हवा-पानी ठीक करने की चुनौती

Updated at : 26 May 2016 6:45 AM (IST)
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हवा-पानी ठीक करने की चुनौती

अनुज कुमार सिन्हा वरिष्ठ संपादक प्रभात खबर दो साल में माेदी सरकार ने मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्किल इंडिया, इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट आैर गांवाें काे फाेकस करते हुए अनेक याेजनाआें पर काम काे आगे बढ़ाया है, लेकिन एक बड़ी चुनाैती उभर कर सामने आयी है. वह है जलवायु परिवर्तन. इस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र माेदी खुद […]

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अनुज कुमार सिन्हा
वरिष्ठ संपादक
प्रभात खबर
दो साल में माेदी सरकार ने मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्किल इंडिया, इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट आैर गांवाें काे फाेकस करते हुए अनेक याेजनाआें पर काम काे आगे बढ़ाया है, लेकिन एक बड़ी चुनाैती उभर कर सामने आयी है. वह है जलवायु परिवर्तन.
इस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र माेदी खुद भले ही चिंतित हाें, मन की बात में भी बूंद-बूंद पानी बचाने की अपील भले ही कर रहे हाें, लेकिन न ताे लाेग मान रहे हैं आैर न ही काेई रास्ता नजर आ रहा है. बगैर देर किये इसे सरकार की प्राथमिकता सूची में लाना हाेगा. दाे साल से माॅनसून अच्छा नहीं रहा है. देश में 2014 में 12 फीसदी आैर 2015 में 14 फीसदी कम बारिश हुई. इस बार भी माॅनसून विलंब से आ सकता है. दाे साल कम बारिश हाेने का गहरा असर पड़ा है. कई राज्याें में अकाल-सूखे की स्थिति है. देश के बड़े हिस्से में पानी का गंभीर संकट उत्पन्न हाे गया है.
भूजल स्तर गिर रहा है. वर्षा कम हाे रही है. पानी नहीं रहने के कारण महाराष्ट्र समेत कई राज्याें से लाेगाें का पलायन हाे रहा है. पानी के लिए झगड़े हाे रहे हैं. पानी की राशनिंग हाे रही है. बिना पानी जीवन मुश्किल आैर पानी सीमित है. इसलिए भविष्य में भी पानी के लिए लड़ाई कम नहीं हाेगी, बल्कि बढ़ेगी. गरमी के माैसम में जब पानी का संकट हाेता है, तब इसकी गंभीरता समझ में आती है.
जलवायु परिवर्तन की गंभीरता काे लाेग समझ नहीं पा रहे हैं. हालात यह है कि इस मुद्दे पर दुनिया के विकसित देश भारत आैर अन्य विकासशील देशाें काे घेर रहे हैं. विकासशील देशाेें काे कार्बन उत्सर्जन के लिए दाेषी ठहरा रहे हैं. ये विकासशील देश खुद अंदरूनी समस्या से जूझ रहे हैं. इनकी काेई नहीं सुनता. जलवायु परिवर्तन का अनाज, दूध के उत्पादन पर भी गहरा असर पड़नेवाला है. अनाज का उत्पादन घटेगा. साल 2020 तक जलवायु परिवर्तन के कारण भारत में दूध का उत्पादन 30 लाख टन कम हाे सकता है.
हां, देसी गायाें पर जलवायु परिवर्तन का असर कम पड़ता है, इसलिए दुनिया के कई देश दूध उत्पादन के लिए भारत से देसी गायों का आयात कर रहे हैं. इसके उलट हम अपने ही देश में देसी गाय की तुलना में उन विदेशी या जर्सी गाय काे ज्यादा महत्व दे रहे हैं, जाे अधिक दूध देती हैं. किसान खेताें में बीज डालेंगे, लेकिन उपज कम हाेगी. वर्षा कम हाेगी. बिना पानी के खेती कैसे हाेगी. किसानाें में निराशा बढ़ेगी, आक्राेश बढ़ेगा. आत्महत्या की घटनाएं बढ़ेंगी. माेदी सरकार के सामने ये चुनाैतियां बढ़नेवाली हैं.
जलवायु परिवर्तन का असर सिर्फ भारत पर ही नहीं है, पूरी दुनिया इससे प्रभावित है. प्रभावित देशाें में तेजी से इसके रास्ते भी खाेजे जा रहे हैं. भारत में यह प्रयास धीमा है. उनमें तेजी लानी हाेगी. संयुक्त राष्ट्र की रिपाेर्ट के अनुसार, आनेवाले दिनाें में ग्लेशियर पिघलने से समुद्र तल में जाे बदलाव आयेगा, उससे भारत के चार कराेड़ लाेग प्रभावित हाेंगे.
वक्त आ गया है कि जब हवा-पानी काे ठीक करने के लिए लाेग चेतें आैर सरकार इसे मुख्य मुद्दा माने. उसके लिए याेजना बनाये. वर्षा का पानी जमा नहीं हाे पाता. नदी-नाले से हाेता हुआ सीधे समुद्र में चला जाता है. एक नदी सूखी हाेती है, दूसरे में पर्याप्त पानी हाेता है. नदियाें काे जाेड़ने की याेजना वाजपेयी सरकार में बनी थी. उस पर काम आगे नहीं बढ़ पाया है.
हां, गंगा सफाई याेजना जरूर चल रही है, लेकिन नदियाें काे इतना प्रदूषित कर दिया गया है कि उसे ठीक करने में अरबाें-अरब खर्च हाेेंगे आैर कई साल लगेंगे. समस्या काे समझना हाेगा. आबादी तेजी से बढ़ी है, लेकिन उस तेजी से पानी काे जमा करने की व्यवस्था नहीं हुई है. डैमाें-नदियाें पर भी लाेगाें ने कब्जा कर लिया है. जंगलाें काे लगातार काटा जा रहा है. पहाड़ाें काे काट कर बर्बाद कर दिया गया. प्राकृतिक संसाधनाें के जरूरत से ज्यादा दाेहन से यह स्थिति पैदा हुई है. अब समय आ गया है कि संतुलन काे बनाये रखने के लिए सरकार कड़ी नीति बनाये आैर उसका कड़ाई सेपालन हो. कानून ताे कई हैं, लेकिन उनका पालन नहीं हाेता.
अगर अब भी पालन नहीं करेंगे ताे कब करेंगे?
पानी नहीं रहेगा, ताे उद्याेग भी नहीं लगेंगे. सारी याेजनाएं धरी की धरी रह जायेंगी. पानी नहीं मिलेगा, ताे खेती भी नहीं हाेगी, अनाज भी नहीं उपजेगा. ऐसी स्थिति में खायेंगे क्या? ठीक है, देश स्मार्ट हाे रहा है, स्मार्ट सिटीज बन रही हैं, बड़े-बड़े भवन बन रहे हैं.
लेकिन, शुद्ध हवा न मिले, शुद्ध पानी नहीं मिले, ताे सब बेकार है. हाल ही में राजस्थान के एक शहर में तापमान 51 डिग्री पहुंच गया था. अब तक का अधिकतम तापमान. जिस तेजी से तापमान बढ़ रहा है, जंगल कट रहे हैं, कार्बन का उत्सर्जन हाे रहा है, 51 डिग्रीवाले कई आैर शहर सामने आ सकते हैं. ऐसे में जीवन ताे खतरे में रहेगा ही.
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