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फिल्मों का बदलता महाकुंभ

गोवा में चल रहे 52वें भारतीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में अंतरराष्ट्रीय वर्ग के लिए 96 देशों से 624 फिल्मों की प्रविष्टियां आयी हैं, जिनमें से 73 देशों की 148 फिल्मों का चयन हुआ है.

By संपादकीय
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फिल्मों का बदलता महाकुंभ
फिल्मों का बदलता महाकुंभ
Symbolic Pic

देश का सबसे बड़ा फिल्म मेला गोवा में 20 नवंबर से शुरू हो गया, जो 28 नवंबर तक चलेगा. एशिया के इस सबसे पुराने ‘भारतीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह’ की शुरुआत 1952 में हुई थी और इस वर्ष समारोह का 52वां आयोजन है. कोरोना महामारी के चलते इसका आयोजन निर्धारित समय में नहीं हुआ, तो पिछले साल का आयोजन जनवरी, 2021 में किया गया था. इसी वर्ष फिर से एक और आयोजन होने से इसकी नियमितता बरकरार हो गयी है.

जब हमारे देश में फिल्म समारोह की शुरुआत हुई थी, तब वेनिस, कान, लोकार्नो और कार्लोवी वारी जैसे अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह विशिष्ट वैश्विक पहचान बना चुके थे. जब 1946 में चेतन आनंद की हिंदी फिल्म ‘नीचा नगर’ ने कान फिल्म समारोह में सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार जीता, तो पहली बार भारतीय सिनेमा भी विश्व पटल पर आ गया. स्वतंत्रता के बाद सरकार और फिल्मकारों को लगा कि भारत में भी अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह आयोजित होना चाहिए.

इस विचार से पहला समारोह 1952 में मुंबई में आयोजित हो तो गया, लेकिन दूसरा समारोह नौ साल बाद दिल्ली में 1961 में हो सका. प्रतियोगिता वर्ग के साथ तीसरा समारोह दिल्ली में 1965 में हुआ और इसका नियमित आयोजन 1974 से ही संभव हो पाया.

मुझे खुशी है कि मैं नौवें समारोह से इस आयोजन को देख रहा हूं. खुशी यह भी है कि यह समारोह समय के साथ खुद को बदल भी रहा है. इसलिए यह साल-दर-साल बेहतर हो रहा है और लोकप्रिय भी. पहले यह दिल्ली के सहित अलग-अलग शहरों में होता था, पर 2004 से गोवा को ही इसकी स्थायी आयोजन स्थली बना दिया गया. पहले हमारे यहां विश्व के फिल्मकार अपनी फिल्में भेजने से संकोच करते थे, लेकिन अब स्थिति यह है कि 52वें समारोह में अंतरराष्ट्रीय वर्ग के लिए 96 देशों से 624 फिल्मों की प्रविष्टियां आयी हैं, जिनमें से 73 देशों की 148 फिल्मों का चयन हुआ है.

साथ ही, 19 फिल्मों के वैश्विक अंतरराष्ट्रीय प्रीमियर तथा 26 फिल्मों के एशिया और 64 फिल्मों के इंडियन प्रीमियर भी हो रहे हैं. देश-विदेश की कुल 300 फिल्मों का प्रदर्शन इस समारोह में होगा. कोरोना की वजह से पिछली बार की तरह इस बार भी इसका आयोजन हाईब्रिड रूप में हो रहा है. इसे डिजिटल माध्यम से वर्चुअल रूप में गोवा गये बिना अपने घरों से भी देखा जा सकेगा.

हालांकि समारोह के उद्घाटन के दौरान जिस तरह सभागार बिना मास्क पहने लोगों से भरा था, उससे लगा कि अब किसी को कोरोना का भय नहीं. शुरुआत दिग्गज निर्देशक कार्लोस सौरा की स्पेनिश फिल्म ‘द किंग ऑफ ऑल द वर्ल्ड’ के वर्ल्ड प्रीमियर से हुई. इस वर्ष हंगरी के सम्मानित निर्देशक इस्तेवान साबो और हॉलीवुड के महान फिल्मकार मार्टिन स्कॉरसेजी को ‘सत्यजित रे लाइफटाइम अचिवमेंट’ तथा लोकप्रिय अभिनेत्री हेमामालिनी को ‘इंडियन फिल्म पर्सनेलिटी ऑफ द इयर’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया.

