नतीजों के मायने

Updated at : 20 May 2016 12:34 AM (IST)
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नतीजों के मायने

मई की तपती दोपहरी में पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणाम आये हैं तो 2014 की आंच भरी मई का याद आना लाजिमी है. लोकसभा चुनाव के नतीजों में भाजपा की जीत की गूंज जितनी जोरदार थी, कुछ वैसी ही गूंज इस समय पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस, तमिलनाडु में अन्ना द्रमुक और असम […]

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मई की तपती दोपहरी में पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणाम आये हैं तो 2014 की आंच भरी मई का याद आना लाजिमी है. लोकसभा चुनाव के नतीजों में भाजपा की जीत की गूंज जितनी जोरदार थी, कुछ वैसी ही गूंज इस समय पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस, तमिलनाडु में अन्ना द्रमुक और असम में भाजपा की है. असम में पंद्रह साल से सत्ता पर काबिज कांग्रेस को भाजपा ने चुनावी दौड़ में बहुत पीछे छोड़ दिया है. पूर्वोत्तर के इस बड़े राज्य में भाजपा का सत्ता पर काबिज होना पूरे इलाके के राजनीतिक-मानस को नये सिरे से गढ़ने की संभावना रखता है. इस वजह से यह जीत ऐतिहासिक मानी जा सकती है.
ठीक ऐसी जीत है तमिनलनाडु में अन्ना द्रमुक की है. तीन दशक के बाद राज्य में एक करिश्मा फिर से हुआ है कि कोई सत्ताधारी दल लगातार दूसरी बार गद्दीनशीन हुआ है. इससे संकेत यह गया है कि सब्सिडी और अनुदान की जिस राजनीति को ओछा बताया जाता है, निम्न-मध्यवर्ग और गरीब लोगों का भरोसा उसी राजनीति पर है, बशर्ते ऐसी राजनीति अपने को एक हद तक भ्रष्टाचार-मुक्त बताने में सफल रहे, जैसा कि इस बार जयललिता के साथ हुआ.
इतिहास तृणमूल कांग्रेस ने भी रचा है. तृणमूल की जीत मात्र इसी वजह से महत्वपूर्ण नहीं है कि उसने सत्ता की बागडोर अपने हाथ से खिसकने नहीं दिया, यह जीत पश्चिम बंगाल में राजनीतिक विपक्ष के पैर के नीचे से उसकी वैचारिक जमीन को खींच लेने के कारण भी महत्वपूर्ण है.
सीटों के मामले में कांग्रेस से भी पीछे रह जाने वाला वाममोर्चा अब प्रदेश में कांग्रेस के साथ तालमेल करने से पहले सौ दफे सोचेगा. माकपा को इस अफसोस से उबरने में बहुत समय लगेगा कि 2015 में कांग्रेस को शासक-वर्ग की पार्टी करार देने और उससे गठजोड़ की किसी भी संभावना से इनकार करने के बाद 2016 में ऐसी क्या मजबूरी आन पड़ी कि उसे यह तर्क गढ़ना पड़ा कि प्रदेश में लोकतंत्र की वापसी के लिए हाशिये पर जाती कांग्रेस से हाथ मिलाना जरूरी है.
इन ऐतिहासिक नतीजों की तुलना में केरल और पुद्दुचेरी के चुनाव-परिणाम सामान्य और अपेक्षित माने जायेंगे. उनमें चौंकानेवाला कोई आयाम नहीं है. केरल के नतीजे वहां की परिपाटी के अनुकूल हैं, जिसमें क्रम से कभी यूडीएफ की सरकार बनती है तो कभी एलडीएफ की, और जीत का अंतर कभी इतना ज्यादा नहीं होता कि वहां विपक्ष को मटियामेट कहा जा सके. पुद्दुचेरी में कांग्रेस जीती है, पर इसका आकार और राजनीतिक कद दक्षिण की राजनीति में ऐसा नहीं है कि उस पर अलग से चर्चा की जाये.
दो साल पहले देश की ज्यादातर लोकसभाई सीटों पर नरेंद्र मोदी की तूती बोली थी, नेताओं का लगभग वैसा ही जादू मौजूदा नतीजों में हुआ है. असम में सर्बानंद सोनोवाल, केरल में वीएस अच्युतानंदन, तमिलनाडु में जे जयललिता और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के चेहरे और नाम का डंका बज रहा है और विधायक दल की औपचारिक बैठकों से पहले ही कहा जा सकता है कि इन प्रदेशों में मुख्यमंत्री कौन बनेगा. चुनाव-परिणाम के निहितार्थ दरअसल इसी एक तथ्य से निकलते हैं. असम की ऐतिहासिक जीत के बाद भाजपा भले कहे कि वह देश को कांग्रेस-मुक्त बनाने के अपने सपने को साकार करने के बहुत करीब है, पर ममता बनर्जी और जयललिता की जीत और मतदाताओं पर पकड़ या फिर बिहार की ऐतिहासिक हार से सबक लेते हुए असम में पार्टी के क्षेत्रीय चेहरे के तौर पर सर्बानंद सोनोवाल को आगे करने की रणनीतिक मजबूरी के तथ्य उसे भी आत्ममंथन के लिए विवश करेंगे.
पार्टी को अब पहले से कहीं ज्यादा स्पष्ट हो जायेगा कि देश भले कांग्रेस-मुक्त होने की राह पर हो, परंतु लोकतांत्रिक राजनीति उस तरह विपक्ष-विहीन नहीं हो सकती, जैसा दशकों पहले कांग्रेस के दौर में हुआ करती थी. यदि आम चुनाव के बाद भाजपा भारत में अमेरिका की तरह दो-दलीय राजनीति की कल्पना कर सकती थी, तो पहले बिहार और अब इन चुनाव-परिणामों के संकेत हैंकि भारत अपने बहुदलीय लोकतंत्र के स्वभाव पर कायम रहेगा, केंद्र में कांग्रेस की खाली होती जगह क्षेत्रीय पार्टियां भरेंगी.
नीतीश कुमार समाजवादी चिंतनधारा से संबंधित पार्टियों और संगठनों की एकजुटता का आह्वान कर ऐसे रुझान की झलक दे चुके हैं. मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, उत्तराखंड और हिमाचल को चुनावी असर के लिहाज से खास न मानें, तो कांग्रेस अब सिर्फ एक बड़े राज्य कर्नाटक में सत्ता में है और वहां भी मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की लोकप्रियता ढलान पर है.
पुनर्वापसी की क्षीण होती संभावनाओं के बीच क्या कांग्रेस इस पर आत्मालोचना करेगी कि बीते तीस सालों में उसने कोई सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन खड़ा नहीं किया है, जो लोगों के मन में आलोड़न पैदा करे और जिसके आधार पर पार्टी अपने को आजादी की लड़ाई की विरासत का वारिस कह सके? बीते दिन चाहे जितने रोशन हों, किसी के नहीं लौटते. हां, आगे के उजले दिनों की तैयारी खुद करनी पड़ती है. अब यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस नेतृत्व इन नतीजों से क्या सबक लेता है.
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