विकास की राजनीति

Updated at : 02 Jun 2016 6:49 AM (IST)
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विकास की राजनीति

निजी निवेशक, विदेशी पूंजी और बहुराष्ट्रीय निगमों की मुखर आलोचना करनेवाली कोई सिद्धांत आधारित पार्टी यदि सत्ता में आने के बाद इनके लिए स्वागत-भाव में खड़ी नजर आये, तो आश्चर्य होना स्वाभाविक है. तो क्या यह मान लिया जाये कि केरल में नये मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन द्वारा निजी निवेशकों को आमंत्रित करने का फैसला असल […]

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निजी निवेशक, विदेशी पूंजी और बहुराष्ट्रीय निगमों की मुखर आलोचना करनेवाली कोई सिद्धांत आधारित पार्टी यदि सत्ता में आने के बाद इनके लिए स्वागत-भाव में खड़ी नजर आये, तो आश्चर्य होना स्वाभाविक है.
तो क्या यह मान लिया जाये कि केरल में नये मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन द्वारा निजी निवेशकों को आमंत्रित करने का फैसला असल में सत्ता पर काबिज होने के बाद पार्टी (माकपा) के मूल सिद्धांतों से डिगने का एक संकेत है? ऐसा सोचने से पहले एक और संभावना पर विचार कर लेना ठीक होगा. विकास के लिए निजी पूंजी निवेश आज की वैश्विक हकीकत है.
कहीं ऐसा तो नहीं कि इस हकीकत को पहचान कर विजयन ने वामपंथी राजनीति को नयी शक्ल देने की शुरुआत की है? केरल के बारे में अगर एक तथ्य यह है कि मानव-विकास सूचकांकों के लिहाज से यह अन्य राज्यों की तुलना में शीर्ष पर है, तो दूसरी हकीकत यह भी है कि बड़े राज्यों की तुलना में केरल में बेरोजगारी की दर सबसे ज्यादा (7.4 फीसदी) है. यह राष्ट्रीय औसत (2.3 फीसदी) से तीन गुना अधिक है.
केरल के हरे-भरे गांव हों या सुरम्य शांत पर्यटन को आमंत्रित करते शहर, ये बेरोजगारों से पटे पड़े हैं. ग्रामीण इलाकों में 15 से 29 साल की उम्र के लोगों की बेरोजगारी दर 21.7 फीसदी है, तो शहरों में 18 फीसदी. पिछले एक दशक में नौकरियों में 11 फीसदी की कमी के साथ 2013 में यहां पौने 11 लाख लोगों को ही संगठित क्षेत्र में रोजगार हासिल था. केरल अब जीविका के लिए सेवा-क्षेत्र पर आधारित अर्थव्यवस्था वाला राज्य बन गया है.
प्रदेश के कार्यबल में वेतनभोगी सिर्फ 22 फीसदी रह गये हैं, जबकि अनियमित रोजगार वालों की संख्या बढ़ कर 39 फीसदी हो गयी है. बेरोजगारी से बेहाल केरल के लिए जरूरी है सामाजिक सुरक्षा के ढांचे को बरकरार रखते हुए रोजगार के अवसर बढ़ाना, जो निजी पूंजी निवेश के बिना मुश्किल है. ठीक है कि नया निवेश भू-अधिग्रहण, प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और श्रम कानूनों को शिथिल करने की मांग करेगा, लेकिन इस चुनौती से युक्तियुक्त ढंग से निबटते हुए लोक-कल्याण को सुरक्षित बनाये रखने के उदाहरण कई देशों में मौजूद हैं.
ऐसे में विकास के लिए जरूरत इच्छाशक्ति और संकल्प की है. विजयन का नेतृत्व अगर ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ के दलदल में न धंसते हुए प्रदेश में सामाजिक सुरक्षा के ढांचे को बरकरार रख पाता है, तो उम्मीद करनी चाहिए कि आनेवाले वर्षों में केरल विकास के मॉडल वाले राज्यों में शुमार होगा.
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