सेना में शारीरिक मानदंड

Updated at : 08 Aug 2016 6:32 AM (IST)
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सेना में शारीरिक मानदंड

संदीप सिंह सामाजिक कार्यकर्ता कभी आपने सोचा है कि हमारी सेनाएं लंबे कद की क्यों हैं? केंद्र सरकार ने बस्तरिया बटालियन नाम की एक नयी सशस्त्र सेना बनाने को मंजूरी दी है. इसमें आदिवासियों को सेना में भर्ती के शारीरिक मापदंडों (लंबाई, चौड़ाई, वजन) में छूट दी गयी है. क्यों? देश की रक्षा सेनाओं में […]

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संदीप सिंह

सामाजिक कार्यकर्ता

कभी आपने सोचा है कि हमारी सेनाएं लंबे कद की क्यों हैं? केंद्र सरकार ने बस्तरिया बटालियन नाम की एक नयी सशस्त्र सेना बनाने को मंजूरी दी है. इसमें आदिवासियों को सेना में भर्ती के शारीरिक मापदंडों (लंबाई, चौड़ाई, वजन) में छूट दी गयी है. क्यों? देश की रक्षा सेनाओं में आदिवासियों/ दलितों का प्रतिनिधित्व लगभग नगण्य है (महिलाओं का प्रतिनिधित्व भी). सेना में आरक्षण के प्रश्न पर रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने 7 मई, 2015 को कहा था कि सेना में आरक्षण का कोई प्रश्न विचाराधीन नहीं है. सेना में भर्ती मेरिट के आधार पर होती है. सेना के दरवाजे किसी वर्ग, जाति, समुदाय, क्षेत्र व धर्म की परवाह किये बिना सारे नागरिकों के लिए खुला है.

अगर सेना में जाने का रास्ता सबके लिए खुला है, तो वंचित एवं गरीब तबकों का इसमें पर्याप्त प्रतिनिधित्व क्यों नहीं है? व्यावहारिक रूप से इन तबकों के नौजवानों को भरपूर मात्रा में सेनाओं में जाना चाहिए. यह जीविका का अच्छा साधन है. सेना में उच्च स्तर की शैक्षणिक योग्यता की नहीं, बल्कि शारीरिक योग्यता की मांग होती है. लेकिन, सेनाओं में शारीरिक योग्यता का पैमाना वह लक्ष्मण-रेखा है, जिसे देश के अधिकतर दलित-आदिवासी पार नहीं कर पाते!

नेशनल न्युट्रिशन इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के मुताबिक, शहरी भारत के नागरिकों की औसत लंबाई 165.2 सेमी और ग्रामीण भारत के नागरिकों की औसत लंबाई 161.2 सेमी है. थल सेना में भर्ती के लिए न्यूनतम लंबाई 167 सेमी है, तो सीआरपीएफ में 170 सेमी है. दिल्ली पुलिस के अभ्यर्थी की लंबाई 170 सेमी होनी चाहिए.

इंटरनेशनल जर्नल ऑफ सोशियोलॉजी एंड एंथ्रोपोलॉजी की अप्रैल 2012 की रिपोर्ट के मुताबिक, बस्तर जिले के ‘गदबा’ आदिवासी समुदाय के एक 20 साल के नौजवान की औसत लंबाई 154.26 सेमी है. दि यूनाइटेड नेशन यूनिवर्सिटी के फूड एंड न्युट्रिशन जर्नल के एक अध्ययन के मुताबिक, एक छत्तीसगढ़ी की औसत लंबाई 163.7 सेमी है, झारखंडी की औसत लंबाई 162.5 सेमी है.

आम नागरिकों से बड़ी कद-काठी की फौज और पुलिस का लोकतंत्र से क्या रिश्ता है? आपके सिर के ऊपर से देख सकनेवाला सिपाही/दरोगा, जिसकी आंख-से-आंख मिलाने के लिए आपको गरदन ऊंची करनी पड़े, आपके मन में कौन-कौन से भाव उत्पन्न करता है? वर्दी के अलावा सिपाही का वह कौन-सा गुण है, जो सामनेवाले पर रौब जमाता है? जाहिर है उसका शारीरिक डील-डौल.

कनाडा के पुरुषों की औसत लंबाई 176 सेमी और महिलाओं की औसत लंबाई 163.6 सेमी है, लेकिन कनाडा की सेना न्यूनतम लंबाई की कोई शर्त ही नहीं रखती. इंगलैंड के पुरुषों की औसत लंबाई 177 सेमी है, पर रॉयल ब्रिटिश आर्मी सिर्फ 148 सेमी की न्यूनतम लंबाई की मांग रखती है. औरतों के लिए यह और भी कम है. कमोबेश ऐसा अमेरिका, स्वीडन, जर्मनी, आयरलैंड इत्यादि देशों में भी है.

जब दो-तिहाई से ज्यादा दलित-आदिवासी शारीरिक योग्यता के आधार पर ही सेनाओं के अयोग्य हैं, तो इन सेनाओं और सशस्त्र-बलों में जाता कौन है? दरअसल, अंगरेजों ने भारी-भरकम डील-डौलवाले लोगों की एक ऐसी सेना बनायी थी, जो अपनी उपस्थिति से ही आतंक पैदा करे. कमोबेश सेना का वही मॉडल अब भी चला आ रहा है! अच्छे पोषण की मनुष्य के शारीरिक-मानसिक विकास में केंद्रीय भूमिका है.

वंचित समुदायों की बड़ी आबादी भूख सूचकांक के निचले पायदानों पर रहती है. जाहिर है कुपोषित बचपन सेना के लिए ‘अनफिट’ जवान ही पैदा करेगा! जिन समुदायों का औसत बॉडी मॉस ही पूरे देश से कम हो, वह सेना की शारीरिक योग्यताओं को कैसे पूरा करेंगे?

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