सोच में बसा भ्रष्टाचार

Updated at : 02 Jun 2016 6:48 AM (IST)
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सोच में बसा भ्रष्टाचार

देश ने हाल के वर्षों में भ्रष्टाचार के खिलाफ कई अभियान देखे हैं. यह जाहिर करता है कि लोग भ्रष्टाचार का खात्मा चाहते हैं. लेकिन, यह विडंबना ही है कि वही लोग नाजायज आर्थिक लाभ उठाने का कोई मौका छोड़ना नहीं चाहते. यही कारण है कि जिस तेजी और तेवर से भ्रष्टाचार पर लगाम की […]

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देश ने हाल के वर्षों में भ्रष्टाचार के खिलाफ कई अभियान देखे हैं. यह जाहिर करता है कि लोग भ्रष्टाचार का खात्मा चाहते हैं. लेकिन, यह विडंबना ही है कि वही लोग नाजायज आर्थिक लाभ उठाने का कोई मौका छोड़ना नहीं चाहते. यही कारण है कि जिस तेजी और तेवर से भ्रष्टाचार पर लगाम की बातें होती हैं, उसी तेजी से भ्रष्टाचार के नये-नये किस्से भी सामने आते हैं.
ताजा किस्सा कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट से आया है, जहां अनेकों ऐसे लोगों के नाम पर भी उनके परिजन पेंशन ले रहे थे, जिनका निधन हो चुका है. एक अंगरेजी अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक इनमें से 18 की उम्र 100 साल से ऊपर, जिनमें पांच की उम्र तो 110 साल से भी अधिक हो चुकी थी. अब जबकि पेंशन खातों को आधार नंबर से जोड़ने की कवायद शुरू हुई है, फर्जीवाड़े का भंडाफोड़ हो गया. सरकारी आंकड़े बताते हैं कि कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट के 26,699 पेंशनधारियों में से 404 की उम्र 90 से 100 साल के बीच है.
यहां पिछले नवंबर से अब तक करीब चार हजार लाभार्थियों के पेंशन रोके जा चुके हैं, क्योंकि वे बैंकों में अपने जीवित होने के प्रमाण नहीं दे पाये. जानकार मानते हैं कि ईमानदारी को ताक पर रख कर सरकारी लाभ लेने की कोशिशों का यह एक उदाहरण भर है, यदि सही जांच हो और आधार संख्या के साथ-साथ आधुनिक तकनीक का समावेश किया जाये, तो ऐसे मामले हर प्रदेश में सामने आयेंगे. भ्रष्टाचार की चर्चा में हम वर्षों से दोहराते रहे हैं कि जब नेता-नौकरशाह भ्रष्ट हों, पुलिस-प्रशासन चुस्त-दुरुस्त नहीं हो, लोगों को कार्रवाई का अधिकार न हो, तो फिर भ्रष्टाचार पर अंकुश कैसे संभव है! ऐसी सोच दोष सरकार पर मढ़ने और खुद को पाक-साफ बताने की मंशा से प्रेरित जान पड़ती है.
वास्तव में समाज के मानस में ऊपरी आमदनी का मोह आज भी है और वह प्रेमचंद की कालजयी कहानी ‘नमक का दारोगा’ में एक पिता द्वारा पुत्र को दी गयी इस सीख से पीछा नहीं छुड़ा पाया है कि मासिक वेतन तो पूर्णिमा के चांद की तरह है, असली कमाई तो ऊपरी आमदनी है. बदलाव की बुनियाद सिर्फ दूसरों को उपदेश देकर नहीं रखी जा सकती. अब वक्त आ गया है, जब हमें गंभीरता से सोचना चाहिए कि भ्रष्टाचार बढ़ने की कुछ वजहें कहीं हमारे सामाजिक जीवन और मानस में भी तो मौजूद नहीं हैं.
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