सेहत से न हो खिलवाड़

Updated at : 25 May 2016 12:36 AM (IST)
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सेहत से न हो खिलवाड़

पहले एक नूडल्स के बारे में समाचार आया कि उसमें सेहत को हानि पहुंचानेवाले तत्व हैं. नूडल्स बनानेवाली कंपनी ने इनकार किया, लेकिन मीडिया में आरोप बना रहा. चतुर्दिक चर्चा हुई, सरकारी मशीनरी जागी. थोड़े दिनों तक उस नूडल्स का बिकना कुछ राज्यों में बंद रहा. उस वक्त सब जानते थे कि हमारी झटपट की […]

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पहले एक नूडल्स के बारे में समाचार आया कि उसमें सेहत को हानि पहुंचानेवाले तत्व हैं. नूडल्स बनानेवाली कंपनी ने इनकार किया, लेकिन मीडिया में आरोप बना रहा. चतुर्दिक चर्चा हुई, सरकारी मशीनरी जागी. थोड़े दिनों तक उस नूडल्स का बिकना कुछ राज्यों में बंद रहा.
उस वक्त सब जानते थे कि हमारी झटपट की आधुनिक जिंदगी में दो मिनट में तैयार हो जानेवाले नूडल्स की जरूरत बनी रहेगी. इस जरूरत ने ही वह जमीन तैयार की, जिस पर पांव रख कर नूडल्स बनानेवाली कंपनी ने अपनी छवि और गलती सुधारने की कोशिश के बाद फिर से वापसी की. नूडल्स की ही तरह अब ब्रेड, बन, पिज्जा और पाव आदि बनाने और परोसनेवाली कंपनियों के उत्पादों में सेहत के लिए नुकसानदेह रसायन होने की एक खबर आयी है.
जिन कंपनियों पर आरोप हैं, उनमें से ज्यादातर ने इस बात से इनकार किया है. लेकिन,आरोप लगानेवाली स्वयंसेवी संस्था (सीएसइ) प्रयोगशाला के परीक्षण के निष्कर्षों पर अडिग है. सवाल उठता है कि क्या जो नतीजा नूडल्स के मामले में आया, कुछ वैसा ही इस मामले में भी होनेवाला है? केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री का बयान है कि घबराने की जरूरत नहीं, जल्दी ही जांच के आधार पर सारी स्थिति साफ हो जायेगी.
नियामक संस्था फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड आथॉरिटी आधी जागी-आधी सोयी हुई सी लगती है. जिन दो हानिकारक रसायनों-पोटैशियम ब्रोमेट और पोटैशियम आयोडेट- की मौजूदगी की बात कही जा रही है, नियामक संस्था ने उसमें एक को प्रतिबंधित किया है, जबकि दूसरे के बारे में उसे अभी फैसला लेना है.
नूडल्स की तरह ब्रेड, बन, पिज्जा और पाव भी आधुनिक जीवनशैली की जरूरत को पूरा करनेवाले उत्पाद हैं. सेहत बचाने के नाम पर ब्रेड, बन, पाव-पिज्जा से कोई तौबा करे, तो फिर हफ्ते के सातों दिन, चौबीसो घंटे चलनेवाला वह उत्पादन-वितरण-उपभोग का रियल टाइम कारोबार कैसे चले? बात घूम-फिर कर नियामक संस्था पर आती है. क्या फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड आथॉरिटी हानिकारक रसायनों के इस्तेमाल को लेकर शक के घेरे में आयी कंपनियों पर ऐसी सख्ती कर पायेगी कि आगे से बन-बर्गर, पाव-पिज्जा आदि खाते समय लोगों को हर कौर के साथ कुछ कैंसरकारक रसायन के अपनी देह में समाने का भय न सताये?
क्या विनियामक संस्था ताकतवर फूड-इंडस्ट्री के प्रभावों से मुक्त रहकर अपने फैसले ले पायेगी? कुछ प्रश्नों के निर्णायक उत्तर नहीं होते, इसका फैसला भविष्य ही करता है. हमें बस शुभेच्छा से उम्मीद पालनी चाहिए कि कोई भी फैसला लोगों की भलाई को ध्यान में रख कर लिया जायेगा.
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