नीट पर राजनीति

Updated at : 23 May 2016 1:12 AM (IST)
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नीट पर राजनीति

मेडिकल शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश के लिए राष्ट्रीय एकल परीक्षा (नीट) को इस वर्ष अनिवार्य नहीं बनाने संबंधी अध्यादेश राष्ट्रपति के पास विचाराधीन है. इसे न्यायालय में भी चुनौती दिये जाने की संभावना है. कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने इसे वापस लेने का आग्रह किया है. कुछ दिन पूर्व सर्वोच्च न्यायालय ने नीट को […]

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मेडिकल शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश के लिए राष्ट्रीय एकल परीक्षा (नीट) को इस वर्ष अनिवार्य नहीं बनाने संबंधी अध्यादेश राष्ट्रपति के पास विचाराधीन है. इसे न्यायालय में भी चुनौती दिये जाने की संभावना है. कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने इसे वापस लेने का आग्रह किया है.

कुछ दिन पूर्व सर्वोच्च न्यायालय ने नीट को इसी साल से लागू करने का आदेश दिया था. इसे सैद्धांतिक रूप से स्वीकार करते हुए अनेक राज्यों ने इस परीक्षा के अनुरूप अपने पाठ्यक्रम में संशोधन करने तथा छात्रों को तैयारी का समय देने के अनुरोध के साथ इसे अगले वर्ष से लागू करने की मांग की थी. इस फैसले में न्यायालय ने सीबीएसइ द्वारा यह परीक्षा कराने का निर्देश जारी किया था.

राज्यों और उनके छात्रों के इस तर्क को आसानी से खारिज नहीं किया जा सकता है कि परीक्षा के कुछ दिन पहले नये पाठ्यक्रम के अनुसार परीक्षा की तैयारी बहुत कठिन है. सीबीएसइ और राज्य बोर्ड के पाठ्यक्रमों में भिन्नता है. कुछ राज्यों ने क्षेत्रीय भाषाओं की अवहेलना की बात भी कही है. तमिलनाडु में माध्यमिक परीक्षा के प्राप्तांकों के आधार पर मेडिकल संस्थानों में प्रवेश दिया जाता है. दिल्ली सरकार द्वारा अध्यादेश का विरोध समझ से परे है क्योंकि दिल्ली के मेडिकल संस्थानों में सीबीएसइ द्वारा संचालित परीक्षा के आधार पर ही प्रवेश दिया जाता है तथा वहां के स्कूलों में पाठ्यक्रम भी सीबीएसइ का ही है. इस वर्ष तक राज्यस्तरीय परीक्षाओं की अनुमति के अलावा प्रस्तावित अध्यादेश में सर्वोच्च न्यायालय के किसी भी दिशा-निर्देश को बदला नहीं गया है.

निजी और डीम्ड संस्थाओं में प्रवेश के लिए नीट की अनिवार्यता भी बहाल रखी गयी है. नीट के पीछे सबसे बड़ा कारण ऐसी संस्थाओं के व्यावसायीकरण और इनमें व्याप्त भ्रष्टाचार को रोकने की मंशा ही है. कांग्रेस ने इस अध्यादेश का विरोध कर एक बार फिर यह साबित किया है कि उसे लोगों की चिंताओं की परवाह नहीं है. उसे यह भी याद रखना चाहिए कि मेडिकल और इंजीनियरिंग की शिक्षा में निजी संस्थाओं की संख्या और उनकी मनमानी उसके शासनकाल में ही बढ़ी हैं. जिन राज्यों ने साल भर का समय मांगा है, वे नीट के विरोध में नहीं हैं. वे अपने छात्रों के हितों की रक्षा करना चाहते हैं. अध्यादेश उनकी चिंताओं का एक तात्कालिक समाधान मात्र है. सिर्फ विरोध के लिए विरोध करना आनेवाले समय में कांग्रेस के लिए बहुत नुकसानदेह हो सकता है और उसकी पराजय का सिलसिला इसी तरह जारी रह सकता है.

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