...मोहे गैया ही कीजो

डॉ सुरेश कांत वरिष्ठ व्यंग्यकार मैं उस काले हिरन की मृतात्मा हूं, जिसके बारे में अदालत ने फैसला दे दिया है कि उसे बॉलीवुड के सुलतान ने नहीं मारा. मनुष्यों को यह सुन कर आश्चर्य हो सकता है, क्योंकि उनकी समझ में तो केवल उन्हीं के पास आत्मा होती है, पशुओं के तो आत्मा होती […]
डॉ सुरेश कांत
वरिष्ठ व्यंग्यकार
मैं उस काले हिरन की मृतात्मा हूं, जिसके बारे में अदालत ने फैसला दे दिया है कि उसे बॉलीवुड के सुलतान ने नहीं मारा. मनुष्यों को यह सुन कर आश्चर्य हो सकता है, क्योंकि उनकी समझ में तो केवल उन्हीं के पास आत्मा होती है, पशुओं के तो आत्मा होती ही नहीं. अगर वे ऐसा न मानते, तो पशुओं को मार कर खाने से पहले थोड़ा सोचते. खा फिर भी लेते, क्योंकि आम तौर पर वे खाने के लिए ही जीते पाये जाते हैं.
कभी-कभी तो लगता है कि आदमी पृथ्वी पर जन्म ही खाने के लिए लेता है. पशु भी खाते हैं, पर वे भूख लगने पर ही खाते हैं. पेट भरा होने पर जीवों और वनस्पतियों को उनसे कोई खतरा नहीं होता. लेकिन आदमी के खाने का भूख होने या न होने से कोई ताल्लुक नहीं दिखता. वह कभी भी खा सकता है और कुछ भी खा सकता है. ‘दाल-रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओ’ जैसी तजवीजें तो खैर उसके लिए की ही गयी हैं, पर वह उसके अलावा भी वह बहुत-कुछ खा जाता है. पैसा, मकान, बिल्डिंग, सड़क, जमीन, यहां तक कि देश तक को खा जाता है. फिर पशुओं के चारे और खुद पशुओं की क्या औकात है भला? बल्कि, चारा खाने के बाद तो उसका और भी अधिकार बन जाता है पशुओं को भी खाने का.
ठीक वैसे ही, जैसे सरकारी पदों पर कर्मचारियों-अधिकारियों का ‘लियन’ यानी पुनर्ग्रहणाधिकार होता है. सरकारी कर्मचारी-अधिकारी जब अपने मूल पद को छोड़ कर कोई दूसरा पद ग्रहण करने जाता है, तो इस अधिकार के अंतर्गत पुराने पद पर वापस लौटने, उसे पुन: ग्रहण करने का अधिकार रखते हुए जा सकता है.
दूसरे शब्दों में, पहले पद को काफी हद तक ग्रहण लगा चुकने के बाद वह इस अधिकार के साथ दूसरे पद को ग्रहण लगाने जाता है कि अगर वहां ग्रहण लगाने में मजा नहीं आया, तो अपने पुराने पद पर वापस लौट कर उसे ही ग्रहण लगाना जारी रख सके. और भी सरल शब्दों में कहें, तो अगर वहां खाने में मजा नहीं आया या ज्यादा खाने को नहीं मिला, तो वापस लौट कर पुराने पद पर ही खाने का कार्यक्रम जारी रख सके. सूर्य अथवा चंद्रग्रहण की तरह ही इसे कर्मचारीग्रहण के नाम से भी पुकारा जा अवश्य सकता है.
लेकिन मृतात्मा?
आत्मा भी कभी मरती है भला? मुझे पता था कि ऐसा सवाल पूछा जा सकता है. ‘न जायते मृयते वा कदाचिन्नायं’ जैसी प्रचलित धारणाओं के कारण इस तरह का सवाल उठाना लाजमी था. लेकिन, मैं पूछता हूं कि मनुष्यों में आत्मा बची है क्या? बची होती, तो मनुष्यों द्वारा पशुओं पर तो छोड़िए, खुद मनुष्यों पर ही इतना अत्याचार संभव था?
ये सब मनुष्यों की आत्मा मर जाने के ही लक्षण नहीं तो क्या हैं? तो फिर हिरन की भी मृतात्मा क्यों नहीं हो सकती?
तो यह हिरन की मृतात्मा यह तो जान गयी कि किसने उसे नहीं मारा, लेकिन यह नहीं जान पायी कि उसे मारा किसने? किसी ने तो मारा होगा उसे? या इस निष्कर्ष पर पहुंचना ही काफी है कि व्यक्ति-विशेष ने उसे नहीं मारा. जो मरा, न्याय का क्या उससे कोई लेना-देना नहीं है?
मृतात्मा क्या भाड़ में जाये? और क्या हिरन की जगह अगर गाय होती, तो भी सबका यही रवैया रहता? अब तक देशभर में बवाल न मच गया होता? अदालत का फैसला आने से पहले ही लोगों ने दूसरे कुछ लोगों का उसका ‘फैसला’ न कर दिया होता?
तो फिर जिस तरह देश की बेटियां और दलित ईश्वर से दुआ मांगते हैं कि ‘अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो’ या ‘अगले जनम मोहे एससी न कीजो’, हिरन की यह मृतात्मा भी क्यों न यह कामना करने पर बाध्य हो कि ‘अगले बरस मोहे गैया ही कीजो!’
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