लौकी ले लो की गुहार

Updated at : 30 May 2016 7:20 AM (IST)
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लौकी ले लो की गुहार

हमारे बहुत अच्छे पड़ोसी हैं प्रभुजी. वे अक्सर सुबह-सुबह आ धमकते हैं, ठीक चाय बनने से पहले. उनका बहाना होता है, अखबार देखने का या कोई चटपटी ब्रेकिंग न्यूज. यों पुराने पत्नी-पीड़ित हैं. वे आज भी आये. पिछले कुछ महीनों से इंटरनेशनल मुद्दे उनकी खास पसंद हैं. स्वयं को बहुत गौरवान्वित महसूस करते हैं. दुनिया […]

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हमारे बहुत अच्छे पड़ोसी हैं प्रभुजी. वे अक्सर सुबह-सुबह आ धमकते हैं, ठीक चाय बनने से पहले. उनका बहाना होता है, अखबार देखने का या कोई चटपटी ब्रेकिंग न्यूज. यों पुराने पत्नी-पीड़ित हैं. वे आज भी आये. पिछले कुछ महीनों से इंटरनेशनल मुद्दे उनकी खास पसंद हैं. स्वयं को बहुत गौरवान्वित महसूस करते हैं. दुनिया की हर समस्या का हल चुटकी बजाते पेश कर देते हैं. लेकिन अफसोस! उनकी सुनता कोई नहीं है. व्लादिमीर पुतिन और बराक ओबामा तो मानो उनके लंगोटिया यार हैं. लेकिन प्रभुजी आज न फ्रांस पर रुके और और न ईरान पर टिके. फटाफट नेशनल, आइपीएल से होते हुए मोहल्ले पर आ गये. पल-पल में स्टेशन बदलते रहे.

हमें लगा कुछ खास शेयर करना चाह रहे हैं. लेकिन तनिक झिझक रहे है. संशय है कि प्रॉपर रिस्पांस मिलेगा या नहीं. इधर हम भी आज असहज हैं. सुबह-सुबह मेमसाब से चिक-चिक हो गयी. इसीलिए हम चाह रहे थे कि प्रभुजी जल्दी से मूल मुद्दे पर आयें और फिर फौरन से पेशतर दफा हो जायें. हमें बस कोई अचूक बहाने की तलाश थी कि प्रभुजी अचानक सब्जी मंडी पहुंच गये. अच्छा यह बताइये, लौकी के बारे में आपके क्या विचार हैं?

हम पर मानो बिजली आ गिरी. अभी कुछ पल पहले यह शख्स इंटरनेशनल रिलेशन पर बात कर रहा था. वह एकाएक सब्जी-तरकारी जैसे लो लेवल के लोकल मुद्दे पर क्यों कर उतर आया? बात समझ में नहीं आयी. यह तो जैसे पहेली हो गयी. हमें विश्वास हो गया कि हो न हो प्रभुजी के घर में किसी की तबियत खराब है.

मगर प्रभुजी ने तनिक झेंपते हुए खंडन किया. बिल्कुल नहीं. बस ऐसे ही मन में ख्याल आया, तो पूछ लिया.

हमने गहरी सांस ली. कई बार पढ़ा है. लौकी बहुत ही गुणकारी होती है. हजारों साल से हमारे ऋषि-मुनि भी यही खाते आ रहे हैं. सब्जी, रायता, हलवा, पकौड़े, सब्जी आदि क्या-क्या नहीं बनता इसका. तमाम विधियां हैं बनाने की, लेकिन हमारे घर में दो कारणों से बनती है. पहला, जब हमारी तबीयत खराब हो तब और दूसरा, जब मेमसाब नाराज हों तब. इसे खाने के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प नहीं है. और आज घर में लौकी ही बनेगी. मेमसाब का मूड जो खराब है आज.

यह सुनते ही प्रभुजी उछल पड़े. यारा, मेरे घर में भी यही प्रॉब्लम है. इन फैक्ट, मैं तो यह पूछने आया था कि तेरे घर कुछ अच्छा बना हो, तो एक कटोरी दे देना.

हमें प्रभुजी की मौजूदगी अचानक अच्छी लगने लगी. यार यह बता, तबीयत खराब होने पर लौकी का बनना तो जायज है. मगर नाराज होने पर ये सारी पत्नियां लौकी ही क्यों बनाती हैं? यह कैसी सजा है? पत्नियां जान-बूझ कर नाराज होती हैं, ताकि वे लौकी बनायें और पति की सेहत अच्छी रहे.

हमने कहा- ठीक कहते हो. उस पर तुर्रा देखो. बाजार भरा पड़ा है लौकियों से. इन सब्जी वालों को भी मालूम है कि एक तिहाई पत्नियां हर समय नाराज रहती हैं.

इतने में ठेलिया पर सब्जी बेचनेवाले की आवाज आती है- आलू, टमाटर, मेथी, तुरई, मिर्च ले लो.… लहसुन, प्याज, हरी धनिया ले लो. ताजी-ताजी लौकी ले लो.….. ताजी-ताजी लौकी ले लो…

हम और प्रभुजी शीघ्रता से बाहर लपकते हैं. हमने सब्जी वाले को रोका और डपट दिया. अमां, लौकी ले लो की गुहार इतनी जोर से लगानी जरूरी है क्या?

वीर विनोद छाबड़ा

व्यंग्यकार

chhabravirvinod@gmail.com

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