शिक्षा पर विमर्श क्यों नहीं?

Updated at : 11 Jul 2016 12:55 AM (IST)
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शिक्षा पर विमर्श क्यों नहीं?

पिछले दिनों केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल के बाद स्मृति ईरानी का मानव संसाधन विकास मंत्रालय से कपड़ा मंत्रालय में तबादले की खबर दूसरे कारणों से चर्चा का विषय बनी. इस फेरबदल के कुछ समय पहले ही सरकार ने नयी शिक्षा नीति के मसौदे के कुछ बिंदुओं को सार्वजनिक रूप से प्रकाशित किया था. यह तीसरा […]

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पिछले दिनों केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल के बाद स्मृति ईरानी का मानव संसाधन विकास मंत्रालय से कपड़ा मंत्रालय में तबादले की खबर दूसरे कारणों से चर्चा का विषय बनी. इस फेरबदल के कुछ समय पहले ही सरकार ने नयी शिक्षा नीति के मसौदे के कुछ बिंदुओं को सार्वजनिक रूप से प्रकाशित किया था. यह तीसरा मौका है, जब प्राइमरी से लेकर विश्वविद्यालयी शिक्षा के बारे में राष्ट्रीय स्तर पर विमर्श का अवसर आया है. पर क्या कहीं विमर्श हो रहा है?
इसके पहले साल 1968 और उसके बाद 1986 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति में बदलाव हुआ था. 1986 की नीति में 1992 में कुछ बदलाव किया गया था. इसके बाद सर्वशिक्षा अभियान चला और फिर शिक्षा का अधिकार आया. देश में ज्ञान आयोग बना, पर शिक्षा के तमाम पहलू विमर्श से बाहर रहे. इस वक्त भी नहीं लगता कि हम शिक्षा पर व्यापक बातचीत के लिए तैयार हैं. यह बात इसके आगाज के साथ ही साफ हो गयी है.
‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2016 के मसौदे के लिए कुछ इनपुट’ शीर्षक से मंत्रालय ने प्रतिक्रियाएं मांगी हैं. यह दस्तावेज पूर्व कैबिनेट सचिव टीएसआर सुब्रह्मण्यम की अध्यक्षता में गठित पांच सदस्यीय समिति की रिपोर्ट पर आधारित है. सरकार ने पूरी रिपोर्ट को जारी नहीं किया, बल्कि उसके आधार पर तैयार एक दस्तावेज को जारी किया है. उधर उस रिपोर्ट के कुछ अंश भी मीडिया में लीक हो गये हैं. पूरी रिपोर्ट सामने न आने से उन सभी मामलों पर चर्चा नहीं हो पायेगी, जो शिक्षा से जुड़े हुए हैं. मसलन, छात्र संघों के राजनीतिकरण को रोकने के लिए समिति की सिफारिशों का जिक्र इस दस्तावेज में नहीं है. इससे यह भी समझ में नहीं आता कि शिक्षा की सामाजिक भेद करनेवाली भूमिका पर कैसे रोक लगेगी.
इस दस्तावेज में छात्रों को फेल न करने की नीति पांचवीं कक्षा तक सीमित करने, ज्ञान के नये क्षेत्रों की पहचान के लिए एक शिक्षा आयोग का गठन करने, शिक्षा के क्षेत्र में जीडीपी का कम-से-कम छह फीसदी निवेश का सुझाव है. सुब्रह्मण्यम समिति का कहना है कि छात्रों की परीक्षा तो होनी चाहिए, पर परीक्षा से जुड़ा तनाव नहीं होना चाहिए. इसका कोई व्यावहारिक मॉडल भी देना होगा. आला दर्जे के विदेशी विश्वविद्यालयों के भारत में प्रवेश को बढ़ावा देने का सुझाव है. यह भी कि भारतीय संस्थाएं भी विदेशों में अपने कैंपस खोलें. दस्तावेज में आर्थिक रूप से कमजोर तबकों के बच्चों के लिए, अल्पसंख्यक संस्थाओं में प्रवेश की सुविधा का सुझाव दिया गया है.
