रिजर्व बैंक की स्वायत्तता

Updated at : 12 Jul 2016 6:18 AM (IST)
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रिजर्व बैंक की स्वायत्तता

डॉ भरत झुनझुनवाला अर्थशास्त्री रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने दूसरे कार्यकाल के लिए मना कर दिया है. रिजर्व बैंक द्वारा देश की मुद्रा नीति को संचालित किया जाता है. राजन ने मुद्रा नीति का स्वतंत्र संचालन किया था और सरकार के दबाव को दरकिनार किया था. सरकार चाहती है कि मुद्रा नीति पर […]

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डॉ भरत झुनझुनवाला
अर्थशास्त्री
रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने दूसरे कार्यकाल के लिए मना कर दिया है. रिजर्व बैंक द्वारा देश की मुद्रा नीति को संचालित किया जाता है. राजन ने मुद्रा नीति का स्वतंत्र संचालन किया था और सरकार के दबाव को दरकिनार किया था. सरकार चाहती है कि मुद्रा नीति पर उसका नियंत्रण रहे. सरकार ही निर्णय करे कि रिजर्व बैंक द्वारा कितने नोट छापे जायेंगे.
इस दिशा में पहल की जा चुकी है. पिछले बजट में व्यवस्था बनायी गयी है कि मुद्रा नीति के निर्धारण के लिए एक कमेटी बनेगी, जिसमें तीन सदस्यों को केंद्र सरकार नामित करेगी. सरकारी दखल के इस विस्तार को मुद्रा एवं टैक्स पॉलिसी के परिप्रेक्ष्य में देखना होगा.
मुद्रा नीति के अंतर्गत निर्णय लिया जाता है कि रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दर कितनी रखी जायेगी तथा कितनी मात्रा में नोट छापे जायेंगे. टैक्स पॉलिसी के अंतर्गत निर्णय लिया जाता है कि किस माल पर कितना टैक्स वसूला जायेगा और सरकारी राजस्व का उपयोग किस दिशा में किया जायेगा. अब तक की व्यवस्था में मुद्रा नीति पर रिजर्व बैंक का एकाधिकार रहता था और टैक्स पॉलिसी पर वित्त मंत्रालय का.
मुद्रा नीति के अंतर्गत रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दर में कटौती की जा सकती है. इससे उद्योगों द्वारा ऋण लेकर फैक्टरियां लगाना आसान हो जायेंगे. ऋण की बढ़ी मांग की पूर्ति के लिए रिजर्व बैंक द्वारा अधिक नोट छापे जायेंगे, जिससे महंगाई बढ़ेगी. मान लीजिए अर्थव्यवस्था में 100 रुपये के नोट प्रचलन में हैं.
रिजर्व बैंक ने 10 रुपये के अतिरिक्त नोट छाप दिये. अर्थव्यवस्था में स्टील, सीमेंट, गेहूं आदि माल पूर्ववत उपलब्ध है. पूर्व में उपलब्ध माल को खरीदने को 100 रुपये के नोट थे, अब 110 रुपये के. इससे महंगाई बढ़ी, तो सभी नागरिकों को महंगा स्टील तथा गेहूं खरीदना पड़ा. अंतिम परिणाम रहा कि फैक्टरियों में निवेश बढ़ा, लेकिन नागरिकों की खपत घटी. हालांकि निवेश पहले बढ़ा, खपत बाद में घटी.
टैक्स पॉलिसी का प्रभाव भी ऐसा ही है. मान लीजिए कि सरकार ने स्टील पर अतिरिक्त एक्साइज ड्यूटी लगा दी. इससे बाजार में स्टील महंगा हो गया. नागरिकों को महंगा स्टील खरीदना पड़ा. उन्होंने मकान में अतिरिक्त कमरा बनाने का कार्यक्रम स्थगित कर दिया. नागरिक की खपत में कटौती हुई. वसूले गये टैक्स से सरकार ने उद्यमियों को सब्सिडी दी.
इससे उद्योग लगाना सुलभ हो गया. निवेश बढ़ा. लेकिन अंतिम परिणाम पूर्ववत रहा. हालांकि नागरिकों की खपत पहले कम हुई और निवेश बाद में बढ़ा. मुद्रा नीति की एक और विशेषता है. नोट छापने से बढ़ी महंगाई का प्रभाव संपूर्ण जनता पर, लेकिन हल्का पड़ता है. दूसरी ओर टैक्स पॉलिसी का दुष्प्रभाव नागरिकों के विशेष वर्ग पर एवं तीखा पड़ता है. जैसे स्टील महंगा हो गया तो मकान बनानेवाले को अधिक मूल्य चुकाना होगा, लेकिन झुग्गी में रहनेवाले पर प्रभाव नहीं पड़ेगा.
जाहिर है, मुद्रा नीति और टैक्स नीति, दोनों के माध्यम से देश की आय के खपत एवं निवेश में बंटवारे को बदला जा सकता है. लेकिन, दोनों के अलग-अलग निर्धारण से संभव है कि दोनों में अंतर्विरोध पैदा हो जाये.
जैसे सरकार द्वारा निवेश बढ़ाने के लिए स्टील पर टैक्स बढ़ाया गया और उद्योगों को सब्सिडी दी गयी. लेकिन उसी समय रिजर्व बैंक ने ब्याज दरें बढ़ा दी, तो उद्योगों के लिए ऋण लेना कठिन हो गया. सरकारी सब्सिडी से उद्योगों को जो प्रोत्साहन मिला, वह ब्याज दर में वृद्धि से निष्प्रभावी हो गया. वित्त मंत्रालय चाहता है कि ऐसे अंतर्विरोध पैदा न हों, इसलिए मुद्रा नीति को भी अपने अधिकार में लाना चाहता है.
लेकिन, मुद्रा एवं टैक्स नीति के समन्वय में खतरा भी है. मान लीजिए चुनाव नजदीक देख सरकार द्वारा टैक्स दर में कटौती की गयी, जिससे नागरिक को राहत मिले और वह सत्तारूढ़ पार्टी को वोट दे. इससे सरकार के राजस्व में गिरावट आयी. सरकार को वोट मिले, परंतु अर्थव्यवस्था चैपट हो गयी. ऐसे समय में रिजर्व बैंक की स्वायत्तता से हमें सरकार की इस गलत नीति से छुटकारा मिल सकता है. रिजर्व बैंक ब्याज दर में कटौती कर दे, तो सरकार की गलत नीति निष्प्रभावी हो जायेगी.
जाहिर है, रिजर्व बैंक की स्वायत्तता के लाभ और हानि दोनों हैं. वित्त मंत्रालय सही दिशा में चल रहा हो, तो रिजर्व बैंक की स्वायत्तता नुकसानदेह हो सकती है. वित्त मंत्रालय गलत दिशा में चल रहा हो, तो वही स्वायत्तता लाभप्रद हो सकती है. लेकिन, वित्त मंत्रालय तथा रिजर्व बैंक के बीच तनातनी में मूल विषय पीछे छूट जाता है.
अर्थव्यवस्था का संचालन इस प्रकार होना चाहिए कि निवेश भी बढ़े और नागरिकों को माल भी सस्ता मिले. यह दोनों उद्देश्य साथ-साथ हासिल हो सकते हैं, यदि सरकार की खपत में कटौती करके उद्योगों को सब्सिडी दी जाये. यानी मूल पालिसी सही होगी, तो रिजर्व बैंक की स्वतंत्रता का लाभ ही होगा.
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