वॉलेट के लिए निर्देश नाकाफी

Updated at : 18 May 2016 1:42 AM (IST)
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वॉलेट के लिए निर्देश नाकाफी

सैम पित्रोदा ने डिजिटल वॉलेट की परिकल्पना करते हुए अमेरिका में 1994 में इसका पेटेंट फाइल किया था. वर्ष 1996 में डिजिटल वॉलेट के लिए उन्हें पेटेंट जारी भी कर दिया गया. सैम पित्रोदा और मेहुल देसाई ने अपनी पुस्तक ‘दि मार्च ऑफ मोबाइल मनी’ में डिजिटल वॉलेट की आवश्यकता और उद्भव पर प्रकाश डालते […]

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सैम पित्रोदा ने डिजिटल वॉलेट की परिकल्पना करते हुए अमेरिका में 1994 में इसका पेटेंट फाइल किया था. वर्ष 1996 में डिजिटल वॉलेट के लिए उन्हें पेटेंट जारी भी कर दिया गया. सैम पित्रोदा और मेहुल देसाई ने अपनी पुस्तक ‘दि मार्च ऑफ मोबाइल मनी’ में डिजिटल वॉलेट की आवश्यकता और उद्भव पर प्रकाश डालते हुए घटनाओं का विवरण दिया है. लेकिन, डिजिटल वॉलेट की अवधारणा को बल मिला स्मार्टफोन आने के बाद. गूगल ने सन् 2011 में गूगल वॉलेट लांच किया. एप्पल ने भी आइ-फोन में पासबुक और बाद में वॉलेट नाम से एप्लिकेशन डाला.

केन्या में एम-पेसा 2007 में शुरू किया गया. यह अनोखा ई-वॉलेट केन्या के फाइनेंशियल इन्क्लूॹजन में जबरदस्त तरीके से सफल रहा और बाद में इसे भारत सहित दुनिया के अन्य देशों में लागू किया गया. एक अनुमान के मुताबिक केन्या की जीडीपी का लगभग साठ प्रतिशत लेनदेन एम-पेसा के माध्यम से होता है.

केन्या में इस सफलता को देखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक ने भी 2009 में प्री-पेड इंस्ट्रूमेंट्स (ई-वॉलेट भी शामिल हैं) के बारे में विस्तृत निर्देश जारी किया. यह दिशा-निर्देश पेमेंट एंड सेटलमेंट एक्ट-2007 में प्रदत्त अधिकारों के अधीन जारी किया है. देश में मोबाइल वॉलेट से वर्ष 2013-14 के दौरान लेन-देन की संख्या 14.07 मिलियन थी, जो वर्ष 2015-16 में बढ़ कर 603.99 मिलियन हो गयी. इसी प्रकार 2013-14 में मोबाइल वॉलेट से लेन-देन की राशि ₹11.04 बिलियन थी, जो वर्ष 2015-16 में बढ़ कर ₹205.84 बिलियन हो गयी.


तेजी से बढ़ते मोबाइल वॉलेट बाजार के लिए आरबीआइ के दिशा-निर्देश नाकाफी हैं. कई कंपनियों जैसे पे-टीएम, मोबीक्विक, पे-यू-मनी ने मोबाइल वॉलेट के प्रोडक्ट्स बाजार में उतार दिये हैं. ये कंपनियां सेमी-क्लोज्ड मोबाइल वॉलेट सेवाएं प्रदान कर रही हैं. आरबीआइ के दिशा-निर्देशों के अनुसार मोबाइल बैंकिंग के लिए अधिकृत बैंक मोबाइल वॉलेट की सुविधा प्रदान कर सकते हैं. इसके अतिरिक्त एनबीएफसी और अन्य व्यक्ति भी क्लोज्ड और सेमी-क्लोज्ड मोबाइल वॉलेट सेवाएं प्रदान कर सकते हैं. बैंकों और एनबीएफसी को उनके लिए निर्धारित पूंजी पर्याप्तता मानदंड का अनुपालन करना पड़ेगा. वहीं अन्य व्यक्तियों के लिए किसी भी समय न्यूनतम पांच करोड़ रुपये की पेड-अप पूंजी और एक करोड़ रुपये का धनात्मक नेट-वर्थ तय किया गया है. लेकिन, जिस तेजी से मोबाइल वॉलेट व्यवसाय बढ़ रहा है, ये मानदंड पर्याप्त नहीं लगते. बैंकों के मामले में जहां मोबाइल वॉलेट एस्क्रो खाते में जमा धनराशि को विभिन्न रिजर्व जरूरतों, जैसे- एसएलआर, सीआरआर की गणना के लिए शुद्ध डिमांड और टाइम देयताओं में गिना जाता है, अन्य के लिए ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है. बैंकों के अतिरिक्त अन्य हस्तियों के लिए मोबाइल वॉलेट से प्रात राशि को किसी एक बैंक में क्लोज्ड एस्क्रो खाते में रखने का निर्देश है. एस्क्रो खाते के संचालन, मॉनीटरिंग और नियंत्रण की जिम्मेवारी पूरी तरह से बैंकों पर डाल दी गयी है, जो कि कठिन और कहीं-कहीं अनावश्यक है. फिर इन दिशा-निर्देशों को देख कर लगता है कि ये मात्र प्री-पेड इंस्ट्रूमेंट्स को ध्यान में रख कर तैयार किये गये हैं, जहां लेन-देन का संचालन और नियंत्रण कुछ हद तक मैनुअल है, जबकि मोबाइल वॉलेट पूरी तरह से ऑटोमेटेड प्रणाली है. इन दिशा-निर्देशों के अनुसार, वॉलेट संचालकों को त्रैमासिक आधार पर ऑडिटर से प्रमाणित सर्टिफिकेट प्रस्तुत करना होगा कि खाते में समुचित अवशेष रखा जा रहा है. जिस तेजी से बाजार बढ़ रहा है, कोई भी मॉनीटरिंग दैनिक आधार पर होनी चाहिए. इसके लिए विशेष सॉफ्टवेयर द्वारा संचालित रिस्क मैनेजमेंट व्यवस्था लागू करनी चाहिए. बैंकों के लिए जहां व्यवस्था है कि पीड़ित ग्राहक बैंकिंग ओम्बुड्समैन तक जा सकता है, वहीं वॉलेट जारी करनेवालों के लिए ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है. अगर ग्राहकों की शिकायतों को नहीं सुना गया तो कहां जायेंगे.