यह भी कहा गया है कि सभी राज्य और केंद्रशासित प्रदेश यदि चाहें, तो स्कूलों में पांचवीं कक्षा तक मातृभाषा, स्थानीय या क्षेत्रीय भाषा का इस्तेमाल माध्यम के रूप में किया जाये. यह भी कि यदि प्राथमिक स्तर तक निर्देश का माध्यम मातृभाषा या स्थानीय या क्षेत्रीय भाषा हो और दूसरी भाषा अंगरेजी हो, तो उच्च प्राथमिक एवं माध्यमिक स्तरों पर तीसरी भाषा चुनने का अधिकार राज्यों और स्थानीय अधिकारियों के पास रहे. यह सुझाव भी है कि विज्ञान, गणित और अंगरेजी विषयों के लिए साझा राष्ट्रीय पाठ्यक्रम तैयार किये जायें. सामाजिक विज्ञानों, पाठ्यक्रम का एक हिस्सा पूरे देश में एक जैसा रहेगा और बाकी हिस्सा राज्य तय करें.
10वीं में गणित और विज्ञान की परीक्षा दो स्तर पर हो- लोअर और हायर. जो छात्र 11वीं में ये विषय नहीं लेना चाहते, उनकी लोअर लेवल की परीक्षा हो. 12वीं के बाद छात्रों का राष्ट्रीय स्तर पर टेस्ट हो, इसके जरिये ही कॉलेजों में एडमिशन हो. सिलेबस का भार घटा कर सेल्फ लर्निंग पर जोर हो. कोचिंग पर लगाम लगे, क्योंकि यह अमीर-गरीब बच्चों के बीच का अंतर बढ़ाती है. स्कूल ही रेमीडियल कोचिंग का इंतजाम करे.
इस प्रकार की सिफारिशों की लंबी सूची है. इन पर अलग-अलग स्तर पर बात होनी चाहिए. शिक्षा के सवाल केवल छात्रों, शिक्षकों या नीति-निर्माताओं तक सीमित नहीं हैं. उसका बाजार, उद्योग और अर्थव्यवस्था से भी नाता है. हम इस बात पर ध्यान नहीं दे पा रहे हैं कि यह शिक्षा किस तरह मुहैया करायी जायेगी. साल 1994 के बाद से हमने जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम शुरू किया है. इसके अंतर्गत कम लागत की शिक्षा पर जोर है. इसके लिए ठेके पर अध्यापक रखने और पैरा टीचर्स की भरती का चलन शुरू हुआ है. इससे शिक्षा का स्तर गिरा है. गांव के स्कूलों का इस्तेमाल राजनीतिक कार्यों के लिए होता है, इस पर रोक का कोई तरीका नहीं सुझाया गया है.
शिक्षा में एक साथ दो प्रवृत्तियां देखने को मिल रहीं हैं. एक तरफ शानदार नंबर लानेवाले छात्रों की संख्या बढ़ रही है, दूसरी ओर पढ़ाई का स्तर गिर रहा है. परीक्षाओं में 100 फीसद नंबर लानेवालों की संख्या बढ़ती जा रही है. यह भ्रम 2012 के पीसा टेस्ट में टूट गया. विकसित देशों की संस्था ओइसीडी हर साल प्रोग्राम फॉर इंटरनेशनल स्टूडेंट असेसमेंट (पीसा) के नाम से एक परीक्षण करती है. दो घंटे की इस परीक्षा में दुनियाभर के देशों के तकरीबन पांच लाख बच्चे शामिल होते हैं. 2012 में भारत और चीन के शंघाई प्रांत के बच्चे इस परीक्षा में पहली बार शामिल हुए. चीनी बच्चे पढ़ाई, गणित और विज्ञान तीनों परीक्षणों में नंबर एक पर रहे और भारत के बच्चे 72वें स्थान पर रहे, जबकि कुल 73 देश ही उसमें शामिल हुए थे.
शिक्षा-केंद्रित भारतीय एनजीओ ‘प्रथम’ की सालाना रिपोर्ट ‘असर’ से पता लगता है कि शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीइ) लागू होने के बाद स्कूलों की संख्या और उनमें दाखिले में वृद्धि हुई है, पर पढ़ाई-लिखाई की गुणवत्ता गिरी है. सर्वे के अनुसार सरकारी स्कूलों पर आम जनता का विश्वास घट रहा है. आरटीइ का सकारात्मक असर है कि 6-14 वर्ष उम्र वर्ग के बच्चों के स्कूल में दाखिले में भारी इजाफा हुआ है, पर बच्चे स्कूलों में साधारण कौशल भी नहीं सीख पा रहे हैं. जरूरी है कि पहले हम अपनी वर्तमान शिक्षा नीति के दोषों पर विचार करें, फिर आगे बढ़ें. दुनियाभर की बातों पर लोग खूब बोलते हैं. शिक्षा पर बोलनेवाला कोई नहीं है. जबकि, सामाजिक बदलाव का सबसे बड़ा जरिया शिक्षा है और सामाजिक भेदभाव का बड़ा जरिया भी शिक्षा ही है. हमें इस पर बात करनी चाहिए.
प्रमोद जोशी
वरिष्ठ पत्रकार
pjoshi23@gmail.com
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