पोखर के बहाने कड़े वाल

Updated at : 23 May 2016 11:56 PM (IST)
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पोखर के बहाने कड़े वाल

गिरींद्र नाथ झा ब्लॉगर एवं किसान हाल ही में मिथिला के कुछ ग्रामीण इलाकों में जाना हुआ. मेरे लिये कोसी के इस पार यानी सीमांचल की तरफ से उधर जाना हमेशा से सुखद रहा है. जैसा कि हम जानते हैं कि पानी संकट को लेकर इन दिनों हर जगह चर्चा हो रही है. एक किसान […]

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गिरींद्र नाथ झा

ब्लॉगर एवं किसान

हाल ही में मिथिला के कुछ ग्रामीण इलाकों में जाना हुआ. मेरे लिये कोसी के इस पार यानी सीमांचल की तरफ से उधर जाना हमेशा से सुखद रहा है. जैसा कि हम जानते हैं कि पानी संकट को लेकर इन दिनों हर जगह चर्चा हो रही है. एक किसान के तौर पर मैं खुद भी जूझ रहा हूं. ऐसे में जब एक से बढ़ कर एक पोखर दिख जायें, तो आप किसान मन का अंदाजा लगा ही सकते हैं. पोखर में स्थिर पानी और उसके महार पर खेलते बच्चों को देख कर मन हरा हो गया. मनिगाछी के समीप एक गांव ब्रह्मपुरा जाना हुआ था.

मैंने गांव घूमते हुए एक पोखर की तसवीर उतार ली और उसे जब फेसबुक और ट्विटर पर डाला, तो जो टिप्पणियां आयीं तो अंदाजा लगा कि गाम-घर को लेकर महानगरों में बसे लोगों के मन में कितना प्रेम है. वैसे कुछ लोगों ने सवाल भी उठा दिया कि क्या सचमुच में पोखर में पानी है या फिर गूगल देवता की तसवीर है!

खैर, गांव अभी भी कई चीजों को संजो कर रखे हुए है. गांवों के बदौलत डाइनिंग टेबल आबाद है. ऐसे में गांव की बातें खूब होनी चाहिए. गांव की उन सभी चीजों पर ध्यान रखने की जरूरत है, जो हम सभी की जरूरतें पूरा कर रही है. साथ ही किसानी समाज कहां गलती कर रहा है, इस पर भी सवाल उठाये जाने चाहिए.

ऐसे में पग-पग पोखर की बात करनेवाले मिथिला जैसे क्षेत्र को नजदीक से जानने-समझने की आवश्यकता है. केवल माछ-मखान और पान के अलावा जल संरक्षण के लिए भी वहां लोग काम कर रहे हैं. यह काम एक से नहीं हो सकता, यह सामूहिकता को दर्शानेवाला काम है.

मछली और मखान तो व्यावसायिक खेती है. किसानी भाषा में हम इसे नकदी फसल कहते हैं, लेकिन जब जल संरक्षण की बात आती है तो हम चुप्पी साध लेते हैं. पोखर निजी संपत्ति बनकर रह जाता है. यकीन मानिए, यदि हम पानी को लेकर गंभीर नहीं हुए, तो एक अजीब स्थिति इधर भी पैदा हो जायेगी. किसी भी इलाके को मराठवाड़ा बनने में देर नहीं लगती है.

बात इसकी नहीं है कि हम किस पर दोष मढ़ें. दोष सब पर मढ़े जा चुके हैं. अब एक-दूसरे पर दोष मढ़ रहे हैं, लेकिन यह भी सत्य है कि खेत को खेत हम किसान ही हैं, जो नहीं बने रहने दे रहे हैं. खेत का दोहन हम करते आये हैं. साल में चार फसलें तक हम उपजा लेते हैं, धरती मइया को आराम नहीं मिलता है. बोरिंग से अनवरत पानी निकाला जा रहा है. ऐसे में जल स्तर गिरना तो तय है. यह भी सच है कि हम किसान ही हैं जो पोखर को सूखा रहने के लिए विवश कर दिये हैं.

हमें अपनी गलती स्वीकार कर सामूहिक स्तर पर पानी के लिए पोखर को जिंदा करना होगा. जान लीजिये, जिस दिन हम प्रकृति के अनुसार किसानी करने लगेंगे , दिक्कतें कम होनी शुरू जायंेंगी. हां, यह अलग बात है कि मौसम की मार के सामने हम विवश हो जाते हैं, लेकिन हर बार ऐसा ही होगा, यह तो जरूरी नहीं है. किसानी करते हुए लड़ना पड़ता है, इसे सहज भाव में स्वीकार कर हमें आगे बढ़ना होगा.

ब्रह्मपुरा गांव के उस पोखर ने तो मेरे जैसे किसान को यही कहानी सुनायी है. और हां, यदि हम सब पोखर को बचाने की ठान लें तो दिक्कतें भी छू-मंतर हो जायेंगी. सुंदर गांव, सुंदर पोखर, पेड़-पौधे किसकी आंखों को पसंद नहीं है.

इसे हम ग्राम्य पर्यटन के नजरिये से भी देख सकते हैं. हमारे गाम में बाहर से लोग आयेंगे, ठहरेंगे. इसे भी एक रूप दिया जा सकता है. साफ-सफाई रखने की जरूरत है. हर कुछ के लिए हम सरकार को तो दोषी नहीं ठहरा सकते हैं, हमें भी कुछ करना होगा, बस कुछ अलग करना होगा, हम सभी को अपनी माटी के लिए.

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