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साठ हजार के पार सेंसेक्स

सबसे अच्छा यही है कि सिर्फ जानी-पहचानी अच्छी व बड़ी कंपनियों में ही पैसे लगाये जाएं. भले ही उनमें कमाई की गुंजाइश कम दिखती हो, लेकिन नुकसान की गुंजाइश भी उतनी ही कम है.

By आलोक जोशी
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साठ हजार के पार सेंसेक्स
साठ हजार के पार सेंसेक्स
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सेंसेक्स का साठ हजार के पार होना बाजार के सफर का एक महत्वपूर्ण पायदान है. यह इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण है कि पिछले ही साल सेंसेक्स ने 41 हजार से लुढ़क कर 27 हजार के आसपास पहुंच गया था. कारण था कोरोना महामारी का संकट. तब से लगातार ऐसी चर्चा रही कि बाजार फिर से गिर सकता है, लिहाजा निवेशकों को सावधान रहना चाहिए, लेकिन तीन अप्रैल, 2020 से पिछले शुक्रवार तक उसने पूरे तैंतीस हजार प्वाइंट का सफर पूरा किया है.

याद रखें कि सेंसेक्स को पहले तीस हजार प्वाइंट तक पहुंचने में 21 साल लगे थे, लेकिन तब यह भी याद रखना चाहिए कि एक हजार से तीस हजार प्वाइंट का मतलब होता है तीस गुना होना, और तीस हजार से साठ हजार का मतलब है दोगुना होना. यह तेजी कम नहीं है. यह अपने-आप में एक रहस्य-रोमांच कथा है, क्योंकि एक तरफ तो कोरोना संकट था, देश के बड़े हिस्से में लॉकडाउन था, इकोनॉमी में खुशखबरी का निशान तक नहीं था, लोग रोजी-रोटी के चक्कर में बेहाल थे, लेकिन दूसरी तरफ यूं लगता रहा, मानो शेयर बाजार किसी दूसरी दुनिया का बाजार हो.

शुरू में तो ज्यादातर विद्वानों ने इस बढ़ते बाजार को लेकर सावधानी बरतने की सलाह दी. रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास और सेबी के चेयरमैन अजय त्यागी तक ने भी अनेक बार चेतावनी दी कि फाइनेंशियल मार्केट और अर्थव्यवस्था की जमीनी हकीकत का आपस में तालमेल नहीं रह गया है. वे चेता रहे थे कि तेजी के भरोसे देश की आर्थिक सेहत पर कोई नतीजा निकालना ठीक नहीं होगा, मगर दूसरी तरफ सरकार के बड़े मंत्री और नीति आयोग जैसी संस्थाओं में बैठे लोग भी सेंसेक्स की तेजी का हवाला देकर अपनी पीठ ठोकने के लिए मसाला बना रहे थे. हमारे जैसे पत्रकार भी आज से नहीं, पिछले तीस सालों से सेंसेक्स को अर्थव्यवस्था का बैरोमीटर कहते रहे हैं. बाजार की चाल मोटे तौर पर अर्थव्यवस्था के साथ ही चलती रहती थी.

मगर, पिछले डेढ़ सालों में जो हुआ, वह कई स्तरों पर अप्रत्याशित भी रहा और अभूतपूर्व भी. इसीलिए तेजी पर शुरू से ही सवाल उठते रहे हैं, जो धीरे-धीरे कम होते गये. अब तो ऐसे कई लोग पछता भी रहे हैं, जिन्होंने पहले सवाल उठाये थे. देश की सबसे बड़ी ऑनलाइन ब्रोकरेज जेरोधा चलानेवाले नितिन कामत ने तो बाकायदा ट्विटर पर लिख दिया है कि बीस साल के तजुर्बे के बाद भी वे पिछले डेढ़ साल में गलत साबित हुए हैं. इसे आप कामत की विनम्रता भी मान सकते हैं और हताशा भी.

ऐसे लोगों के हौसले काफी बुलंद दिख रहे हैं, जो हमेशा तेजी की ही बात करते हैं. बिग बुल कहे जानेवाले राकेश झुनझुनवाला तो नाम लेकर कुछ टीवी एंकरों को चिढ़ा भी रहे हैं कि वे लोग अब कहां हैं, जिन्हें इस तेजी में फंडामेंटल नहीं दिख रहे थे. अब लगता है कि ज्यादातर लोग मान चुके हैं कि बाजार में आगे तेजी ही रहेगी. लेकिन पुराना अनुभव दिखाता है कि जब तक बाजार में मौजूद लोगों का कोई एक तबका भी सावधानी की बात करता दिखे, तब तक बुलबुला फूटता नहीं है. तेजी का असली खतरा तब सामने आता है, जब सारे मंदड़िये भी तेजी के मूड में आ जाएं. और, अब कुछ कुछ ऐसे हालात दिख रहे हैं.

दूसरी बड़ी चिंता यह है कि इस तेजी के दौर में देश की लगभग आठ हजार लिस्टेड कंपनियों के शेयरों की कीमत 160 लाख करोड़ रुपये बढ़ी है. लेकिन करीब एक चौथाई यानी 42 लाख करोड़ रुपये की बढ़त सिर्फ शीर्ष दस कंपनियों की है. लगभग 60 फीसदी कंपनियां ऐसी हैं, जिनके शेयर अपनी ऊंचाई से 25 फीसदी तक नीचे चल रहे हैं. यह तब हो रहा है, जब बाजार में देशी और विदेशी पैसा खूब आ रहा है. बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज पर रजिस्टर्ड निवेशकों की गिनती इस महीने आठ करोड़ से ऊपर जा चुकी है. पिछली जनवरी में यह आंकड़ा छह करोड़ था.

अभी तो तेजी दिख रही है, इसलिए हर आदमी जहां भी पैसा लगा दे, खुद को समझदार और भाग्यवान पा रहा है. एक सौदे में कमाई के बाद उसे दूसरे सौदे में और पैसे लगाने का हौसला भी मिल जाता है, लेकिन यहीं बड़ी समस्या शुरू होती है. नये लोग अक्सर ऐसे शेयरों में चले जाते हैं, जिनका दाम कम दिखता हो, क्योंकि जिन कंपनियों में सबसे ज्यादा मुनाफा हुआ है, उनके शेयर का दाम देख कर ही बहुत से लोग बिदक जाते हैं.

वे ऐसा सस्ता शेयर चाहते हैं, जो हफ्ते भर में ही जबर्दस्त रिटर्न दे डाले और फिर उसे बेच कर महंगे शेयर खरीदे जायेंगे, लेकिन यह डगर बहुत कठिन है. यहां भी महंगा रोये एक बार, सस्ता रोये बार-बार वाली कहावत सही है. तो, सबसे अच्छा यही है कि सिर्फ जानी-पहचानी अच्छी व बड़ी कंपनियों में ही पैसा लगाया जाए. भले ही उनमें कमाई की गुंजाइश कम दिखती हो, लेकिन वहीं नुकसान की गुंजाइश भी उतनी ही कम है. अगर आपको बाजार समझने में दिक्कत है और कोई अच्छा निवेश सलाहकार भी नहीं है, तो फिर आपके लिए म्यूचुअल फंड ही सही है.

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