पाइन चढ़इत छौ की...?

Updated at : 01 Jun 2016 7:00 AM (IST)
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पाइन चढ़इत छौ की...?

व्यालोक स्वतंत्र टिप्पणीकार हमारे एक बलदेव चाचा हैं. वे बुजुर्ग हैं और काफी अनुभवी हैं. आजकल उनका एक ही काम है. रोजाना सुबह-सुबह हमारे घर पर आकर पूछते हैं, ‘बाउ, तोहर पाइन चढ़इत छौ की…’ उनका आशय यह होता है कि हमारा मोटरपंप पानी खींच पा रहा है या कि नहीं. मैं उनसे कहना चाहता […]

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व्यालोक

स्वतंत्र टिप्पणीकार

हमारे एक बलदेव चाचा हैं. वे बुजुर्ग हैं और काफी अनुभवी हैं. आजकल उनका एक ही काम है. रोजाना सुबह-सुबह हमारे घर पर आकर पूछते हैं, ‘बाउ, तोहर पाइन चढ़इत छौ की…’ उनका आशय यह होता है कि हमारा मोटरपंप पानी खींच पा रहा है या कि नहीं.

मैं उनसे कहना चाहता हूं कि चचा, जब आदमी की ‘आंखों का पानी’ मर गया हो, तो एक हॉर्सपावर का मोटरपंप भला कहां से पानी चढ़ा पायेगा. पानी के सवाल पर हमारे नेता एक-दूसरे का ‘पानी उतारना चाह रहे’ हैं, लेकिन यदि वह ‘पानी-पानी हो जाये’, तो भला वह नेता ही क्या कहलायेगा? अटक से कटक और दीसपुर से दरभंगा तक, पानी के लिए हाहाकार मचा हुआ है, लेकिन आदमी पानीदार हो, ऐसा कोई खोजे से भी नहीं मिलता.

लगातार भूजल के दोहन ने दरभंगा में भी पानी के लिए हाहाकार करवा दिया है. पानी का स्तर दोगुने से भी नीचा चला गया है, आधे हॉर्सपावर की छोड़िए, एक हॉर्सपावर का मोटरपंप भी हांफ रहा है.

अब ‘पग-पग पोखरि’ वाले दरभंगा में भी सब लोग समर्सिबल लगवाएं, तो एकाध साल काम चलेगा. यही हमारे चचा की तकलीफ है और वह हमसे एक ही सवाल पूछने रोज शायद इसी तकलीफ को कम करने के लिए आते हैं.

हाल ही में हमारे एक मित्र ने जानकारी दी कि सन 1989 तक दरभंगा शहर में 213 तालाब थे, लेकिन अब यह संख्या सिमट कर सौ से भी नीचे रह गयी है. इनके भी जान पर बनी है, क्योंकि तालाब या डबरा कहीं जाते तो हैं नहीं, उन्हें तो हमारी लालच और जमीन की अबूझ भूख मारती है. नगर निगम के आंकड़ों के हिसाब से देखें, तो जिस वक्त यह लेखक अपनी उंगलियां की-बोर्ड पर चला रहा है, उस वक्त भी एक तालाब को मारने की साजिश चल रही है.

अपने मित्र का दिया हुआ आंकड़ा भी हम जैसों को नहीं चौंकाता. हमारी आंखों का पानी सूख गया है, इसलिए आंखों से लहू नहीं उतरता. हमारे अपने मुहल्ले में दो-दो पोखर थे. दोनों को ही भर कर बाकायदा बेचा भी जा रहा है.

जिन लोगों ने पोखर को भर कर मकान बनवाया, उसमें बड़े-बड़े प्रोफेसर, बैंक मैनेजर, वकील साब, इंजीनियर, शिक्षक यानी समाज के सारे सफेदपोश लोग शामिल थे. घर से ठीक 100 मीटर दूर बागमती की धारा हमें चारों ओर से अपनी बाहों में समेटे हुए है. 20 साल पहले तक बागमती में सोंस (या डॉल्फिन) दिख जाती थी, आज बागमती में पानी ही नहीं दिखता तो डॉल्फिन कहां से दिखेगी. अगर दिखती है, तो एक काली सी पतली धार, जो किसी नाले या गड़हे के पानी से भी ज्यादा गंधाती है.

हमारी पीढ़ी मोटर या टुल्लू पंप जानती भी नहीं थी. जब घर बना था, तो 60-70 फीट पर ही पानी मिल जाता था, अब लगभग 200 फीट पर मिलता है. बिहार से कहीं बहुत दूर जब लातूर या बुंदेलखंड में पानी पर रस्साकशी की खबरें सुनते हैं, जलदूत नामक ट्रेन की कहानियां सुनते हैं, पानी पर हो रही राजनीति देखते हैं, तो दिल में एक सिहरन सी होती है- आखिर बहुत जल्द यही तो हमारा भी अंजाम होना है.

बहरहाल, दो घंटे से मोटर चल रहा है, लेकिन हमारा पानी नहीं चढ़ा है. हम बेपानी हो चुके हैं और रहीम का दोहा याद कर रहे हैं-

रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून।

पानी गये न उबरे, मोती-मानुस-चून।।

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