जहरीली होती हवा

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राजधानी होने के कारण दिल्ली और आसपास के शहरों के प्रदूषण पर अधिक चर्चा होती रहती है, लेकिन सच यह है कि समूचा उत्तर भारत इससे ग्रस्त है.

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गंगा-यमुना के मैदानी इलाकों में बढ़ता वायु प्रदूषण जानलेवा होता जा रहा है. पाबंदियों के बावजूद दीपावली में जिस तरह से भारी मात्रा में पटाखे जलाये गये हैं, उससे स्थिति और खराब हुई है. इसे रेखांकित करते हुए दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के निदेशक डॉ रणदीप गुलेरिया ने चेतावनी दी है कि प्रदूषण के कारण कोरोना संक्रमण के मामलों में बढ़ोतरी हो सकती है. विख्यात हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ नरेश त्रेहन ने कहा है कि प्रदूषण का सबसे अधिक असर गंभीर बीमारियों से पीड़ित रोगियों और बच्चों पर पड़ता है.

डॉ गुलेरिया ने भी याद दिलाया है कि दिल्ली में जहरीली हवा में सांस लेने से लोगों की आयु भी घट रही है. राजधानी होने के कारण दिल्ली और आसपास के शहरों के प्रदूषण पर अधिक चर्चा होती रहती है, लेकिन सच यह है कि समूचा उत्तर भारत इससे ग्रस्त है. देश के अन्य भागों में भी स्थिति कोई अधिक संतोषजनक नहीं है. एक हालिया अध्ययन में बताया गया है कि उत्तर भारत में वायु प्रदूषण लोगों की जीवन प्रत्याशा में 2000 की तुलना में नौ वर्षों की कमी कर सकता है तथा महाराष्ट्र एवं मध्य प्रदेश में यह आकलन ढाई से तीन वर्षों का है.

जिस तरह से प्रदूषण का भौगोलिक विस्तार हुआ है, उससे विशेषज्ञ और चिकित्सक हैरान हैं. उल्लेखनीय है कि दुनिया के 20 सबसे अधिक प्रदूषित शहरों में 14 भारत में हैं. उत्तर भारत में 48 करोड़ लोग जहरीली हवा में सांस ले रहे हैं. दुनिया के सबसे अधिक प्रदूषित देशों में एक होने के कारण भारत में कामकाजी लोगों की क्षमता और कार्य दिवसों का भी हृास होता है. बीते साल सर्दी के मौसम में प्रदूषण का स्तर बहुत बढ़ गया था.

मौसम विभाग का अनुमान है कि इस साल भारी सर्दी पड़ सकती है. ऐसे में हमें प्रदूषण से बचने के प्रयास के साथ इस बात को लेकर भी सजग रहना होगा कि नियंत्रित होती कोरोना महामारी फिर आक्रामक न हो जाए. डॉ त्रेहन ने यह भी बताया है कि वायु प्रदूषण से केवल फेफड़े ही प्रभावित नहीं होते, बल्कि शरीर के अन्य अंगों पर भी असर होता है. बच्चों को यह शारीरिक रूप से तो कमजोर बनाता ही है, उनके मस्तिष्क के विकास को भी बाधित करता है. कार्बन और अन्य ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने तथा स्वच्छ ऊर्जा के उपयोग को बढ़ाने की कोशिशें हो रही हैं, पर प्रदूषण को घटाने के अपेक्षित प्रयास नहीं हो रहे हैं.

सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद कई राज्यों में प्रदूषण नियंत्रण के लिए संस्थाओं की स्थापना नहीं हुई है. अधिकतर शहरों में मापने के यंत्र या तो लगाये नहीं गये हैं या वे नियमित रूप से काम नहीं करते. यदि प्रदूषण पर अंकुश लगाया जाता है, तो आबादी को स्वस्थ रखने के साथ आर्थिक नुकसान को भी रोका जा सकता है. इस संबंध में त्वरित उपायों की आवश्यकता है.

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