डायन प्रथा की जड़

अमूमन हर रोज अखबारों में हमें डायन-बिसाही के समाचार पढ़ने को मिलते हैं. ग्रामीण क्षेत्रों में गरीब और कमजोर बेसहारा महिलाओं को डायन बता कर हत्या कर दी जाती है. ऐसी घटनाएं बहुतायत होती हैं. यदि देहातों में किसी का भी स्वास्थ्य किसी भी कारण से लगातार गिर रहा है तो लोग ओझा-गुणी की शरण […]
अमूमन हर रोज अखबारों में हमें डायन-बिसाही के समाचार पढ़ने को मिलते हैं. ग्रामीण क्षेत्रों में गरीब और कमजोर बेसहारा महिलाओं को डायन बता कर हत्या कर दी जाती है. ऐसी घटनाएं बहुतायत होती हैं. यदि देहातों में किसी का भी स्वास्थ्य किसी भी कारण से लगातार गिर रहा है तो लोग ओझा-गुणी की शरण में चले जाते हैं. ये लोग किसी भी बीमारी को डायन-बिसाही से जोड़ते हैं और लोगों को गुमराह करते हैं कि फलां महिला के कारण बीमारी ठीक नहीं हो रही है.
अशिक्षित और अंधविश्वासी लोग वैसी कमजोर महिलाओं को डायन समझकर प्रताड़ित करने लगते हैं. यहां तक कि उनकी हत्या तक कर दी जाती है. दरअसल ऐसी घटनाओं का मुख्य कारण गरीबी, अशिक्षा, ग्रामीण क्षेत्रों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव, सामाजिक कुरीतियां एवं गुणी-ओझाओं पर विश्वास है. इन सब समस्याओं से निजात पाने के लिए लोगों को जागरूक करने की आवश्यकता है.
समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने का प्रयास समाज के लोगों को ही करना पड़ेगा. गरीबी-बेरोजगारी को दूर करना, शिक्षा का प्रचार-प्रसार और स्वास्थ्य सुविधाओं को मुहैया कराना सरकार पर निर्भर है. लोगों का सहयोग भी जरूरी है, जिसके बिना इस का हल मुश्किल है.
वशिष्ठ कुमार हेम्ब्रम, रांची
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