लोकगीतों की गोद में

Updated at : 12 Jul 2016 6:16 AM (IST)
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लोकगीतों की गोद में

गिरींद्र नाथ झा ब्लॉगर एवं किसान गांव-घर और खेती किसानी करते हुए कुछ चीजों से लगाव बढ़ा है, उसमें एक लोकगीत भी है. गांव का सबसे मशहूर भैंसवार हरदेव मुझसे अक्सर कहता है कि वह लोकगीतों की गोद में पला है और हर मौसम के गीत सुन कर ही वह बड़ा हुआ है. हरदेव की […]

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गिरींद्र नाथ झा

ब्लॉगर एवं किसान

गांव-घर और खेती किसानी करते हुए कुछ चीजों से लगाव बढ़ा है, उसमें एक लोकगीत भी है. गांव का सबसे मशहूर भैंसवार हरदेव मुझसे अक्सर कहता है कि वह लोकगीतों की गोद में पला है और हर मौसम के गीत सुन कर ही वह बड़ा हुआ है.

हरदेव की बात ध्यान से सुनते हुए लगता है कि हम नयी पीढ़ी के लोग, जो गांव आये हुए हैं, उनके हिस्से कितना कुछ छूट गया है. मोबाइल की वजह से बहुत कुछ बदला है, इसने ग्रामीण विकास की इबारत लिखी है, लेकिन इसके संग ही यह भी कटु सत्य है कि मोबाइल ने लोकगीतों का गला घोंट कर रख दिया है.

हाल ही में धनरोपनी करवा रहा था. पिछले साल तो रोपनी गीत किसी किसी के मुख से सुनने को मिल गया था, लेकिन इस बार वह भी नहीं सुनने को मिला. इसके बदले रोपनी में लगे लोगों की जेब में रखे मोबाइल फोन बीच-बीच में हिंदी-भोजपुरी गीत सुना रहे थे. ऐसे में हम ग्राम्य जीवन की आंचलिकता को कैसे सहेज कर रखेंगे, यह बड़ा सवाल है. कभी धनरोपनी से पहले हल की पूजा होती थी और उसके संग धान के बीज को पूजा जाता था. इस अवसर पर गीत गाये जाते थे. इसके बाद बैल की पूजा होती थी. शायद इन्हीं चीजों से गांव आपस में बंधा रहता था.

फणीश्वर नाथ रेणु कहते थे कि हर मौसम में उनके मन के कोने में उस ऋतु के लोकगीत गूंजते रहते हैं. तमाम व्यस्तताओं के बीच वे जहां भी रहते थे, लोकगीतों की स्मृति ध्वनियां उन्हें गांव में कुछ क्षण के लिए जरूर पहुंचा देती थी. लेकिन, आज के समय में मेरे जैसे किसानी कर रहे लोगों, जो लोकगीतों के माध्यम से गाम-घर और खेत-खलिहान की दुनिया को समझना चाहते हैं, को काफी समस्या आ रही है. अब तो डाकवचन की जानकारी रखनेवाले लोग भी मुश्किल से मिलते हैं.

बचपन की स्मृति खंगालता हूं तो अगहन शुरू होते ही पके हुए धान खेतों की अगहनी सुगंध में पकते लोकगीत याद आते हैं. खेत के आल पर महिला-पुरुष मिल कर गीत गाते थे, एक परंपरा थी.

अब यह सब सुनने के लिए मन मचलता है. हरदेव कहता है कि वह जब पंजाब में मजदूरी करता था, तब एक बार उसे अलाव तापते हुए खलिहान में दवनी को आये हुए लोगों से बातें करनी की बड़ी इच्छा हुई, फिर ढलती हुई लंबी रात, भुरुकुवा (शुक्र) तारा उगते ही उसकी नींद उचट गयी और उसी सुबह उसने गाम लौटने का फैसला कर लिया. लेकिन, हर कोई ऐसा कर भी नहीं सकता है. अन्न के लिए हमें संघर्ष करना पड़ता है.

यह सब लिखते हुए मेरे मन में ‘प्रातकी’ गीत की पहली कड़ी मंडरा रही है. पवित्र धुन ‘प्रातकी’, जिसे अगहन से माघ तक भुरुकुवा तारा उगने के बाद गाते हैं. गांव का भोला ऋषि प्रातकी गाने में आगे था. भोर को गाये जानेवाले गीतों में ‘प्रातकी’ के बाद ‘बिकय’ का सबसे अधिक महत्व है. हमारे इलाके में श्रावणी पूर्णिमा से आरंभ करके कृष्णाष्टमी की सुबह में करताल बजा कर ‘बिकय’ गीत गाया जाता है. रेणु ने इस गीत के बारे में बड़ी बारीकी से लिखा है.

रेणु रचनावली के अनुसार- ‘काली घटाओं में लुका छिपा चांद भादो के भरे हुए पोखर तलाब में तैरता हुआ दिखाई पड़ता है और फिर तुरंत ही झड़ी लग जाती है. ऐसे क्षणों में बिकय गानेवालों का मूलगैन अलाप उठता है.’

गांव का जीवन महसूस करते हुए मुझे हर वक्त लोकगीतों में डुबकी लगाने का मन करता है. यह जानते हुए भी कि यह संभव नहीं है, हरदेव और भोला जैसे पात्रों को तलाशता रहता हूं, इस आशा के साथ कि कहीं कोई मिल जाये, जो मुझे लोकगीतों के पालने में झूलने का मौका दे.

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