इस बार समारोह में कुछ नया भी है. ‘आजादी के अमृत महोत्सव’ के उपलक्ष्य में सूचना प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर की पहल पर देश के 75 ऐसे चयनित युवाओं को आमंत्रित किया है, जो फिल्मों के प्रति विशेष ‘रचनात्मक प्रतिभा’ रखते हैं. साथ ही, 75 वर्षों की चुनींदा 18 फिल्में भी समारोह में हैं. इस बार ओटीटी के दिग्गज एमेजन, नेटफ्लिक्स, सोनी लिव, जी-5 आदि अपनी भागीदारी से आयोजन को नया शिखर देंगे.

ब्रिक्स फिल्म समारोह को भी इसी समारोह के साथ आयोजित किया गया है. प्रतियोगिता खंड की 15 फिल्मों में दो रूसी फिल्मों- ‘द डोर्म’ और ‘मॉस्को डज नोट हैपन’ के साथ ‘एनी डे नाओ’(फिनलैंड), ‘लीडर’ (पोलैंड), ‘रिंग वांडरिंग’(जापान), ‘एंट्रेगलडे’(रोमानिया), ‘शेलोर्ट’(पैराग्वे) और ‘द फर्स्ट फॉलन’ (ब्राजील) जैसी फिल्में हैं. प्रतियोगिता वर्ग में भारत की तीन फिल्मों को भी जगह मिली है, जिनमें मराठी की दो फिल्मों- ‘गोदावरी’ और ‘मी वसंतराव’ के साथ दिमासा बोली की पहली फिल्म ‘सेमखोर’ भी है.

यही फिल्में एक गोल्डन पीकॉक’ और 4 ‘सिल्वर पीकॉक’ पुरस्कारों की दौड़ में हैं. ‘इंडियन पेनोरमा’ वर्ग में देश की 24 फिल्मों में हिंदी की ‘एट डाउन तूफान मेल’ और ‘अल्फा बीटा गामा’ के साथ मराठी की पांच, बांग्ला व कन्नड़ की चार-चार, मलयालम की दो तथा संस्कृत, गुजराती, तमिल, तेलुगू, मिशिंग, दिमासा एवं बोडो की एक-एक फिल्में हैं. दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित रजनीकांत की फिल्मों के साथ ओटीटी की कई फिल्में भी समारोह का विशेष आकर्षण हैं.

फिल्मों के इस महाकुंभ में दिग्गज अभिनेता दिलीप कुमार की अविस्मरणीय फिल्म ‘देवदास’ दिखा कर उन्हें श्रद्धांजलि दी जायेगी. समारोह में देश-विदेश के उन बड़े फिल्मकारों-कलाकारों को याद करने की परंपरा है, जिनका निधन हाल में हुआ हो. दिलीप कुमार के साथ अभिनेता पुनीत राजकुमार, अभिनेत्री सुरेखा सीकरी, सुमित्रा भावे और फिल्मकार बुद्धदेव दासगुप्ता और संचारी विजय की फिल्में दिखा कर उन्हें नमन किया जायेगा.

जेम्स बॉन्ड की भूमिका से लोकप्रिय हुए हॉलीवुड फिल्मों के सुप्रसिद्ध अभिनेता शॉन कॉनरी की पांच चर्चित फिल्में दिखा कर उन्हें विशेष श्रद्धांजलि दी जायेगी. श्रद्धांजलि वर्ग में क्रिस्टोफर प्लमर, जॉन पॉल बेलमोण्डों, बट्रेड टेवनिर्यर और जॉन क्लॉड कैरिएर जैसे विदेशी फिल्मकारों की फिल्में भी प्रदर्शित होंगी. फिल्म प्रेमियों के लिए यह समारोह किसी वरदान से कम नहीं. यदि मुंबई फिल्म जगत के बड़े सितारे व फिल्मकार भी इसमें बढ़-चढ़ कर हिस्सा लें, तो इसका आयोजन और भी सार्थक हो सकेगा. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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