वॉलेट में धनराशि को डेबिट-क्रेडिट कार्ड अथवा नेट बैंकिंग से भरा जा सकता है. यदि ऐसा करते समय नेटवर्क या प्लेटफार्म में कोई समस्या आ गयी और ग्राहक का खाता डेबिट कर लिया गया, लेकिन वॉलेट में पैसा नहीं आ पाया, तो धनराशि कितने दिनों में रिफंड होगी, इस संबंध में आरबीआइ का दिशा-निर्देश कुछ नहीं कहता. जबकि, एटीएम के फेल्ड ट्रांजेक्शन मामलों के लिए स्पष्ट निर्देश हैं. इसी तरह जिन मामलों में धनराशि का भुगतान करने के बाद भी प्रोड्क्ट या सेवा की डिलीवरी नहीं की गयी, इस बारे में भी कुछ स्पष्ट नहीं है.

लेन-देन के भुगतान सेटलमेंट व्यवस्था के अनुसार, जहां धनराशि को नोडल बैंक से नहीं भेजा जाना है, धनराशि का सेटलमेंट ट्रांजेक्शन के दो दिनों के अंदर कर दिया जाना चाहिए और अन्य मामलों में तीन दिनों में कर दिया जाना चाहिए. लेकिन, ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है, जिससे जांचा जा सके कि यह व्यवस्था सुचारु रूप से काम कर रही है. ऐसा अनुमान है कि वॉलेट कंपनियां धनराशि को रोक कर जमा पर ब्याज कमाती हैं और सेटलमेंट देर से किया जाता है.

सबसे बड़ी आशंका केवाइसी को लेकर हो सकती है, क्योंकि दस हजार रुपये तक ग्राहकों का ‘मिनिमम डिटेल’ लेकर वॉलेट संचालन की अनुमति दी जा सकती है. ऐसी आशंका है कि यह व्यवस्था मनी लॉन्डरिंग के लिए उपयोग में लायी जा सकती है. किसी के वॉलेट में धनराशि किसी के भी डेबिट या क्रेडिट कार्ड द्वारा भरा जा सकता है. ऐसी परिस्थितियों में फ्रॉड होने की गुंजाइश बनती है. हाल ही में आरबीआइ ने वॉलेट लाइसेंस के सरेंडर की नीति जारी की है. इस नीति पर भी सवाल उठाये गये हैं कि वॉलेट में नकदी जमा राशि का किस तरह से वापस भुगतान किया जायेगा. फिर सेमी-क्लोज्ड वॉलेट में से नकदी धन नहीं निकाला जाता, जिसके कारण मोबाइल वॉलेट का वित्तीय समावेशन में पूरा उपयोग नहीं हो पाया है. अब समय आ गया है कि आरबीआइ प्री-पेड इंस्ट्रूमेंट्स से अलग विशेष दिशा-निर्देश जारी करे अन्यथा बड़ी वित्तीय दुर्घटना में सिर्फ नागरिकों का नुकसान होगा.
िबभाष
कृषि एवं आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ
s_bibhas@rediffmail.com
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