राहुल पहनेंगे कांटों का ताज

Updated at : 03 Jun 2016 6:17 AM (IST)
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राहुल पहनेंगे कांटों का ताज

प्रमोद जोशी वरिष्ठ पत्रकार कांग्रेस पार्टी की जिम्मेवारी अब पूरी तरह राहुल गांधी के कंधों पर आनेवाली है. एक तरह से यह मौका है, जब राहुल अपनी काबिलियत साबित कर सकते हैं. पार्टी लगातार गिरावट के साथ ढलान पर है. वे इस गिरावट को रोकने में कामयाब हुए, तो उनकी कामयाबी होगी. वे कामयाब हों […]

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प्रमोद जोशी
वरिष्ठ पत्रकार
कांग्रेस पार्टी की जिम्मेवारी अब पूरी तरह राहुल गांधी के कंधों पर आनेवाली है. एक तरह से यह मौका है, जब राहुल अपनी काबिलियत साबित कर सकते हैं. पार्टी लगातार गिरावट के साथ ढलान पर है. वे इस गिरावट को रोकने में कामयाब हुए, तो उनकी कामयाबी होगी. वे कामयाब हों या न हों, यह बदलाव होना ही था.
फिलहाल इससे दो-तीन बातें होंगी. सबसे बड़ी बात कि अनिश्चय खत्म होगा. जनवरी 2013 के जयपुर चिंतन शिविर में उन्हें पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया गया था, तब यह बात साफ थी कि वे वास्तविक अध्यक्ष हैं. पर व्यावहारिक रूप से पार्टी के दो नेता हो गये. उसके कारण पैदा होनेवाला भ्रम अब खत्म हो जायेगा.
सोनिया गांधी के अध्यक्ष बने रहने से पार्टी में संतुलन भी था. अब राहुल पार्टी को अपने तरीके से चला सकेंगे. यह बदलाव नजर भी आना चाहिए, तभी वे वोटर और अपने कार्यकर्ता का ध्यान खींच पायेंगे. अभी तमाम बातें साफ होंगी. कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्यों की औसत आयु इस समय 67 साल है. इसमें मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी, एके एंटनी, मोतीलाल बोरा, अहमद पटेल और जनार्दन द्विवेदी जैसे वरिष्ठ नेता शामिल हैं. राहुल इनमें सबसे युवा हैं, जो इस महीने 46 साल के पूरे होंगे. इस टीम में युवा सदस्यों की संख्या बढ़ेगी. शायद राज्यों से निकल कर कुछ नये नेता दिल्ली की राजनीति में आयें.
पिछले साल 56 दिन के अवकाश से लौटने के बाद राहुल ने अपने सहयोगियों में फेर-बदल किया था. उनके करीबी हैं अजय माकन, रणदीप सुरजेवाला, अलवर वाले जीतेंद्र सिंह, आरपीएन सिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट, जितिन प्रसाद, विजेंद्र सिंगला, रवनीत सिंह बिट्टू, सुष्मिता देव, गौरव गोगोई, प्रशांत किशोर, कौशल विद्यार्थी, कनिष्क सिंह, मोहन गोपाल वगैरह. उम्रदराज नेताओं में एके एंटनी, कमलनाथ, मधुसूदन मिस्त्री, के राजू, सैम पित्रोदा वगैरह से वे सलाह लेते रहे हैं. इस सलाह की भविष्य में भी उन्हें जरूरत होगी.
कांग्रेस का नकारात्मक पहलू यह नहीं है कि वह ‘खानदानी’ पार्टी है. वामदलों और बीजेपी को छोड़ दें, तो ज्यादातर दल परिवार केंद्रित हैं. यह फैसला पार्टी को करना होता है कि नेता कौन होगा. पिछले 47 साल में पीवी नरसिम्हा राव के पांच-छह साल को छोड़ दें, तो पार्टी परिवार भरोसे ही रही है. कार्यकर्ता भी मानते हैं कि परिवार ही पार्टी को जोड़ कर रखेगा. बड़ा सवाल यह है कि क्या राहुल पार्टी की डूबती नैया को किनारे ला सकेंगे? यह बात वोटर से पहले कार्यकर्ता को समझ में आनी चाहिए.
राहुल की सफलता या विफलता भविष्य की बात है, फिलहाल उन्हें अध्यक्ष बनाने के अलावा पार्टी के पास कोई विकल्प नहीं था. सोनिया अनिश्चित काल तक कमान नहीं संभाल पायेंगी. राहुल के पास पूरी कमान होनी ही चाहिए. कांग्रेस अब ‘बाउंसबैक’ करेगी, तो श्रेय राहुल को मिलेगा और डूबेगी तब जिम्मेवारी भी उनकी होगी. यानी उनकी राह आसान नहीं है.
