गुरदयाल सिंह का जाना

Updated at : 18 Aug 2016 6:19 AM (IST)
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गुरदयाल सिंह का जाना

कुछ समाचार इतने उदास करते हैं कि लगता है काश हम इन्हें झुठला पाते. पंजाबी के प्रसिद्ध साहित्यकार गुरदयाल सिंह के निधन का समाचार भी ऐसा ही है. गुरदयाल सिंह की काया अब हमारे बीच नहीं है, लेकिन उनके रचे शब्द-संसार में काल से होड़ लेने की ताकत है. जिस पंजाबी जनजीवन की कथा उन्होंने […]

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कुछ समाचार इतने उदास करते हैं कि लगता है काश हम इन्हें झुठला पाते. पंजाबी के प्रसिद्ध साहित्यकार गुरदयाल सिंह के निधन का समाचार भी ऐसा ही है. गुरदयाल सिंह की काया अब हमारे बीच नहीं है, लेकिन उनके रचे शब्द-संसार में काल से होड़ लेने की ताकत है.
जिस पंजाबी जनजीवन की कथा उन्होंने गढ़ी, वह मानस सदियों से मानता आया है कि मरे राजा और जीये कवि! हाड़-मांस के पुतले तो सभी हैं और कालक्रम में मृत्यु सभी को व्यापती है, तो फिर राजा के मरने और कवि के जीवित रह जाने की बात क्यों कही गयी! इस सवाल को सुलझाने में संस्कृत की यह उक्ति मदद कर सकती है- ‘स्वदेशे पूज्यते राजा- विद्वान सर्वत्र पूज्यते’! किसी राजा की न्यायप्रियता या शौर्य को आधार मान कर गढ़ी गयी कहानियों के बूते वह अपने राज में पूजा जा सकता है. हो सकता है कि ये कहानियां दूर देशों में भी फैले और वहां के लोगों में भी उसके प्रति श्रद्धा-भाव जगे. तो भी यश और प्रताप की कहानियों का एकदिन क्षय तय है, क्योंकि इनके नायक मिट्टी से जुड़े लोग नहीं होते.
अपनी मिट्टी, अपने लोग और अपनेपन के ताने-बाने के बीच पसरे उनके सुख-दुख, भय-साहस, हार-जीत, प्रेम और घृणा के अनुभवों को कहानी और नीतिबोध बनाने का काम तो शब्द साधना करनेवाले रचनाकार ही करते आये हैं. जनजीवन उनकी रचनाओं में अपने इतिहास के अक्स, वर्तमान की झलक और भविष्य की आहटें पढ़ता-सुनता है और इसी कारण ऐसी रचनाओं और उनके रचनाकार को दिल में बसा लेता है.
गुरदयाल ऐसे ही साहित्यकार हैं. एक दलित और उसके प्रेम को नायकत्व बख्शनेवाला उनका पहला उपन्यास ‘मढ़ी दा दीवा’ हो या एक पिता की तीन संतानों के तीन राह पर जाने और इसी बहाने आजाद हिंदुस्तान की मनोभूमि की टोह लेनेवाली कृति ‘परसा’, सब में पंजाबी जनजीवन की ऐसी सच्चाइयां दर्ज हैं, जो अमूमन समाज-विज्ञान के औजारों से पकड़ में नहीं आ पातीं. इसी कारण गुरदयाल सिंह का साहित्य अपने युग के नीतिबोध को राह दिखानेवाली एक मशाल की तरह है.
ज्ञानपीठ हो या पद्म-अलंकरण, या किसी रचना पर फिल्म बनना और देश-देशांतर में सराहा जाना, यह सब निश्चित ही महत्व का सूचक है, लेकिन भविष्य उन्हें पंजाबी जनजीवन के मर्म को उद्घाटित करनेवाले शब्द-साधक के रूप में ही याद करेगा. प्रसिद्धि के बावजूद सादगी की प्रतिमूर्ति बने रहे गुरदयाल सिंह को विनम्र श्रद्धांजलि.
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