विश्वास बहाली की चुनौती

पुष्परंजन ईयू-एशिया न्यूज के नयी दिल्ली संपादक भारत से लौटने के बाद नेपाल के उप प्रधानमंत्री विमलेंद्र निधि ने जिस तरह का बयान दिया, उससे यही लगता है कि संबंधों की जो गाड़ी पटरी से उतर गयी थी, उसे वापस ट्रैक पर लाने के वास्ते नेपाल की प्रचंड सरकार गंभीर है. आगामी 15 से 18 […]
पुष्परंजन
ईयू-एशिया न्यूज के नयी दिल्ली संपादक
भारत से लौटने के बाद नेपाल के उप प्रधानमंत्री विमलेंद्र निधि ने जिस तरह का बयान दिया, उससे यही लगता है कि संबंधों की जो गाड़ी पटरी से उतर गयी थी, उसे वापस ट्रैक पर लाने के वास्ते नेपाल की प्रचंड सरकार गंभीर है. आगामी 15 से 18 सितंबर के बीच नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्पकमल दाहाल प्रचंड का दिल्ली आना तय हो गया है, इस वास्ते औपचारिक तैयारी की जिम्मेवारी नेपाल के कानून एवं न्याय मंत्री अजय शंकर नायक को दे दी गयी है. प्रधानमंत्री प्रचंड के भारत से लौटने के बाद भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी काठमांडो जायेंगे, उसके प्रकारांतर नेपाल की राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी भारत की यात्रा पर आयेंगी. प्रधानमंत्री प्रचंड नौ महीने के कार्यकाल में चीन की यात्रा करेंगे या नहीं, इस बारे में अभी पत्ते नहीं खोले जा रहे हैं.
प्रचंड ने दो विशेष दूतों को उत्तर एवं दक्षिण दिशाओं की ओर रवाना किया था. उप प्रधानमंत्री विमलेंद्र निधि नेपाली कांग्रेस के नेता हैं, इसलिए सोची-समझी रणनीति के तहत उन्हें दिल्ली भेजा गया था. आज की तारीख में प्रचंड के सबसे भरोसेमंद नेता कृष्ण बहादुर महरा पिछले हफ्ते पेइचिंग से लौट कर आये, तो वे काफी उत्साहित थे. नेपाल के उप प्रधानमंत्री सह वित्त मंत्री कृष्ण बहादुर महरा ने पेइचिंग से लौटने के बाद कहा था कि चीन की शंका को हमने दूर कर दिया है. आगे भी चीनी सहयोग का हम स्वागत करेंगे. चीन विरोधी गतिविधियां नेपाल में होने नहीं दी जायेंगी.
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की नेपाल यात्रा लगभग साल भर से लंबित है. पिछली सरकार के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली अविश्वास प्रस्ताव को टालने के पीछे यही पेशकश कर रहे थे कि पहले राष्ट्रपति शी जिनपिंग की यात्रा हो जाने दीजिये, फिर संसद में जो होना है, उसे देख लेंगे. लेकिन न तो शी आये, न ही केपी शर्मा ओली अपनी सरकार बचा पाये. नेपाल में जो कुछ पिछले दिनों हुआ है, उससे चीनी कूटनीतिक समुदाय के अहं को चोट पहुंची है. चीन को लगता है कि प्रचंड इस बार भारत की वजह से सत्ता में आये, और संभव है कि जो कुछ समझौता पूर्व प्रधानमंत्री ओली ने मार्च 2016 की पेइचिंग यात्रा में किया था, उसे नयी दिल्ली के इशारे पर लटका दिया जाये.
प्रचंड की पार्टी ‘माओवादी सेंटर’ के वरिष्ठ नेता कृष्ण बहादुर महरा लंबे समय से चीनी सत्ता प्रतिष्ठान से जुड़े रहे हैं.
उस भरोसे की बहाली के वास्ते महरा को उपयुक्त पात्र समझा गया. फिर भी, क्या चीनी राष्ट्रपति शी नेपाल की राजकीय यात्रा पर आयेंगे? इस सवाल पर खुल कर नहीं बोला जा रहा है. उप प्रधानमंत्री महरा इस बार चीनी प्रधानमंत्री ली खछियांग से मिल पाये, मगर उनकी मुलाकात राष्ट्रपति शी से नहीं हो पायी. भारत और चीनी शिखर नेताओं के खुलेपन में फर्क यहीं समझ में आ जाता है. इस साल 15-16 अक्तूबर को ब्रिक्स की बैठक गोवा में है. संकेत यही है कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग, बरास्ते काठमांडो गोवा आ सकते हैं, और संभवतः एक छोटा सा ब्रेक देकर नेपाल यात्रा की औपचारिकता को विराम लगाना चाहेंगे.
15 अगस्त, 2008 को प्रचंड जब पहली बार नेपाल के प्रधानमंत्री चुने गये, तो सबसे पहले चीन की यात्रा पर गये थे. मगर अब मौके की नजाकत समझ कर प्रचंड धरती पर उतर आये हैं. उसकी वजह नेपाल में आनेवाले तीन बड़े चुनाव हैं. पहले राउंड में पंचायत चुनाव होना है.
2017 के मध्य तक वार्डों के स्थानीय निकाय चुनाव होने हैं. और 21 जनवरी, 2018 से पहले संसदीय चुनाव करा लेना है. नेपाल की सत्ता पर चाहे पहाड़ी अभिजात्य की पकड़ हो, पर उसका रास्ता तराई से होकर जाता है, यही आज के नेपाल की जमीनी हकीकत है. पिछले साल भर में जिस तरह से तराई में राजनीतिक चेतना का संचार हुआ है, उससे एक बात तो वहां के सत्ताधारी अभिजात्य भी समझने लगे हैं कि सियासी बिसात को बदलने के वास्ते किसी न किसी रूप में भारतीय सहयोग चाहिए ही.
ऐसा नहीं कि इस समय सिर्फ प्रधानमंत्री प्रचंड को भारत की जरूरत है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी चाहेंगे कि नेपाल की मधेस समस्या और नाकेबंदी को लेकर भारत की जो विध्वंसक छवि नेपाल में बनायी गयी है, उसे बदलने का प्रयास हो. इस हिमालय देश में अगस्त 2014 जैसा माहौल बने, जब ‘हर-हर मोदी’ के नारे लगे थे. उसका रास्ता भूकंप और बाढ़ से तबाह नेपाल के पुनर्निर्माण से खुलता है. नेपाली शासनाध्यक्ष प्रचंड का साथ सार्क में भी चाहिए, जहां पाकिस्तान अपनी फितनागिरी पर आमादा है!
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By Prabhat Khabar Digital Desk
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