने थे, गेरुआ कुर्ता और पारंपरिक बंगाली धोती में सुसज्जित दिखाई पड़े. उन्होंने अपनी पत्नी के साथ, जो समान रंग की साड़ी पहने थीं, उस दिन रवींद्रनाथ ठाकुर की जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की. इस क्षण को संभव बनाने वाला जनादेश एक ऐतिहासिक विभाजन था. भाजपा की 207 सीटों और 45 प्रतिशत मतों के साथ मिली विजय फुसफुसाहट नहीं, बल्कि प्रबल जनाक्रोश की गर्जना थी. मतदाता छोटे-मोटे बदलाव नहीं, बल्कि पूर्ण परिवर्तन चाहते थे. मोदी, अमित शाह और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं के लिए यह केवल चुनावी गणित नहीं था. यह एक सांस्कृतिक विजय थी, जिसने 175 वर्षों की ब्रिटिश औपनिवेशिक स्मृति को एक झटके में समाप्त कर दिया.
कोलकाता औपनिवेशिक शासन का पालना था. यहीं से 1774 में बंगाल के पहले गवर्नर जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स ने उस साम्राज्य का संचालन किया था, जिसकी पकड़ पूरे उपमहाद्वीप तक फैली थी. वह शहर जिसने ब्रिटिश राज की प्रशासनिक रीढ़ को जन्म दिया, अब उसके प्रतीकात्मक पतन का साक्षी बना. भाजपा की रणनीति अत्यंत सूक्ष्म, सुविचारित और दूरदर्शी थी. पश्चिम बंगाल को जानबूझकर अंतिम राज्य के रूप में मतदान समाप्त करने के लिए रखा गया. अंतिम चरण और चार मई की मतगणना के बीच पांच दिनों का अंतर रखा गया. यह तिथि विशेष महत्व रखती थी, क्योंकि यह जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जयंती थी, जिनकी अखंड भारत की परिकल्पना लंबे समय तक वामपंथी इतिहास लेखन की परतों में दबा दी गयी थी. शपथ ग्रहण समारोह नौ मई को निर्धारित किया गया, जिसे रवींद्रनाथ ठाकुर की विरासत को स्मरण करते हुए गेरुआ प्रतीकवाद से जोड़ा गया. ममता बनर्जी के नबान्न से सरकार चलाने के केंद्र को वापस ऐतिहासिक राइटर्स बिल्डिंग में ले जाने का निर्णय भी पुनर्स्थापन का संकेत था.
इस दृश्य के पीछे भाजपा की 15 वर्षों की धैर्यपूर्ण मेहनत थी. पश्चिम बंगाल की भूमि ऐतिहासिक महत्व रखती है, जहां राजा राम मोहन राय ने नवजागरण का दीप प्रज्वलित किया था, बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने ‘वंदे मातरम’ की रचना की. सुभाष चंद्र बोस ने वहीं ब्रिटिश राज को चुनौती देने वाला आक्रामक स्वतंत्रता आंदोलन खड़ा किया. श्री अरविंद ने हिंदू अध्यात्म को क्रांतिकारी विचारधारा का रूप दिया, तो स्वामी विवेकानंद ने विश्व मंच पर हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व किया और घोषणा की कि भारत की आत्मा शाश्वत है. इन महान विभूतियों ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के ऐसे बीज बोये कि न तो कांग्रेस की धर्मनिरपेक्ष राजनीति और न ही मार्क्सवाद की भौतिकवादी विचारधारा उन्हें उखाड़ सकी. फिर भी सात दशकों तक इन प्रतीकों को उपेक्षित रखा गया.