साल 2014 में लोकसभा चुनाव में जबर्दस्त हार के बाद जब कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक हुई, तब उम्मीद थी कि बड़े फैसले हो जायेंगे. लेकिन पार्टी ने चुनाव में हार के लिए किसी को जिम्मेवार नहीं माना. बैठक में कहा गया कि पार्टी ‘बाउंसबैक’ करेगी, पर यह नहीं बताया कि कैसे करेगी. पिछले दो साल में ऐसा कुछ नहीं हुआ, जिसे याद रखा जाये. सिवाय इसके कि पार्टी ने अकेले चलने के बजाय मोदी और बीजेपी विरोधी ताकतों के साथ खड़े होने का फैसला किया है.
अतीत में कांग्रेस का वास्तविक ‘बाउंसबैक’ केवल इंदिरा गांधी के जमाने में हुआ था. इंदिरा गांधी की तरह राहुल करिश्माई नेता नहीं हैं और न उनके पास ‘गरीबी हटाओ’ जैसा कोई जादुई नारा ही है. साल 1977, 1989 और 1996 में कांग्रेस की ताकत लोकसभा में कम होने के बावजूद राज्यों की विधानसभाओं में आज से बेहतर थी. कांग्रेस की मुख्य प्रतिद्वंद्वी जनता पार्टी, जनता दल या भारतीय जनता पार्टी इतनी ताकतवर पहले कभी नहीं थी, जितनी आज है. और नरेंद्र मोदी के मुकाबिल कोई नेता भी पार्टी के पास नहीं है.
कांग्रेस इस वक्त पस्त और हताश है. उसे उत्साहित करनेवाले मौके की जरूरत है. उसके आंतरिक लोकतंत्र की दशा अच्छी नहीं है. भाजपा को कोसना अपनी जगह है, पर अरुणाचल में बगावत की जिम्मेवारी पार्टी नेतृत्व पर जाती है. उत्तराखंड में 10 विधायकों ने पार्टी से बगावत की है, जिसमें एक पूर्व मुख्यमंत्री हैं. हिमाचल और मेघालय से भी बगावत की खबरें हैं. कर्नाटक में भी पार्टी अनुशासनहीनता की शिकार है. असम में हिमंत बिश्व सरमा ने पार्टी इसलिए छोड़ी, क्योंकि राहुल गांधी ने उनकी बात को नहीं सुना. भाजपा इन बातों का फायदा न उठाती, तो वह करती क्या?
दो साल पहले कांग्रेस संसदीय दल ने सोनिया गांधी को जब अपना अध्यक्ष चुना, तब लगा था कि स्वाभाविक रूप से लोकसभा में पार्टी का नेतृत्व राहुल गांधी करेंगे. वे संसद के मंच का बेहतर इस्तेमाल कर सकते थे. ऐसा हुआ नहीं. लोकसभा की कमान मल्लिकार्जुन खड़गे को सौंपी गयी. पार्टी ने बीते दो साल में राज्यसभा में कुछ सरकारी विधेयकों को रोकने के अलावा ऐसा कोई काम नहीं किया, जिसे याद रखा जाये.
कांग्रेस ने 2014 की हार को गंभीरता से नहीं लिया. हार को लेकर कोई अंतर्मंथन नहीं किया गया. फिलहाल पार्टी की सबसे बड़ी चुनौती है- लगातार हार को रोकना, संगठन को मजबूत करना और पार्टी को नया वैचारिक आधार प्रदान करना. साल 1991 में उदारीकरण की शुरुआत करनेवाली पार्टी ने 2004 में वाम मोर्चे की मदद से यूपीए-1 बनाया और नीतियों को बायें बाजू मोड़ा. अब कभी वह वामपंथी है और कभी दक्षिणपंथी. उसे देश को समझ में आनेवाला वैचारिक सूत्र खोजना होगा.
कांग्रेस वैचारिक रूप से देश के गरीबों और मध्यवर्ग के बीच के अंतर्विरोधों को सुलझाने में नाकामयाब रही. राहुल गांधी ने 2014 में पार्टी के महासचिवों से कहा था कि वे कार्यकर्ताओं से संपर्क करके पता करें कि क्या हमारी छवि ‘हिंदू विरोधी’ पार्टी के रूप में देखी जा रही है. पिछले दो दशक में भाजपा ने कांग्रेस के दुर्ग में सेंध लगा कर उसके ही वोटरों को छीन लिया है. उसके सामाजिक आधार को दूसरी पार्टियां ले उड़ीं. ऐसा क्यों हुआ? राहुल गांधी को इस पहेली का हल भी निकालना होगा.
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