अमन बहाली की चुनौती

राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ हिंसा और असहमति के स्वरों को दबाने के लिए गुंडागर्दी की इजाजत किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र में नहीं दी जा सकती. लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी ही यही मानी जाती है कि इसमें हर तरह के विचारों और असहमति के स्वरों के लिए बराबर की जगह होती है. लेकिन, विधानसभा चुनावों […]
राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ हिंसा और असहमति के स्वरों को दबाने के लिए गुंडागर्दी की इजाजत किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र में नहीं दी जा सकती. लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी ही यही मानी जाती है कि इसमें हर तरह के विचारों और असहमति के स्वरों के लिए बराबर की जगह होती है.
लेकिन, विधानसभा चुनावों के पिछले हफ्ते आये नतीजों के बाद खासकर पश्चिम बंगाल और केरल से जिस तरह से बड़े पैमाने पर राजनीतिक हिंसा और पार्टी कार्यकर्ताओं एवं कार्यालयों पर हमले की खबरें आ रही हैं, वे न केवल दुर्भाग्यपूर्ण हैं, बल्कि एक नये तरह के खतरे का संकेत भी दे रही हैं. संकेत यह है कि अब राजनेताओं और उनके समर्थकों में चुनावी हार-जीत को पचा पाने की शक्ति एवं सहिष्णुता कम हो रही है.
चुनावी नतीजे आने के बाद पार्टियों ने अपने-अपने समर्थकों से शांति बहाल रखने की अपील की थी. बावजूद इसके, केरल में निकाले गये विजय जुलूसों के दौरान अलग-अलग स्थानों पर संघर्ष में सीपीएम और बीजेपी के एक-एक कार्यकर्ता की मौत हो गयी और दर्जनों लोग घायल हो गये. इसी तरह पश्चिम बंगाल के विभिन्न इलाकों में जारी हिंसा में भाजपा नेता रूपा गांगुली सहित विभिन्न दलों के दर्जनों समर्थकों के घायल होने की खबर है. दुर्भाग्यपूर्ण यह भी है कि राजनीतिक हिंसा की ये खबरें उन राज्यों से आ रही हैं, जिनमें से एक की पहचान ‘बुद्धिजीवियों के लोक’, तो दूसरे की ‘देश के सबसे शिक्षित राज्य’ के रूप में है. हिंसा की खबरों से राज्य की यह छवि धूमिल हो रही है.
दोनों राज्यों में हिंसा के ज्यादातर मामलों में आरोप चुनाव जीतनेवाली पार्टियों के समर्थकों पर लग रहे हैं. आरोप यह भी है कि कई मौकों पर पुलिस भी अपनी जिम्मेवारियों का निष्पक्ष निर्वहन नहीं कर रही. ऐसे में नयी सरकार की यह पहली जिम्मेवारी होनी चाहिए कि वह समस्त राजनीतिक दुराग्रहों से मुक्त होकर राजनीतिक हिंसा- हमलों, धमकियों और दहशतगर्दी-के इस सिलसिले से कड़ाई से निपटे और राज्य में अमन-चैन की बहाली के लिए कारगर कदम उठाये.
राज्य की परंपरागत छवि को धूमिल कर रहीं हिंसक घटनाएं स्थानीय समाज के लिए भी गंभीर चिंता एवं चिंतन का सबब होना चाहिए. ऐसी घटनाओं के प्रति मूकदर्शक बने रहना अंतत: राज्य में लोकतंत्र एवं कानून के शासन को कमजोर करनेवाला साबित होगा.
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