कांग्रेस, वाम मोर्चा और बाद में तृणमूल कांग्रेस ने बंगाल को एक बिखरे और आत्महीन राज्य में बदल दिया. वोट बैंक की राजनीति ने समाज को धार्मिक और क्षेत्रीय आधार पर विभाजित किया. बांग्लादेश से घुसपैठ ने सीमावर्ती जिलों को अस्थिर बना दिया. हिंसा ने निवेशकों को दूर भगा दिया. जो बंगाल कभी औद्योगिक शक्ति था, वह पूंजी पलायन, उद्योगहीनता और उगाही का पर्याय बन गया. वर्ष 1960-61 में प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत की 127.5 प्रतिशत थी, जो गिरकर 83.7 फीसदी रह गयी. राष्ट्रीय जीडीपी में राज्य की हिस्सेदारी 10.5 फीसदी से घटकर 5.8 प्रतिशत रह गयी. भाजपा ने इस अवसर को पहचाना. पंद्रह वर्षों तक उसने चुपचाप काम किया. अपमानित समूहों की पहचान की, हिंदुओं को उनके खतरे में पड़े धार्मिक प्रतीकों की याद दिलायी और चेताया कि जनसांख्यिकीय बदलाव उन्हें अपनी ही भूमि में अजनबी बना सकते हैं.
संदेशखाली की घटनाओं, चुनाव के बाद की हिंसा और रोजमर्रा के अपमान से उपजा क्रोध अंततः विस्फोटित हुआ. हिंदुओं ने जाति और वर्ग से ऊपर उठकर अभूतपूर्व एकजुटता के साथ मतदान किया. लेकिन विजय के साथ सबसे कठिन परीक्षा भी आती है. शुभेंदु अधिकारी की सरकार को भाषणों से आगे बढ़कर परिणाम देने होंगे. बंगाल के लोग अब विकास चाहते हैं, जो समाज को जोड़े, तोड़े नहीं. उन्होंने हिंदू एकजुटता के लिए मतदान किया, अब वे व्यवहार में रामराज्य चाहते हैं. ऐसा शासन जो वंचितों की गरिमा लौटाये, निवेश को गुंडागर्दी के भय से मुक्त करे, सीमाओं को सुरक्षित बनाये और बंगाल की बौद्धिक व आर्थिक शक्ति पुनर्जीवित करे.
राइटर्स बिल्डिंग में वापसी इसी गहरे उद्देश्य का प्रतीक है. अब सचिवालय इतिहास से कटे आधुनिक भवन में नहीं बैठेगा. वह उन्हीं कक्षों में लौटेगा, जहां कभी औपनिवेशिक आदेश लिखे जाते थे और बाद में क्रांतिकारियों ने उनका विरोध किया था. इस स्थानांतरण के माध्यम से नयी सरकार ने यह घोषणा की कि बंगाल की पहचान न तो औपनिवेशिक अवशेष है और न ही वामपंथी प्रयोगशाला, बल्कि बंगाल भारत की निरंतर जीवंत धारा का हिस्सा है. आलोचक इस पर आपत्ति करेंगे. कुछ अन्य लोग धर्मनिरपेक्ष गढ़ों के अंत पर शोक जतायेंगे. जनादेश स्पष्ट है. मतदाताओं ने अतीत के टूटे वादों को अस्वीकार कर दिया. भूमि सुधारों ने कृषि को ठहराव दिया, औद्योगिक नीतियों ने विकास के स्थान पर हड़तालों को बढ़ावा दिया और अल्पसंख्यक राजनीति ने बहुसंख्यकों की बढ़ती चिंताओं की उपेक्षा की. नौ मई को हुए शपथ ग्रहण समारोह के बीज बंगाल के अपने राष्ट्रवादियों ने बोये थे. राजा राममोहन राय की तर्कशीलता, बंकिम का राष्ट्रप्रेम, सुभाषचंद्र बोस का साहस, अरविंद की दृष्टि और विवेकानंद का उत्साह अंततः फलित हुआ. इतिहास गेरुआ स्याही से पुनर्लिखित हो चुका है. आने वाले वर्ष तय करेंगे कि यह बंगाल की स्थायी लिपि बनेगा या केवल एक साहसी प्रथम अध्याय. फिलहाल एक सत्य निर्विवाद है. बंगाल की मूल आत्मा घर लौट आयी है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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