कश्मीर पर बंधती उम्मीद
Updated at : 26 Aug 2016 5:52 AM (IST)
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कश्मीर में बीते 48 दिनों से कर्फ्यू के बावजूद जारी हिंसा में अब तक 68 जानें जा चुकी हैं और हजारों लोग घायल हैं. इस बीच घाटी में अमन बहाल करने के प्रयास में गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने दूसरी बार श्रीनगर का दौरा किया है. दो दिनों के इस दौरे में उन्होंने 20 से अधिक […]
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कश्मीर में बीते 48 दिनों से कर्फ्यू के बावजूद जारी हिंसा में अब तक 68 जानें जा चुकी हैं और हजारों लोग घायल हैं. इस बीच घाटी में अमन बहाल करने के प्रयास में गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने दूसरी बार श्रीनगर का दौरा किया है. दो दिनों के इस दौरे में उन्होंने 20 से अधिक प्रतिनिधिमंडलों के करीब 300 सदस्यों के साथ चर्चा की और शांति की अपील करते हुए भरोसा दिया है कि केंद्र व राज्य सरकारें कश्मीर की आम जनता के लिए चिंतित हैं.
घाटी में सुरक्षाबलों द्वारा प्रयुक्त हो रहे घातक छर्रों वाले बंदूकों की जगह वैकल्पिक उपाय करने, समाधान की तलाश में सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल भेजने, 10 हजार कश्मीरी युवाओं को विशेष सुरक्षाकर्मी बहाल करने और देश के किसी कोने में कश्मीरी युवाओं को पेश आनेवाली परेशानियों का हल तलाशने के लिए एक नोडल ऑफिसर तैनात करने जैसी उनकी घोषणाएं स्वागतयोग्य हैं.
लेकिन, यह सवाल अपनी जगह बना हुआ है कि कारगर राजनीतिक पहल और हिंसा में जुटे या उसे सक्रिय समर्थन दे रहे अलगाववादी समूहों से बात किये बिना क्या इन घोषणाओं से कश्मीर के हालात बेहतर होंगे? कर्फ्यू और मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों द्वारा शांति की अपीलों के बावजूद लोगों का सड़कों पर निकल पर रोष प्रदर्शन करना बताता है कि घाटी में कुछ लोग, जिनमें युवाओं की हिस्सेदारी अधिक है, अलगाववादियों से प्रभावित हैं. मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियां ऐसे लोगों पर अपना प्रभाव खो चुकी हैं. यदि ऐसा नहीं होता, तो दलों की बार-बार की अपील बेअसर नहीं रहती.
नागरिक संगठनों के साथ भी कमोबेश यही स्थिति है. केंद्रीय गृह मंत्री और जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री ने जोर देकर कहा है कि घाटी के 95 फीसदी लोग अमन के हिमायती हैं. इसके बावजूद यदि हिंसा थम नहीं रही, तो यह केंद्र और सरकारों की विफलता ही है. कश्मीर विवाद का दीर्घकालिक समाधान तभी संभव है, जब हिंसा का दौर जल्द थमे.
यह महत्वपूर्ण है कि सेना ने भी इसके लिए राजनीतिक समाधान और अलगाववादी समूहों से संवाद की वकालत की है. लेकिन, सरकार की तरफ से फिलहाल ऐसे संकेत नहीं मिले हैं, जिनसे यह अनुमान लगाया जाये कि वह अलगाववादी खेमे के साथ भी बात करने के लिए तैयार है. गृह मंत्री ने यह जरूर कहा कि ‘इंसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत’ के दायरे में संवाद के लिए सभी पक्षों का स्वागत है. अब देखना होगा कि सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल को घाटी के किन समूहों से और किन मुद्दों पर विमर्श के लिए भेजा जायेगा.
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